ईश्वर और पुरुषार्थ - पार्ट ३
अहमदाबाद 16-10-1983
सत्संग के मुख्य अंश :
रबिया जब दुखों से घिर गई और उसने अपने भगवान से ऐसी आर्तनाद से प्रार्थना की कि उसने अपने उस आत्मानंद को पा लिया !
आप विजय की तरफ जा रहे हो या पराजय की तरफ कैसे पता चले ?
दुर्गा सप्तशती की रचना मेधावी ऋषि ने क्यों की ?
सच्चे विजय की व्याख्या
उनकी विजय अवश्यंभावी है...
वास्तव में कृष्ण किसके हैं ?
कृष्ण की बराबरी करे ऐसा कौन.. प्रसंग !
विजया दशमी के दिन कुछ संकल्प करो जो आध्यात्मिक और लौकिक विजय का मार्ग खोल देगा !
विधि-विधान ना हो तो ना हो टूटी-फूटी अपनी भाषा में दिल से की हुई प्रार्थना भगवान सुनते हैं !
मेघावी ऋषि ने सृष्टि में अलग-अलग स्वरूप में व्याप्त शक्ति की उपासना का उपदेश दिया राजा सूरज को !
सत्संग
0:00 रबिया नाम की एक मुस्लिम फकीर हो गई, वो गुलाम 0:06 होकर खरीदी गई थी, किसी घर में काम करती थी, और जहां वह खरीदी गई थी वह आदमी बड़ा लूचा 0:13 था, बड़ा दुष्ट था, बड़ा निर्दय था, रबिया के हाथ से थोड़ी सी गलती होती तो उसे खूब 0:20 डांटता, खूब पीटता, फिर भी रबिया वहां से पलायन बाद नहीं किया, एक बार तो रबिया से 0:27 कुछ गलती हो गई और उस घर के मालिक ने क्या रबिया के हाथ ऊपर कुर्सी के पैर रखकर उस 0:33 पर चढ़ बैठा, और हिलने लगा और रबिया को पीड़ा देने लगा, उसी रात को 0:39 रबिया अपनी टूटी फूटी उस झोपड़ी में दरारे पड़ी 0:46 हुई, जिस दरवाजे में उसको बंद करके रात्रि को दो बजे रबिया पुकार रही परमात्मा को, हे 0:53 मेरे मालिक मैं तुझे मोहब्बत करती हूं, मैं तुझे 0:58 चाहती हूं,... बस्त पाने के लिए मैं तुझे नहीं चाहती, मेरे मालिक दोजख के भय से मैं तुझे प्यार 1:06 नहीं करती, सेठ परेशान कर रहा है उसकी परेशानी मिटाने के लिए मैं तुझे नहीं चाहती हूं, 1:13 मित्रों की वाह वाह पाने के लिए मैं तुझे नहीं चाहती हूं, गहने और कपड़े पाने के लिए 1:19 मैं तुझे नहीं चाहती, मैं संसार का सुख भोगने के लिए तुझे 1:25 प्रेम नहीं करती हूं, हे मेरे मालिक बस मेरा प्रेम किसी चाह का गुलाम ना हो, मेरा 1:33 प्रेम निश्चल मेरे जीवन का तू ही सहारा हो, मेरे 1:40 विजय मेरे जीवन की विजय तेरी ही प्राप्ति हो, और मेरी कोई विजयदशमी ना हो, मेरे जीवन 1:47 की विजय बस तू ही हो, तेरे सिवाय मुझे सब मिथ्या …बासे, तेरे सिवाय सब मुझे खेल बासे ….,1:53 तेरे सिवाय सब मुझे स्वपना बासे, मेरे मालिक बस मेरी प्रीति बस तेरे कारण ही 1:59 मेरी प्र रहे… मैं तुझ में हो जाऊं, तू मुझ में हो जा, मेरे प्रभु हे मेरे खुदा ताला, 2:06 हे मेरे अल्लाह, हे मेरे यार, इस प्रकार पगली रबिया गुनगुना रही थी, एकाग्र हो गई, 2:14 उसके…. विकल्प शांत हो गए, उसके प्राण शक्ति ऊपर उठी, आज्ञा चक्र तक पहुंची, आज्ञा चक्र 2:21 से अनंत अनंत सूर्य का प्रकाश फैल गया, उस झोपड़ी 2:26 में, रबिया का मालिक बाथरूम गया, देखा कि इस झोपड़े में 2:31 कोई प्रकाश है, और कुछ बोल रहा है, कोई एकाएक कभी प्रकाश का झपका रा .होता है, और 2:37 रबिया उससे कुछ बातें कर रही है, मालिक ने सोचा रबिया का कोई होगा दोस्त, 2:43 कोई यार कोई बॉयफ्रेंड होगा, पकड़ू उसको चोटी करू पिटाई, धीरे-धीरे आया देखा दरार 2:52 से कि रबिया अकेली है , और कह रे मेरे यार मैं तुझे दुख मिटाने के लिए प्रार्थना नहीं करती, दुख तो प्रारब्ध से मिट ही 2:59 जाएगा, शरीर मिटेगा तो दुख मिटी ही जाएंगे, शरीर मिटेगा तो बीमारियां मिटी ही जाएगी, शरीर मिटेगा तो धन और …वि निर्धनता सब साथ 3:07 में चली जाएगी, मेरे मालिक मैं धन पाने के लिए तुझे प्यार नहीं करती, दुख मिटाने के 3:12 लिए तुझे प्यार नहीं करती, बस तुझे ही पाने के लिए मैं तुझे प्यार करती हूं, मेरे मालिक तू ही मेरे जीवन का सर्वस्व रहना, 3:19 मेरा चित्त कहीं ना फसे, हे मेरे मालिक मैं इसलिए तुझे प्यार करती हूं, मैं नरक में 3:25 जाने से भयभीत होकर तुझे नहीं चाहती , मैं नरक से बचने के लिए मत मोहब्बत नहीं करती, 3:32 बस्त को पाने के लिए तुझे मोहब्बत नहीं करती, मैं तो तेरे को पाने के लिए तुझे मोहब्बत करती हूं, तेरे में मिटने के लिए 3:38 तुझे मोहब्बत करती हूं, रविया दोराई जा रही है, कभी-कभी प्रकाश कर सेठ चकित होते, सेठ 3:45 का धैर्य होख…. गया पाप नाश हो गया, सच्ची रबिया की पुकार के वाइब्रेशन सेठ के हृदय 3:52 को और पापों को धो डालते हैं, सेठ द्वार खोलकर रविया के पैरों पर गिर पड़ता है, कि रविया तू मुझे माफ करना, मैंने आज तुझे खूब 4:00 सताया था, उसी ये तू रो रही है, उसी तू उसको याद कर रही है, रविया कहती है “ नहीं सेठ जी 4:05 तुम्हारी कृपा है कि मेरी जगत में आसक्ति नहीं हो रही है, तुम्हारी मेहरबानियां है कि मैं परमात्मा को खुदा को याद कर सकती 4:12 हूं, मैं तो अपना ऋण चुका रही हूं, किसी जन्म में तुम्हारा लिया होगा, खाया होगा, 4:18 तुमको परेशान किया होगा, अब बदला पूरा हो रहा है, अब मैं तुम्हें सजा मिले ऐसा नहीं 4:23 पुकार रही हूं, मैं तुम्हारे घर से भाग जाऊं ऐसा नहीं पुकार रही हूं, मैं मर जाऊं ऐसा भी नहीं पुकार रही हूँ , मैं तो उस परमात्मा 4:31 में खुदा में शांत हो जाऊं, बस यही मेरी पुकार थी, मेरे सेठ जी आप निश्चिंत रहिए, 4:37 सेठ का हृदय बदल गया, रबिया के लिए सुंदर व्यवस्था कर दी, रबिया बड़ी शर्मिंदगी कि, 4:44 सेठ आज तक तो तुम नौकरानी समझ के डांटते थे, फटकार थे, और अब जब तुम प्रणाम करते हो 4:49 तो मुझे लगता है क्या प्रभु की भक्ति अब छूट जाएगी, मेरी वावा होने लगी, मैं उस 4:55 मालिक को तो ना भूलूंगी, सेठ बोलते कि रबिया तू मेरी गुरु है, रुबिआ को गुरु मनाकर 5:01 मानकर उस सेठ ने अपना जीवन धन्य किया,
भई रबिया मस्त फकीर हो गई, घूमते घामते हसन उसके 5:07 घर आया रबिया अंदर थी अपने घर हसन बोलता है, रबिया बाहर आजा देख खुदा ताला का कैसा 5:14 सौंदर्य चमका है, देख बुलबुले कैसे गीत कोयल गुनगुना रही है, बसंत का ऋतु फूल कैसे खिले 5:22 हैं, हवाएं कैसी चल रही है रविया जरा बाहर आजा, रविया कहती है भाई 5:28 मेरे बाहर आ आकर तो युग बीत गए, अब तू भीतर ही आ गया ….अब तू भीतर आजा, बाहर आ आकर तो 5:35 युग बीत गए, बाहर तो हम बहुत समय से आए हैं, अब बाहर आकर क्या करोगे, अब भीतर ही आ जाओ,
5:41 वेदांत कहता है कि तुम्हें विजय पाना है तो बाहर कब तक घूमोगे अब भीतर ही आ जाओ, 5:47 बाहर की विजय तो तुम देख लिया, नौकरी में से मुनिम भी आई मुनिम में से सेठ पना आया, 5:53 सेठ में से धन बड़ा मकान बड़े, दुकान बड़े, लेकिन सोचो परमात्मा शांति बड़ी है या घटी है , 6:00 यदि परमात्मा शांति बढ़ रही है तो तुम्हारी गाड़ी विजया दशमी के तरफ है, विजय 6:06 के तरफ है, और अशांति बढ़ रही है तो तुम्हारी गाड़ी पराजय के तरफ है, जरा 6:11 कभी-कभी एकांत में बैठो, देखो विजय के तरफ चल रहे हो कि पराजय की तरफ, शांति के तरफ 6:18 बढ़ रहे हो कि अशांति के तरफ, बढ़ रहे हो, धर्म के नाम पर कल्पनाओं के राज्य में जा रहे हो कि कृष्ण के राज्य में जा रहे हो, 6:26 जरा सोचो जरा जीवन को थामो जिसको मानते हो उसको जानो, जरा रुको…. गयो परवा
एक भूल दूजा 6:35 भूला भूला सब संसार,
विन भूल एक गोरखा जिसको गुरु का 6:41 आधार
तो विन भूल जीवन बिताने का संकल्प करो, कल्पनाओं के राज्य में कब तक हो जाओगे, 6:49 जरा सा ठहरो तो ईश्वर की जो माया शक्ति है 6:54 उसको आद्य शक्ति बोलते हैं, उसी आद्य शक्ति से यह जगत चला है, उसी को जगत की मां बोलते 7:02 हैं, और उसी ने सतोगुण रजोगुण तमोगुण पैदा किया, इसलिए सतोगुण के अधिष्ठाता रजोगुण के 7:09 अधिष्ठाता और तमोगुण के अधिष्ठाता त्रि देव ब्रह्मा विष्णु 7:18 महेश, ब्रह्मा जी रजोगुण के अधिष्ठाता, विष्णु सत्व गुण 7:25 के अधिष्ठाता, शिव जी तमोगुण के अधिष्ठाता,
एकमाई जगत ब्याई तीन चेले परवान
एक संसारी 7:33 एक भंडारी एक देवे निर्वाण
ऐसा नानक की वाणी में आता है, तो वोह जो आदि सच्चिदानंद 7:40 परब्रह्म परमात्मा शुद्ध शांत कृष्ण कहो, बुद्ध कहो, राम कहो, रहमान कहो, ये सब खंड खंड 7:47 के नाम है, इन सब का जो आधार है उसको परब्रह्म परमात्मा कहते हैं, इस सब का जो 7:53 आधार है, हजार हजार लहरों का जो आधार है, उसे सागर कहते हैं, ब्रह्म है सागर अवतार 8:00 है, उसमें लहरियां और जीव है उसमें बुदबुदे, ओम ओम ओ ओ ओ
लहरी और 8:12 बुदबुदा बाहर से तो छोटे और मोटे हैं बाहर से बड़ा अंतर है, लेकिन तत्व से दोनों एक 8:17 है , उसी लिए बोलते हैं, जीवात्मा सो .परमात्मा जो बुदबुदा है, वही लहर है , जो लहर 8:22 है वही बुदबुदा है ना, लहर बुदबुदा नहीं, बुदबुदा लहर नहीं, दोनों पानी है, 8:29 दोनों चेतन है, जीव भी चेतन है , और ईश्वर भी चेतन है, शुद्ध चेतन का नाम ब्रह्म है , माया 8:36 में आए हुए चेतन का नाम ईश्वर है, और अविद्या के अंतःकरण में आए हुए चेतन का 8:41 नाम जीव है , अब अविद्या की कल्पनाओं को हटा दे तो उसकी विजया दशमी सिद्ध हो जाती 8:49 है,
जब सूरथ राजा को इस प्रकार का 8:55 उपदेश मेघा ऋषि ने दिया, 9:01 मेघा ऋषि के चित्त में कुछ प्रश्न उठे, व प्रश्न उठे उन प्रश्नों का समाधान और उस 9:09 आदि शक्ति की आराधना पूजना करते करते अपने और विकल्पों को हटाने की जो कला जिस 9:14 शास्त्र में है, जो वचन है, 700 उसको दुर्गा सप्तसती 9:19 कहते हैं, अर्थात दुर्गा सप्तसती का निर्माण आत्म साक्षात्कारा मेघा ऋषि के 9:26 द्वारा हुआ है ,
एक परब्रह्म परमात्मा को पाने के लिए ऋषियों ने अनेक अनेक भाव, अनेक अनेक 9:34 अभिव्यक्ति, अनेक अनेक संकल्प, अनेक अनेक रीत और रिवाज किए हैं । क्योंकि आदमी का मन 9:40 अनेकता में खुश होता है। अनेकता में खुश होता है, अनेकता देते हुए भी इशारा एक के 9:45 तरफ कि है ऐसे ऋषियों को हम लोगों के बार-बार प्रणाम हो।
तो सनातन धर्म में 9:52 प्रचलित पांच प्रकार के उपासक होते हैं शैव जो शिव जी के भक्त हैं । वैष्णव 9:59 जो राम के कृष्ण के विष्णु के भक्त हैं , उन्हें वैष्णव कहा जाता है। शाक्त, जो शक्ति 10:05 के उपासक हैं । गणपत्य , जो गणपति के उपासक है। सौर्य, माना जो सूरज के उपासक 10:12 है। इसमें वैष्णव शैव और शाक्त ये तीनों की संख्या अधिक है। और उन दोनों की थोड़ी कम 10:21 है। ये पांच प्रकार के उपासकों को अपनी उपासना भिन्न-भिन्न पद्धतियों से करते हुए 10:27 अंत में वेद के जो चार मंत्र है, वे इशारा देते हैं, कि तुम अपने घर में जाने का 10:35 प्रयास करो, कीर्तन करते करते तुम शांत हो जाओ, सेवा करते करते सेवा किसने की सेवा 10:41 किसने ली और अंत में सेवा का फल स्वर्ग है, मुझे स्वर्ग भी नहीं चाहिए, बैकुंठ भी नहीं 10:46 चाहिए, जिसके द्वारा स्वर्ग और नर्क दिखते हैं वह कौन है? उसकी जब खोज करोगे तो 10:52 तुम्हें वेदांत का रहस्य हाथ लगेगा। तुम अपने घर में आओगे वैकुंट में जाओगे 10:59 और यदि तुमने अपने घर का पता नहीं लिया तो वैकुंट के बाद भी तुम्हारा पतन संभव है। 11:06 भगवान के पार्षद थे भगवान के द्वारपाल थे जय _ विजय, जय विजय बैकुंठ में रहते थे, नित्य 11:12 भगवान का बाह्य दर्शन करते थे, लेकिन भगवान का भीतरी दर्शन नहीं करते थे, तो जय विजय 11:18 ने एक बार सनक आदि का अपमान कर दिया, श्रापित होकर आकर राक्षस 11:23 हुए,
कृष्ण के कुल में पैदा हुए यदुवंश, और कृष्ण के होते होते उन्होंने…. शराब पी लड़ाइयां 11:30 की, और कृष्ण के होते होते हुए मर गए, यदुवंशी तो बाह्य भगवान का रूप…. यदि भगवान 11:37 के उपदेश के अनुसार बाह्य रूप को …..के उपदेश को लेकर भगवान के तत्व में तुम नहीं डूबते 11:43 हो तो, तब तक तुम्हारे जो विजय है सापेक्ष विजय है कल्पना के विजय हैं, 25 गरीबों के 11:49 बीच तुम सेठ हो, लेकिन बड़े सेठ के आगे तुम छोटे हो जाते हो, श्री 11:55 राम 25 मूर्खों के आगे तुम विद्वान हो, लेकिन थोड़े विद्वान के आगे तुम्हारी 12:00 विद्वता सुकड़ जाती है, बड़े-बड़े विद्वानों से भी यदि तुम बढ़कर विद्वान हो तो मौत एक झटका मारती है, सारी विद्या खो 12:08 जाती है, यह क्या विजय है? मौत एक झटका मारती है और सारा धन खो जाता है, मौत एक 12:13 झटका मारती है, सारी यश और यश के साधन तुम्हारे पुराना हो जाते हैं,
सच्चा विजय तो 12:19 वेदांत बोलता है कि… तुमने अपने आत्म देव को जान लिया तुमने अपने उस ब्रह्म भाव को 12:24 जान लिया, जिसका कभी पराजय नहीं हो सकता है। जो सबकी आत्मा में सफल और सफल होने वालों 12:30 की आत्मा में रम रहा है। उसको यदि तुमने जाना तो तुम रण छोड़कर निर्वित…. होकर भी 12:35 भागते हो तो भी तुम्हारा यश कायम है, इसलिए कृष्ण का एक प्यारा नाम है रण छोड़ो राय 12:42 की जय ,
तो जहां ऐसा कृष्ण है वहां रणछोड़ के भाग जाता है तो भी विजय है, और रण में 12:48 विजय होता है तो भी विजय है, एक आत्मा ही ऐसा है कि हर परिस्थितियों में उसकी विजय 12:54 है, जीव तो बेचारा जोखम में जीता है। कमाया तो भी भय ना कमाए तो भी भय, यश हुआ तो भी 13:01 भय, और अपयश हुआ तो भी भय, शादी किया तो भी पछताया और नहीं किया तो भी पछताया, धन मिला 13:07 तो भी पछताया और निधन रहा तो भी पछताया, खाया तो भी पछताया और ना खाया तो भी 13:12 पछताया, जीव का तो हालत ऐसा है कि जीव सदा जोखम में ही रहता है, जीव है दिल्ली के लड्डू खाने वाला, दिल्ली 13:20 का लड्डू खाएगा तो पछताएगा और ना खाएगा तो पस्ताएगा
तो जब तक जीव की कल्पना रहेगी 13:26 हे सूरथ राजा तब तक तुम जो राज्य छोड़कर आए हो, जो धन छोड़कर आए हो, जिससे तुम्हें 13:33 खट्टे अनुभव हुए हैं, आमली के अनुभव हुए, मैं फिर से आमली को दोहराता हूं बड़ी प्यारी रहती है। श्री राम। तो जो अनुभव किए 13:42 हैं, सूरथ राजा और समाधि वैश्य कहता है कि कुटुंबीओं ने हमें धोखा दिया, और समझते कि 13:48 कोई किसका नहीं है सब सुख के भगत हैं, ये करूं ये मिलेगा तो सुख होूँउगा , यह पाऊंगा तो 13:54 सुख होंउगा, और वो पाने के बाद उसकी आदत हो जाती है, तो हे सूरत राजा तुमने राज्य पाया 13:59 राज्य में रहे हो उसकी तुमको आदत पड़ गई है। अब उन्होंने सबने तुम्हें ठुकरा दिया, फिर भी तुम मन से चाहते हो कि मुझे 14:06 आशीर्वाद मिले, और मैं वहीं जाऊं तो सूरत ने कहा कि महाराज ऐसे मन की आदतों से बचने 14:12 के लिए क्या उपाय है? अब क्या उपाय है?
- कि उस आदि जो शक्ति है आदि जो परमात्मा की 14:18 माया है, उस माया से बचने के लिए परमात्मा की शरण जा और परमात्मा के साथ निराकार रूप 14:24 को तो तू जानता नहीं, तो उसी माया को उसी परमात्मा की शक्ति को जगदंबा का रूप देकर 14:29 ऋषि ने उपासना की, पद्धति जो बनाई वह उपासना की पद्धति के शास्त्र का नाम पड़ गया दुर्गा सप्तसती, उसे चंडी पाठ भी समझ 14:39 के लोग करते हैं, खैर तो उस परब्रह्म परमात्मा को शुद्ध चैतन्य को समझने के लिए 14:46 साकार की उपासना करो चाहे निराकार की करो, चाहे सेवा करो, लेकिन सब करने के बाद 14:51 तुम्हारा विजय का निशाना तो वो रहे कि- जिसको पाने के बाद कभी पाना बाकी ना रहे, 14:57 जिसको जानने के बाद सब उससे जाना जाता है, जिससे सब जाना जाता है, उसको एक बार जान ले, 15:03 जिससे सब पाया जाता है उसको एक बार पा ले, ऐसा यदि तुम्हारा लक्ष्य है और पुरुषार्थ 15:09 है, और तुम्हारे अंदर कुछ ज्ञान का उस कृष्ण की कृपा है, तो विजय अवश्य है। ये 15:16 शास्त्रों का अनुभवी महापुरुषों का वचन है।
यत्र योगेश्वर 15:22 कृष्ण यत्र योगेश्वर कृष्ण यत्र 15:30 पार्थ धनुर्धर
ये गीता का आखिरी श्लोक 15:37 है। विजय कहां होती है कि जहां योगेश्वर कृष्ण है। खाली कृष्ण क्यों नहीं कहा? 15:43 योगेश्वर कहा कि योग के द्वारा ही वो कृष्ण तत्व की शक्तियां पता चलती है? और 15:50 आत्मा कृष्ण तुम्हारे अंदर है । तुम योग करो तो तुम्हारे साथ भी योगेश्वर कृष्ण है। आत्मा कृष्ण तुम्हारे अंदर है। तुम योग करो तो तुम्हारे साथ भी योगेश्वर कृष्ण है। ऐसा 15:55 नहीं कि धनुर्धारी अर्जुन के साथ और तुम्हारे अंदर कुछ नहीं है। तुम्हारे अंदर कुछ नहीं तो तुम्हारे में और खबे में 16:01 फर्क ही नहीं। तुम्हारे अंदर भी अभी भी वही है जो पहले था, वह अभी भी है, और बाद में भी 16:07 रहेगा। तो जहां योगेश्वर कृष्ण है और पार्थ पृथु राजा के पुत्र अर्जुन है , 16:16 वहां कसम खाकर कहता हूं कि विजय ही विजय है। शपथ लेकर बोलता हूं कि विजय ही विजय है।
16:24 यत्र योगेश्वर कृष्णो, यत्र योग 16:31
यत्र पार्थो धनुर्धर यत्र पार्थ
तत्र श्री विजयो भूति 16:41 तत्र श्री विजयो। ….
ध्रुवा नीति मति 16:51 मम
हे राजन जहां योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण है और जहां गांडीव धनुष्य धारी अर्जुन 16:58 है, वहां पर श्री विजय विभूति और अचल नीति है, ऐसा मेरा मत है,
और कृष्ण माना अटपटा, एक 17:06 बार सत्यभामा ने कृष्ण को कहा तुम किसके हो? कृष्ण ने कहा तू क्या मानती है? मेरे से 17:12 पूछती है पगली मैं किसका हूं बोले ना सच बताओ ना, बोले बस तू समझ जा बोले नहीं फिर भी 17:20 बताओ कृष्ण ने कहा मैं तेरा ही हूं, और सच पूछो तो कृष्ण सब सत्य भामा का है। सत्य 17:27 जिसकी वृत्ति है जो सत्य आचरण करता है उसी का कृष्ण है ही है, तो सत्यभामा कहते कि आप मेरे ही हो ना? 17:35 दूसरे किसी के तो नहीं हो ना? बोले ना ना मैं तेरा ही हूं, बोले जब मेरे हो तो मैं 17:40 अपनी चीज किसी को भी दे दूं? बो हां ठीक है बोले, मैं आपको किसी को भी दे डालूं? बोले 17:46 हां, दे डाल, सत्य बामा ने पानी लिया संकल्प किया नारद को बुलाया कि मैं श्री कृष्ण तुमको 17:53 दान में देती हूं, सत्यभामा भी कम नहीं रही होगी, और श्री 17:59 कृष्ण नारद को दान में दे दिए, और नारद लेकर श्री कृष्ण को रवाना हुए, भक्त घबराए 18:06 और बाबा का कोई भरोसा नहीं है, व कृष्ण को कहां ले जाए, वो तो बिक गए, व कोई बोलता है 18:13 कि कृष्ण की बराबरी का और कोई चीज और आदमी मांग लो, और 10 बच्चे दे दे, और 10 व्यक्ति 18:18 दे दे, बोले नहीं हम हमारे को यह काफी है, अकेला जहां यह है वहां सब कुछ है, और इसको 18:23 छोड़ो तो सब कुछ भी सब कुछ नहीं है, कथा है, 18:29 किसी ने कहा कि कृष्ण एक पल्ले में रखो दूसरे पल्ले में चांदी के रुपए ले लो, येय 18:34 नहीं चाहिए चला कृष्ण के बराबरी सोना ले लो, जवाहरात ले लो, बोले नहीं बरा आखिर एक 18:42 भक्त ने कहा कि देखो श्री कृष्ण के बदले में जो चाहो मैं दे सकता हूं, लेकिन कृष्ण 18:47 को तुम मत ले जाओ, नारद ने कहा 18:54 अच्छा दो, जो तुम्हारे पास है, दो चलो भक्त ने 18:59 हीरे जवारा जो कुछ है वो दिए गिन्या हीरे सब डाला, सब वैभव ला दूसरे भक्त ने, तीसरे 19:05 ने, चौथे ने, पांचवे ने ने सब में डाला लेकिन फिर भी कृष्ण का पल्ला भारी का भारी, 19:11 कृष्ण उठे ही नहीं, व पल्ला ऊपर हुआ ही नहीं, अर्थात एक तरफ कृष्ण दूसरे तरफ संसार 19:17 की सब सामग्री हो फिर भी आत्म सुख की बराबरी नहीं कर सकते, ऐसा कथा का 19:24 भाव है , लेकिन भगत समझते होंगे कि तराजू में कृष्ण को रखा हो होगा और सारी दुनिया की 19:29 चीज एक पल्ले में रखी होगी तो सारी दुनिया की चीज एक पल्ले में नहीं रहती, लेकिन विवेक की तराजू में कृष्ण को रखा और दूसरे 19:37 विवेक तराजू में दूसरे पल्ले में विवेक की तराजू में एक पल्ले में कृष्ण को रखा, और 19:43 दूसरे पल्ले में विश्व के सब सुखों को रखा, लेकिन कृष्ण उठ नहीं रहे 19:48 थे, महाराज अब क्या किया जाए कृष्ण की बराबरी करने का कोई साधन लाओ भक्त बैठ गया, 19:55 शांत होकर हे कृष्ण तू ही बता कि तेरी बराबरी क्या है? कृष्ण ने कहा कि मेरी 20:01 बराबरी तू ही है, मैं कैसे हूं? कि जब तेरा अहंकार मिटता 20:07 है तो तू और हम एक ही हो जाते हैं। अब क्या करें ? कि बस अहंकार मिटाने के लिए कुछ बाहर 20:14 का दिखावा कर दे, खबर दे दे एक तुलसी का पत्ता धर दे, मैं बराबर हो जाऊंगा, कि मुझ 20:20 में कुछ नहीं मैं कुछ नहीं हूं, लो पथम पुष्प ये तुलसी का पत्ता धर दिया जो तुलसी 20:26 का पत्ता धर दिया तो कृष्ण बराबर हो गया, नारद जी ने तुलसी का पत्ता उठा दिया कृष्ण वापस लौटा 20:34 दिए, तो ये नारद जगत को उपदेश दे रहे हैं कि, जगत का सब सुख भी कृष्ण सुख के बराबर, 20:42 नहीं कर सकता, और जहां तुम्हारा समर्पण आ जाता है और जिसको कृष्ण आदर देते हैं 20:50 तुलसी को कृष्ण ने मान दिया है, जिसको कृष्ण मान देते हैं वह कृष्ण की बराबरी कर 20:56 लेते हैं, इसलिए तुलसी के पत्ते से भी कृ कृष्ण बराबर हो गए, और नारद जी तो त्यागी, 21:01 आदमी कहां सोना जवेरी जबरात लेकर घूमे, कहां बोजा उठाए, तुलसी का पत्ता खाते हुए 21:07 एसिडिटी को हटाते हुए नारायण नारायण नारायण करते भागे,
तुलसी का पत्ते से एसिडिटी हटती है 21:14 मच्छर मच्छर जिसके घर में आते हो तुलसी के क्यारा रख दो मच्छर भाग जाएगा, बिच्छी और साप भी भाग जाता है, तुलसी के पत्तो की बूह 21:20 में इतनी ताकत है, लेकिन यह तो बहा उसका गुण है भीतर का वरदान का गुण तो कुछ और है 21:27 परंपरा के अनुसार तो यहां के आज के श्लोक में हम लोग अब विश्रांति करेंगे, दशेरा की विजया दशमी 21:34 कैसे होती है कि? नव दिन की साधना के बाद उपासना के बाद भगवान राम ने भी आज के दिन 21:39 विजय के तरफ प्रयाण किया था, शिवाजी महाराज ने भी आज के दिन किया था, तो आप भी आज के 21:45 दिन कोई संकल्प कर लो कि इतनी माला करके ही रहूंगा, इतने मिनट मौन रह रहूंगा, रात को 21:55 सोते समय इतनी माला जरूर करूंगा, इस संकल्प में असफलता नहीं हो सकती, ऐसा आज 22:03 के दिन संकल्प करो तो राम को उम्मीद है कि आपकी 22:09 विजय जल्दी हो सकती है,
रात को सोते समय एक माला करके ही 22:16 सोऊंगा, यह मैं तुमको केवल नहीं कह रहा हूं पिछले दो तीन दिन से मैं प्रयोग कर रहा हूं, सोते समय कैसे सोने से सुबह कैसी जाती 22:24 है, उसके मैं प्रयोग करता हूं अपने चित्त पर तो जिस जाप करते करते सोया उसकी प्रभात 22:30 कैसी हुई? ध्यान करते करते सोया तो प्रभात कैसी हुई? सत्संग सुनते सुनते सोया तो प्रभात कैसी हुई? और ऐसे ही आलस एक दिन 22:37 आलसी होकर सो गए तो प्रभात कैसी हुई? एक दिन लोगों का चिंतन करते करते सोया 22:43 तो प्रभात कैसी हुई? लोगों का ही मुंह देखा आंखें खोल के जाकर देखा कोई ना कोई दिख जा 22:49 मलंग का मुंह देखा तो सारा दिन कैसा गया? ये सब मैंने नोट किया है, जय जय,
इसीलिए 22:55 सुबह जल्दी से आंख भी नहीं खोलता हूं, घनी देर बंद बंद बंद बंद बंद बंद 23:01 बंद कोन मो जोय केव यदि तुम्हें विजय होना है आध्यात्मिक 23:08 विजय, लौकिक विजय होना है उसी लिए भी धारणा ध्यान काम देगी तुम्हारी तंदुरुस्ती तुम्हारी अकल और बड़े पुरुषों का संग 23:16 तुम्हें लौकिक विजय में भी सफलता देता है, और आध्यात्मिक अलौकिक विजय में भी सफलता 23:21 देता है, स्वर्ग वर्ग ये भी लौकिक है इसको लोग अध्यात्मिक बोलते हैं अध्यात्मिक नहीं है, सच्चा अध्यात्मिक विजय तो यह है, 23:29आत्म साक्षात्कार, स्वर्ग कोई आध्यात्मिक चीज थोड़ी है, य भी भोगों की चीज है, वो भी लौकिक है पर लौकिक है, इस लोक की नहीं, तो 23:36 उस लोक की, लेकिन है सब लौकिक वैकुंठ का सुख भी लौकिक है, जहां से गिरना है वो सब लौकिक 23:42 है, और जहां से पाने के बाद पहुंचने के बाद कभी गिरावट नहीं उसका नाम है अलौकिक,
यद 23:49 गत्वा नि वर्तते तद धाम परमम मम
न तद भाते 23:54 सूर्यो न शश को पावक
यद गत्वा नि वर्तते धाम परमम मम
रमण महर्षि के पास गिने गिनाए 24:02 लोग आते थे घाट वाले के पास गिने गिनाए लोग जाते हैं लीला सा बापू के पास 25 50 24:09 आदमी जा पाते थे तो इस जमाने में आज का आदमी इतना नीचे आ गया है, इतना बहिर्मुखी हो गया है 24:19 इतना उसकी चंचलता बढ़ गयी है, कि तत्व की बात आत्मा की बात या ध्यान करने का तो उस जन साधारण को बिचारे को पता 24:26 ही नहीं, एक बार गए खेरालू में सत्संग करा और थोड़ी देर ध्यान कराया तो दो चार आगेवान 24:31 उठ के खड़े हुए, कि बापजी आओ सरस बोलता आड़ तो तुमने श थ छना मोना ब लोने समय 24:37 बकड़ मैंने फिर से हरि ओम कराया फिर शांत हो गए, मैंने सोचा कि सुन सुन के तो क्या 24:43 है सूचनाएं बढ़ेगी, कल्पनाएं बढ़ेगी, जगत की, जरा कल्पनाओं के पार ले जाओ उनको वास्तविक 24:50 में जो जहां जाना है वहां ले जाओ तो मैं सत्संग करने के बाद मौन हो जाता हूं, ताकि इनको मौन होने का सौभाग्य मिले, वो फिर उठा 24:57 के बापजी त च चन तोत बंद कर नाखो भूली 25:03 गया ठ गया केज तो हम शुरू थ ब कलाक मो बापजी चालवा दो के बहु मजा आवे डवा दो 25:11 क्या अ हैंडवा दो तो फिर य मनोरंजन हो जाएगा मन की शांति कुछ अलग 25:16 चीज कथा सांड़ी सांड़ी फूट कान तो नाय. 25:21 ब्रह्म जन सात सप्ताह साभ नाख न रामायण साभ नाख ब दुर्गा सप्तसती कर 18 वर्ष थी 25:30 नरता करू छ बापजी धन लागत नथी लागे श करवा लागे ड 25:36 लागे एनेम लागे भई चड़ न ध्यान करवान मोन 25:41 करवान कोई विजय करवान अंतर विजय पान साधन कथ तुमने मल नथी एवा कोई बुद्ध पुरुष एवा 25:47 कोई ज्ञानी पुरुष ना तुमने सानिध्य म नथी बापजी तो दर नौरता मा करू छ बैठा वड़ोदरा 25:54 थ आया केला वर्ष थ नरता करतो तो बापजी मार नता करवा जरूर नहीं नता वा मने 26:02 पू ओम ओ ओ तो तुम्हारी विजय य है 12 वर्ष 26:08 अंबाजी ना दर्शन त करवा जाओ 15 वर्ष डाकर जी जाओ छ प जो तम एक 15 सेकंड तरा तत्व तो 26:16 डाकर वा री व फरे ए विजय ह इच्छ त एवी विजयना मार्गे प्रण करो तुम 26:26 भगवान के पीछे नहीं भगवान तो कहा भगवान क डाकुर में उधर या उधर नहीं बैठा माजी में 26:32 भगवान तो फिर भी वो मंदिरों के पीछे तुम घूमते हो दौड़ते हो, उन मंदिरों ने 26:39 अंदर के मंदिर को ढप लिया है, उन पुजारियों ने अंदर की पुजारियों का अंदर की पूजा 26:45 भुला दी,
एक मुसलमान फकीर बैठा 26:51 था कह रहा था कि, मेरे मालिक हे मेरे खुदा तू आजा तेरे को कंगी कर दूं, तेरे बालों 26:59 में तेल डाल दूं, तेरी दाढ़ी में कंगी कर दूं, हजरत मूसा वहां से निकले और डांटा बोले पागल क्या करते हो खुदा को कोई चेहरा 27:06 होता है खुदा को कोई ये होता है खुदा को कहीं झू पड़ती है बोले तो बा आप बताइए 27:12 बोले खुदा ऐसा है वैसा है खुदा प्रकाश स्वरूप है तेज स्वरूप है खुदा का ऐसा ऐसा नियम से करो इस नियम 27:20 से पूजन करो ऐसा करो ऐसा करो चला तो आकाशवाणी हुई, हे मूसा मैंने तुझे जहां में इसलिए 27:27 भेजा था? कहो मेरे मालिक मैंने तो कोई बुरा नहीं 27:33 किया, बोले वो जब एक अकेला बैठा था और अंतर प्रेरणा से बोल रहा था अंतर से मेरी पूजा 27:39 कर रहा था, अपने भाव की अभिव्यक्ति करके शांत हो रहा था, तो उसको तुम तोड़कर उसकी 27:45 श्रद्धा तोड़कर और उसके खोपड़ी में दूसरा कुछ थोप कर आए हो, बोले मेरे मालिक मैंने 27:51 तो आपकी उसको खबर सुनाई, मैंने कहा खुदा को दाढ़ी नहीं होती, 27:57 खुदा को भूख नहीं लगती, खुदा को बाल नहीं होते, खुदा को चेहरा नहीं होता, ये 28:02 बताया, अच्छा तो मैं कैसा हूं? बोले आप तो बस प्रकाश स्वरूप है, हजार हजार सूर्य 28:09 मिलकर भी आपकी बराबरी नहीं कर सकते, हे मेरे मालिक आप तो ला बयान है, आपका बयान नहीं किया जाता, बोले जब बयान किया नहीं 28:16 जाता, तो वो जैसा तैसा मानता था तो उसको चलने देता मैं तो अंतर्यामी तो था ना, मैं तो जानता था ना, ये मेरे को ही पुकार रहा 28:23 है, तेरी जो पूजा और प्रार्थनाएं और पद्धति है उसमें उसकी अपनी आत्मा तो दब जाती है, 28:31 तो जो लोग सुनी सुनाई पूजा करते हैं सुनी सुनाई प्रार्थना करते हैं रटी रटाई धम 28:36 करते हैं वो अत आत्मा उनकी दब जाती,
दिवाली आए ना तो घर में अपने हाथ से चित्र खींचो 28:42 तो तुम्हारी आत्मा प्रकट होगी, अपने हाथ से पोती लेकर सफाई करो, कभी घर में झाड़ू अपने हाथ से लगा लिया करो, कभी टीकड़ अपने हाथ से 28:49 पका कर खाओ देखो उसमें तुम्हारे अप अपनी आत्मा का स्वाद आएगा, तुम्हारी अपनी चेतना 28:55 निकलेगी, खैर ये ना करो तो ना करो लेकिन पूजा तो अपने ढंग से करो, नौकरो के द्वारा 29:00 नहीं और पूजा किताबी पूजा नहीं, तुम्हारे अंदर से जो भी टूटी फूटी भाषा आती है गुनगुनाओ, और अंदर अंदर बातें करो, तू कृष्णा 29:08 है, अच्छा तो कौन अर्जुन कसा, सचमुच ऐसा ऐसा वैसा उसको जानने वाला 29:15 कौन? नहीं मेरा नाम आत्मा, क्यों तेरा नाम आत्मा कि मेरा नाम, दो आत्मा नहीं होती, 29:21 अपने एकही है, ॐ ॐ ॐ देखो तुम्हारा जीवन कैसे करवट लेता है, 29:31 बू करो बराबर प शेवट विजया दक्ष मथ जरा करवट लेवानी रो छोड़ो राय की जय 29:42 द्वारकाधीश की जय माता जी नहीं आरती ना 8 रुप 29:47 बोलो बस ब पा ब प 300 चलो माताजी ने आरती 29:54 मा 300 300 बो 30:03 बो ठीक है ये सब अहंकार को खुश करने के तरीके हैं आत्म शांति का तरीका 30:09 नहीं, क्षमा करें ऐसे लोग लेकिन यह भक्ति का मार्ग नहीं है य मन खेल करता है वहाँ, , 30:16 भक्ति के नाम पर अहंकार की पोषण होती है, ऐसे चुपचाप तुम 300 दिन 10 देने वाले नहीं, 30:22 इसलिए उछामनि वाले भी कारीगर होते हैं, जहां लोभी है वहां ठोकी को भुख थोड़ी होती है, 30:31 मूर्खों का टोला है, वहां दतार को कोई गरा की मंदिर हैती है, ठीक है,
एक भूला दूजा भूला 30:39 भूला जग संसार
बिन भूला एक गोरखा जिनको गुरु का आधार
ओ ओ ओ
खैर 310 करो या 31 करो 3 30:49 लाख 10 करो जो भी करो करो लेकिन फिर भी याद रखना 30:54 कि
यत्र योगेश कृष्णो यत्र 31:02 योगेश्वर कृष्ण
यत्र पार्थो 31:09 धनुर्धर
मेरे साथ में श्लोक को पक्का करना 18 अध्याय का आखरी श्लोक है 31:15
तत्र श्री विजयो भूतीर
ध्रुवा नि तीर मति 31:23 मम, ध्रुवा नी तिर मति मम
जहां योगेश्वर 31:29 श्री कृष्ण है और धनुर्धारी पुरुषार्थी अर्जुन माना जीव है और जहां पर इन दोनों 31:36 का संगम है वहां शिवत्व की उपलब्धि हो जाती है, कुवारा रहते तो क्या हो गया, शादी 31:43 कर लिया तो क्या हो गया, धन कमा लिया तो क्या हो गया, पूरे देश के प्राइम मिनिस्टर 31:49 बन गए तो क्या हुआ, ये आखिरी विजय नहीं है ये क्षण भर का विजय है, ये तो विजय बदलते 31:55 जाते सच्चा विजय तो यह है अपने स्वरूप में डट के फिर हरकत करो तो जो भी करोगे वह 32:02 तुम्हारे लिए विनोद हो जाएगा खेल हो जाएगा और दूसरों का परम मंगल होगा ज्ञानी नो गमो 32:07 जम मारे तेम हमो हमो ने हमो ऐसे ज्ञान को उपलब्ध होने का संकल्प आज करिए
तो रात्रि 32:15 को सोते समय एक माला करूंगा रामा रामा राम करने से चित्त को 32:21 विश्रांति मिलती है और ओम ओम करने से चित्त का बल बढ़ता है ओम ओम ओम ओम और दोनों ध्वनि करने के 32:33 बाद चुप होने से चित्त परमात्मा में ठहरता है, अब जो भी तुम्हारे को अच्छा लगे ऐसा 32:38 संकल्प करो, लेकिन आज करो तो जरूर इतना आज एक मंत्र वेद का पढ़ूंगा, वेद 32:47 का मंत्र नहीं पढ़ सकता हूं तो अष्टावक्र का गीता पढ़ूंगा, अष्टावक्र का गीता नहीं पढ़ते तो बोला बाबा की ंदा वली है जो 32:53 अष्टावक्र गीता का संवाद है, तो ऐसा कोई शास्त्र लो जिसे तुम्हारा आत्म भाव जगे , 32:58 अष्टावक्र गीता नहीं समझ सको तो भोला बाबा की 33:03 छन्दावली अष्टावक्र गीता का संवाद है, पहला भाग , वो यदि अभी आश्रम में नहीं है, तो आप ऐसा 33:10 कीजिए कि, दत्तात्रेय की गीता ले लीजिए, जो साधक लोग है दत्तात्रेय की गीता को दुहराओ 33:16 मिल जाएगी, सस्ता साहित्य में और कहीं जहां भी वो नहीं मिल रही है, आपके अंदर पास में 33:22 योग वशिष्ठ तो योग वशिष्ठ के पाच द वाक्य एक दो पन्ना पढ़ो, ऐसा संकल्प कर लो, जैसा 33:28 तुम विचार करते हो ना ऐसे हो जाते हैं तो तुम्हारे जो आद्या शक्ति है, जो चिति है जो 33:34 चितावली है, जो माया है, उसके अनेक नाम है इसीलिए शक्ति पीठ भी अनेक है, ऐसा उपदेश 33:41 मेघावी ऋषि ने सूरथ राजा को दिया, और सूरत राजा ने नौ-रतों का परंपरा उसके निमित्त 33:49 चला, और उन नौ - रतों की परंपरा में जो उपासना में सफल होते हैं, तो फिर वो विजय 33:54 करने के लिए साक्षात्कार करने के लिए कदम आगे बढ़ाते, ओम शांति शांति|
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