बहुत पसारा मत करो| Part-2
सत्संग के मुख्य अंश :
विचार और समझ जितनी ऊँची होती है मनुष्य उतना ऊँचा हो जाता है ।
बचपन से मनुष्य को उल्टे संस्कार न दिये जाय तो वह जल्दी ही ईश्वरप्राप्ति कर सकता है ।
जैसा संग वैसा रंग लगता जाता है ।
जन्म-मरण क्यों चालू है उसे कैसे जानें ?
बड़े में बड़ा गुरु और मित्र हमारे साथ है उसकी आवाज कैसे सुनें ।
लीलारामजी के साथ अस्तित्व ने इस प्रकार का खेल किया !
कर्तृत्व और भोक्तृत्व चला जाय तो जीव ईश्वरप्राप्ति कर सकता है ।
अपना हृदय विशाल रखने की युक्तियाँ
सत्संग
0:01 बुद्ध अन्न खाएगा, और बुद्धु भी अन्न खाएगा बुद्ध कहेगा यह मेरा जीवन है, और बुद्धु बुद्धु कहेगा यही मेरा जीवन अन्न ही जीवन है 0:08 मेरा। अब बुद्ध कहेगा कि अन्न अन्न इसका जीवन है, मेरा जीवन और मरण इसके आधार पर 0:14 नहीं है, मैं अमिट हूं। दृष्टि में फर्क है।
घाट वाले बाबा का नाम तो तुमने कई बार सुना 0:23 है। कोई प्राइम मिनिस्टर का हेलीकॉप्टर जा रहा था हरिद्वार से, 0:30 तो मैंने मजाक की मैंने कहा देखो जा रहे हैं, अभी फलानी जगह उनकी सभा है, अखबारमें 0:38 आया है, लोग काले झंडे लेकर भी खड़े होंगे, ऐसा भी सुना 0:45 है। ऐसा कोई अपना कोई साधक को ऐसा कोई संत को ऐसा तैयार करे कि राष्ट्र के बोले भाई 0:53 जो संत है वो काहे को उलझन में पड़ेगा, जो ज्ञानी है वो उलझन में क्यों पड़ेगा, ये लोग तो देश काल में बिचारे उलझे हुए है,1:00 ज्ञानी देश काल में क्यों उलझेगा, ज्ञानी वो अपना ज्ञान का राज्य छोड़कर फिर मेरा तेरा कुर्सी में क्यों 1:06 आएगा। मैं क्या फिर क्या किया जाए बोले क्या किया जाए बस ऊंचे से ऊंचा साधकों को ऊंचे 1:13 से ऊंचा जाना चाहिए। ऊंचे कैसे जाए बोले विचारों से पहुंचा जाता है कोई हेलीकॉप्टर में बैठ के थोड़े ऊंचा से ऊंचा 1:20 पहुंचा जाता है। ऊंचे महलों में रहने से आदमी ऊंचा नहीं 1:25 होता, ऊंचे हेलीकॉप्टर में हवाई जहाजों में घूमने से आदमी ऊंचा नहीं होता, जितने विचार 1:31 ऊंचे होते जाते हैं, उतना वो ऊंचा होता जाता है, और जितने विचार हल्के होते जाते हैं, उतना वो छोटा होता जाता है।
आदमी लंबा 1:37 होने से कोई बड़ा नहीं होता, उम्र बड़ी होने से कोई बड़ा नहीं होता, जितनी समझ 1:42 बड़ी होती उतना वो बड़ा हो जाता है, और जितनी समझ छोटी होती है उतना वो छोटा हो जाता है। तो जो रुपयों से नहीं हो सकता, जो धन और 1:51 सत्ता से नहीं हो सकता, कुटुंबी और पड़ोसियों से नहीं हो सकता, जिनको जीवन भर तुम साथ में लेकर घूमते हो वे लोग जो नहीं 1:58 दे सकते हैं, वे वह बात संत लोग तुमको हंसते हंसते दे देते हैं। लेकिन फुर्सत 2:03 नहीं मिलती क्यों कि हम इतने बिखरे हुए हैं। इतना हमने आश को फैला रखा है कि हमको 2:10 अपने घर में लौटने के लिए भी परिश्रम करना पड़ता है। सच पूछो कि अपने आत्मा को जानने में 2:17 परिश्रम की गुंजाइश नहीं, ईश्वर को पाने में कोई परिश्रम करने की जरूरत नहीं है, इतना उल्टा परिश्रम कर 2:25 लिया कि ईश्वर भी एक कोई बस मजूरी का विषय बन गया। ईश्वर पाना कोई मजूरी का विषय बन गया।
हसी वो खेली वो धरि वो ध्या
अहर्निश कथ बो ब्रह्म ज्ञान
खावे पीवे न करे मन भंगा
कहे 2:42 नाथ में तिस के संगा
ऐसा कुछ संस्कार, ऐसा वातावरण घुस गया। वशिष्ठ कहते हैं राम जी 2:49 इस जीव को बाल्य अवस्था से जो मूर्खता के संस्कार न मिले बचपन से इसमें यदि मुढ़ता 2:56 के संस्कार न सींचे जाए तो मुक्त होने के के लिए कोई विशेष परिश्रम की आवश्यकता ही 3:02 नहीं है।
बचपन से गलत संस्कारों सिचे जाते हैं। बच्चों में बच्चे को मां को कहती है देख देख नालिया। 3:10 कितना अच्छा लगता है तू बड़ा होएगा, तू पढ़ेगा, तू डॉक्टर बनेगा, लोगों को चूसेगा, 3:16 बंगला बनाएगा और सुखी होंगा और सुखी क्या दूसरे सुखी है कि यह होगा फिर। तो समझते कि ये ये जुटाने के बाद सुख 3:24 होगा, ये ये जुटाने के बाद ये ये करने के बाद सुख नहीं सुख तो अभी तुम सुख स्वरूप 3:30 हो, जितनी इच्छाएं कम उतना सुख ज्यादा और इच्छा नहीं तो परम सुख का भंडार हो 3:35 गया। बहुत पसारा मत करो कर स्वरूप के 3:41 आश बहुत पसारा जिन किया वे भी गए 3:47 निराश। सिकंदर चले गए, सीजर चले 3:53 गए, अमेरिका के प्रमुख इब्राहिम लिंकन 4:03 नहीं नही
इब्राहिम लिंकन
इब्राहिम लिंकन भी हो गए, कोलीज थोड़े हुए 4:13 हा उनका बचपन बड़ा सादासुदा था। दिन भर इब्राहिम 4:21 लिंकन बापू आभ बात तो बोड़ी हमने पूछ हम बाहर की बातों को ज्यादा याद रखने की मेरे 4:27 पास वृत्ति नहीं होती है सोचता हूं सब में एक, एक में सब फिर क्या याद 4:35 रखना तो बच्चे थे, दिन भर परिश्रम करते थे किसी दुकान में 4:41 नौकरी करते थे, और शाम को किसी विद्यार्थी के किताब 4:47 उधार लेकर रात को पढ़ते थे। एक शाम को देखा कोई लक्कड़ 4:53 हार ताप में लक्कड़ काट रहा है, कटते नहीं, पसीने पसीने से तर बतर है, 5:00 हृदय भर गया दया से, लिया उसका हथोड़ा 5:06 कुहारा लक्कड़ काट के उसको दे दिए उसने जाकर बेचे तो दुगने पैसे हुए उसके हृदय के 5:11 आशीष मिली। उत्साह भरे व्यक्ति को किसी की आशीष मिल जाती है और अपना उत्साह होता है उसके 5:18 पास शक्ति थी, अनजाने में थोड़ा वेदांत था, और वह आदमी अमेरिका जैसे बड़े देश का 5:26 प्रेसिडेंट हुआ। इसी बच्चे को यदि कबीर मिल गए होते 5:32 तो, नानक मिल गए होते तो, समर्थ रामदास मिल गए होते तो, आद्य शंकराचार्य मिल गए होते 5:40 तो, अथवा इस बच्चे की मां मदालसा होती तो, यह बच्चा कहां पहुंचता वह केवल अमेरिका का प्रेसिडेंट 5:48 नहीं होता वह पूरे ब्रह्मांड का प्रेसिडेंट हो जाता। लोग उसे शायद ना भी जानते लेकिन फिर 5:55 भी वोह हो जाता ऐसे कई महापुरुष है जिनको हम नहीं जानते उनके संकल्प मात्र से उथल पाथल हो जाती है ऐसे लोग अभी भी हैं।
तो जैसा संग एनर्जी सब बच्चों के पास है एनर्जी सब जीव के पास है, शक्ति सबके 6:11 पास है, लेकिन जैसा जैसा उनको सहयोग मिलता है, जैसे पृथ्वी में रस है जैसा जैसा बीज 6:17 डाल दिया जाता है, एक ही सरोवर का पानी और एक ही इलाके की एक ही नंबर की जमीन, एक जगह 6:23 पर गन्ने हो रहा है, दूसरी जगह पर मिर्च हो रही है, तीसरी जगह पर पुदीना, और चौथी जगह पर आलू, पांचवी जगह पर बाजरी तैयार हो रही 6:31 है। क्यों ऐसा है? जैसा संयोग ऐसा रस का रूप हो जाता है, ऐसे तुम्हारे पास रस स्वरूप व 6:38 आत्मा है चेतना है।जैसा संयोग मिलता है तो बस। मैं हिंदू, मैं सिंधी, मैं गुजराती, पढ़ूं 6:45 तो पास हो जाऊ पास हो जाऊंगा तो सुख होगा यह भ्रांति घुस गई, उसी रस को हमने उसमें लगा दिया भगवान कोई आकाश पाताल में भगवान 6:52 कहीं दूर है सुख कहीं दूर है वो भी उसी की सत्ता से मान 6:58 रहे। बंदगी का था कसूर बंदा मुझे बना दिया मैं खुद से था बेखबर तभी तो सिर झुका 7:07 दिया अंतःकरण शुद्ध होता है,तो महापुरुषों का उपदेश समझ में आ जाए तब पता चलता है कि 7:13 मेरा सुख कोई आकाश पाताल में नहीं था, मेरा इष्ट कहीं इधर उधर नहीं था, बिछड़े हैं जो 7:19 प्यारे से दर बदर भटकते फिरते हैं हमारा यार है हममें हमन को बेकरारी 7:26 क्या।
इतना मिल जाए तो सुखी होंगा, इतना इतना कर लू तो सुखी हो जाऊंगा, इतना पाऊ तो 7:31 सुखी हो जाऊंगा, इतना बन जाएगा तो निराश। कबीर बोलते नहीं कबीर लाल बती दिखाते हैं 7:36 इतना करने के बाद नहीं कुछ करने के बाद सुख नहीं मिलेगा केवल जान लो कि तुम दुखी 7:42 क्यों हो। तुम्हारा जन्म मरण क्यों है? तुमको जगत का ज्ञान नहीं इसलिए जन्म मरण 7:47 हो रहा है। अपने और ईश्वर के बीच क्या फासला है 8:08 अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं और ईश्वर की व्यापकता का पता नहीं, इसलिए जन्म मरण हो रहा 8:16 है। बाहर से हम कितने भी सत्ता सामग्री सहित हो, सुखी हो लेकिन जब तक ज्ञान में 8:24 रुचि नहीं है, जब तक ज्ञानवान का सानिध्य पाकर अपने आप में हम गए नहीं, तब तक हम 8:30 सचमुच बच्चे हैं, छोटे बच्चे। ऐसे बच्चों के लिए श्री कृष्ण कहते हैं
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥
योग में आरूढ़ 8:45 होने के लिए कर्म करो और कर्म करते करते हृदय शुद्ध हुआ हो तो फिर कर्मों में से 8:50 भी समय बचाकर तुम अपने घर में लौटो।
अंतर्मुखहो जायो, अपने आप को टटोलो कोनये हो गया फिर क्या, 8:59 फिर क्या, ये पा लिया फिर क्या, यह कमा लिया फिर क्या, ये खा लिया फिर क्या, यह देख लिया 9:05 फिर क्या, यहां पहुंच गए फिर क्या?? ज्ञानसुत राजा जितना राज्य मिल गया, ज्ञानसुत राजा 9:11 जितनी धर्मशालाएं कर ली, ज्ञानसुत राजा जितने सदाव्रत खोल दिए लेकिन फिर 9:19 क्या?? अभी तो नाम मात्र रह गया वोह भी कथा में कभी-कभी सुनने को मिलता नहीं तो जान सुत जैसे कितने राजा आए और चले गए तो हम 9:27 तुम क्या होते हैं। इसलिए समय का पूरा पूरा सदुपयोग करें कि हम लोग बंधन से छूट जाए। 9:34 कमाते क्यों है खाने के लिए, और खाते क्यों हैं, जीने के लिए और जीते क्यों है कि मुक्त होने के लिए।
जिस विषय से जो कर्म 9:42 करने से आपको अपनी मुक्तता का अनुभव हो वह सब कर्म पुण्य है और जो कर्म करने से आपको 9:48 बंधन लगे जो कर्म करने से अंदर वाला आपको जरा सा डंक रहे वो कर्म पाप है।
सोक्रेटिस
महान 9:55 सोक्रेटिस,,, सोक्रेटिस से किसी ने पूछा क्या आप इतने महान कैसे हो गए बोले मेरा 10:02 एक मित्र मेरे साथ में रहता था मार भई बन मारी साथ 10:08 रहतो ज सारू सारू करवान थाय ते मने कतो करवान अने सारू ना होए य 10:16 मने ना पड़तो अने करी बैस तो पछ मने 10:23 खूब स्थि दर कर 10:28 देतो कि तुम्हारा मित्र तुम्हारे साथ बोले बचपन से मेरे साथ रहा वो मित्र अभी भी है 10:34 और उसी कारण मैं इतना अच्छा बन पाया हूं। बोले कौन 10:40 था मैं कुछ भी करता हूं पहले भीतर भीतर वाले मित्र से मैं पूछ लेता 10:45 हूं, शांति से की मैं अज्ञानी मैं कुछ जानता नहीं तू जैसा कहे ऐसा कर ये मित्र ने मैं 10:52 साथ रखा। उस मित्र को मैंने साथ में रखा है। और वोह मित्र है सबके पास और सबको कहता 10:58 रहता है कोई सुनता है कोई नहीं सुनता है जो सुनता है तो कोई अमल करता है कोई नहीं करता है|
कोई अमल करता है तो बेड़ा पार हो जाता है, नहीं अमल करता है तो फिर वही होता है जैसा सबका हो रहा है। मित्र सबके साथ 11:13 है।बड़े में बड़ा गुरु साथ बैठा है, बड़े में बड़ा मित्र साथ बैठा है, और बड़े में 11:18 बड़ा गुरु और बड़े में बड़ा मित्र है यह सुनाने के लिए उस मित्र के आवाज नहीं सुन पाते इसलिए बाहर का किसी गुरु के द्वारा 11:25 भी वही मित्र सुनाने को ही तत्पर हो रहा है। बाहर के गुरु गुरु के द्वारा भी सुनाता 11:30 तो वही है। अंतःकरण शुद्ध होगा तो उस मित्र की 11:36 आवाज सुनने के कान खुलेंगे और अंतःकरण अशुद्ध होता है तो उस मित्र की आवाज वासना 11:42 सुनने को नहीं देती।
डायोजनिस्ट
जैसे वह आ रहा 11:47 था सिकंदर,, गुरु ने 11:53 पूछा कहां जाते हो बोले राज जीतने को, बोले राज जीत के 12:00 क्या करोगे, बोले फिर दूसरा जीतूंगा, डायोजनिस्ट ने कहा समझो दूसरा जीत लिया फिर क्या 12:05 करोगे, बोले तीसरा चौथा, फिर भारत जीतूंगा।डायोजनिस्ट हसे बोले समझो भारत जीत लिया फिर क्या 12:13 करोगे, बोले फिर शांति से रहूंगा, शांति से बाद में शांति से ही रहना है, ना तो अभी 12:19 नदी बह रही है, हवाए गुनगुना रही है पक्षी गीत गा रहे हैं, ठंडा ठंडा हवा आ रही है, 12:26 खाने को साल भर का है, फिर इतना इतना मोल क्यों लेते हो। शांति थ जीव बधू करी पछ 12:32 आनंद ले शांति ले ब जाला बोले बात तो सच्ची है लेकिन अब निकल 12:40 पड़ा हूं जाने दो। निकल पड़े तो बैठ भी सकते हो वहां जाकर बैठना इधर उधर होकर भी 12:46 और यह जरूरी नहीं कि तुम वापस यूनान को पहुंचो। ये सब विजेता होने के बाद तुम सुखी 12:52 हो जाओ यह जरूरी नहीं और बाद में तुम शांति से रह सको यह भी जरूरी नहीं है। तो जान जा की नाथे सवारे सुथा से 13:01 बड़े-बड़े महात्माओं का शरीर जो ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया उनको भी जवानी में बीमारी ने घेर लिया और मौत के 13:08 शिकार हो गए, कोई पता है कल की बात का। अंगूठे छाप 13:14 व्यक्ति करोड़पति लाखों पति और डबल ग्रेजुएट 500 की नौकरी के लिए बेचारा अर्जिया लिखता 13:21 है।प्रारब्ध वेग का खेल है, कर्मों की गति किसने देखा कि तू यह करने के बाद इतना 13:27 करने के बाद वैसे ही रहेगा यह जरूरी नहीं है अंगूठा जिनको अंगूठे छाप वह करोड़पति 13:35 उनके पास एलएलबी पड़े लिख के लोग नौकरी करते ऐसे लोगों को मैं जानता 13:42 हूं। डबल ग्रेजुएट 500 नी नौकरी माटे पोस्ट ऑफिस में अरजी कर पोस्ट ऑफिस वाने खता न 13:47 कारण के भलो जल्दी ज र बजाने खेने 500 नौकरी न 13:53 म जो हाओ मानले को चप जानता हाओ
श्री राम 14:01 बूढ़ा है, रेंक रहा है, खाने को नहीं है, घर वाले कहते कब मरेगा खा खा कर रहा है रात 14:06 को नींद नहीं आती है दिन को चैन नहीं पड़ती, सुनाई नहीं पड़ता 80 साल हुए 81 चालू है और जवान जवान अभी शादी करके आया छ 14:13 महीने के बाद मर गया कोई पता है।
जड़ा जिए जरे पयो तो मल कंद मर्द मारे 14:23 पयो तू ऐसा मत सोच के मैं जाऊंगा विजेता होऊंगा यह करूंगा बाद में फिर युयान को पहुंचगा 14:30 और आराम से जिऊंगा, बात तो आपकी गले तो उतरती है, बात 14:35 तो सच्ची लगती है लेकिन अब निकल पड़ा हूं महाराज गुरुजी डायोजनिस्ट मुझे जाने तो बोले जाओ 14:40 और सच तो ये है कि वो पहुंचा नहीं रास्ते में मर गया। 14:48 बेचारा क्या करिए क्या जोड़िए थोड़े जीवन काज छोड़ी छोड़ी सब जात है देह गेह धन राज 14:58 देह गेह धन राज देह देह रहता है जिस घर में वो गेह धन और राज
क्या करिए क्या जोड़िए थोड़े जीवन काज
छोड़ी छोड़ी सब जात है देह गेह धनराज|
हाड बड़ा हरि भजन कर द्रव्य बड़ा कछु दे
अकल बड़ी उपकार कर जीवन का फल ए|
उपकार तो दूसरे का न कर तो 15:24 तेरी कोई ज्यादा चिंता की बात नहीं कम से कम अपना तो उपकार कर। 15:30 और मजे की बात है जो अपना उपकार नहीं कर सकता वह दूसरे के उपकार का कभी ठेका उठाए तो समझो खतरनाक 15:36 आदमी है।
महात्मा बुद्ध के पास एक सेठ आए उन्होंने कहा कि महाराज मैं अब आपके शरण आ 15:43 गया हूं और आज के बाद मैं यह अपना पूरा जीवन संसार के कल्याण में लगा 15:49 दूंगा मेरे पास छोटा सा राज्य था अब मैं पूरा राज्य लगा दूंगा भगवान के काम बुद्ध 15:57 के आंखों से आंसू टपकने लगे भिक्षु आनंद ने देखा कि क्या बोला तो , हमारे गुरु को हमारे गुरु के कोमल हृदय पर ठेस लगा दिया आंखों से आंसू आ गए हमारे गुरु के आंसू हम नहीं देख सकते व आदमी 16:09 घबराया बोले हमने तथागत को तो कुछ कहा नहीं हमने तो केवल यह बात कहा ताकि वह खुश हो जाए मैंने कहा मैं मेरी संपत्ति मेरा 16:17 राज्य लोक कल्याण में हम लगा दूंगा लोगों की सेवा करने में अपना जीवन 16:22 बिताऊगा बुद्ध ने कहा मित्र उसी लिए मुझे रोना आ गया, मेरे आंसू टपक गए इसी लिए तूने 16:28 मुझे कुछ नहीं कहा लेकिन मुझे दया आती है कि तू दूसरे के कल्याण में लग गया अब तेरा कल्याण कौन 16:36 करेगा। तेरा कल्याण तू जब तक करने को नहीं होगा तब तक मेरे जैसे 33 करोड़ देवता और 16:41 बुद्ध आ जाए तो भी कल्याण होना मुश्किल है। कम से कम अपना कल्याण तो तो करो और का करो 16:47 या ना करो अपना कल्याण तो करो। अपना कल्याण यह है कि तुम कर्म करो कर्म में कर्तृत्व 16:54 ना आने दो। कि साई तीजी तारीख है तीसरी तारीख जो आएगी कर्म करने का मौका मिलेगा 17:01 हम हमारे ठक्कर नगर में अगले साल अज 2000 बच्चों को भोजन कराया, इस साल भी दो हजार 17:07 बच्चे बच्चियों को भोजन कराएंगे। हम वाड़ेच में कराएंगे, हम कुबेर में कराएंगे, हम वो कराएंगे, कहने को कह दो हम कराएंगे लेकिन 17:14 समझ लेना कि अस्तित्व करा रहा है, तुम कुछ नहीं हो। श्रीराम,,,, कराने वाला करा रहा है हो 17:20 रहा है तुम केवल देखते जाओ, निमित बन जा, निमित मात्र भवा अर्जुना, और निमित भी सच 17:26 पुछो तो निमित भी कौन बनता है? हाथ निमित बनते हैं अकेले नहीं, आंख निमित बनती है नहीं, आंख की अपनी सत्ता नहीं हाथ की अपनी 17:34 सत्ता नहीं जिवा की अपनी सत्ता नहीं, नाक की अपनी सत्ता नहीं, मन की अपनी सत्ता नहीं, 17:40 और तुम उलझे तो कि मैं निमित बना। मैंने किया, तूने क्या किया, भाई ये पांच भूतों के 17:46 पुतले से हुआ है, अस्तित्व की सत्ता से हुआ है, और अस्तित्व की सत्ता से उन्होंने खाया 17:52 है, खुद हीने खाया और खुद ही ने खिलाया है बस।।।। तू मजा ले खाने वाला राम, खिलाने वाला 17:57 राम, मेरा मैं मैं बीच में होता क्या।
भजन
राम जी की चिड़िया और राम जी का खेत
राम जी की चिड़िया और राम जी का खेत
खा ले मेरी चिड़िया तू भर भर पेट
खा ले मेरी ………..
राम जी की चिड़िया और राम जी का खेत
राम जी की चिड़िया और राम जी का खेत
तुकाराम किसी का खेत लिया था भागीदारी में साझेदारी में, और आधा आधा खेत में किया था 18:37 किसी का वो खेत में जब अन्न लगा तो चिड़िया खाने लगी तुकाराम सोचते अब इनको 18:45 भगाओ क्या जिसको भगाना है ममता को उसी को भगाओ यह खेत मेराहै, यह अनाज मेराहै, यह बच्चे 18:51 मेरे है, मेरा मेरा करके तो सदियों से आए। अब मेरा मेरा हटाओ लेकर बैठ गए राम जी की 18:57 चिड़िया और राम जी का ले मेरी चिड़िया तू भर भर पेट।
खेत के पड़ोसी 19:03 ने जाकर मालिक को कहा कि बावा नाल से बधक अ दो भागता गयो खेत का मालिक आया देखा 19:11 के सचमुच ये तो खड़े में आएगा नहीं तो आधा आधा करेगा भी कैसे बोले हमारे को हर साल 19:17 30 मन आता था, तुम्हारे को दिया कि 30 नहीं तो 25 मन तो ऐसा आना चाहिए, और तुम तो राम जी की चिड़िया राम जी का खेत कर रहे हो 19:24 हमारे को मिलेगा क्या। गांव के सरपंच को आवान को लाया बीच में। तुकाराम ने कहा ठीक है तुम्हारा 25 मन कहो 19:32 30 मन कहो तुम्हारा ऐसा तुम ले जाना बाकी का बचे मेरे को देना। जरा पकने दो माल बोले 19:38 बाकी का बचेगा नहीं, तुम्हारा मैं क्या ले जाऊंगा, तुम्हारा तो तुम्हारा रहा लेकिन मेरा जाता है। उन्होंने कहा ऐसा नहीं होगा तुम 19:44 धैर्य रखो, और कथा कहती कि समय बीता खड़े में माल आया दिखता था थोड़ा तोलते तोलते 19:50 उस आदमी के 30 मन गए और बाद में भी 32 35 मन बढ़ गए।
तो जो आदमी कर्तृत्व छोड़ देता 19:57 है उसके साथ अपनी अठखेलिया करता है,
स्वामी लीलाशाह जी बापू
जैसे लीला सा बापू लीलाराम नाम था बचपन में 20:04 मां-बाप मर गए मेरे गुरु जी के, फिर काका के साथ रहते थे, और काका ने कुछ पैसे दिए 20:10 खरीदी करने के लिए। और खरीदी करने गए दो बैल गाड़िया भरा के अपने गांव ले जा रहे थे गुड़ था, चीनी थी, मैदा था, आटा था, बेसन 20:20 था, और भी जो कुछ सीधा सामान होता है, खाने पीने का किराणा की, दुकान के रास्ते में 20:26 देखा दुष्क ग्रस्त लोग टोले के टोले भूखे पड़े हैं, लीलाराम के मन में आया कि ले 20:31 जाऊंगा, आदमी ही तो खाएंगे और यह भी आदमी बाकी रहा पैसे की लेनदेन, अब उसके नाम पर खिला दो, उनको बोला 20:40 ये मेरे पास सामान है आप लोग रोटी बनाकर खाओ तो तो भूखे प्यासे तो हुआ हुआ करके दोनों गाड़े खाली कर दिए, बारदाना दे दिया, 20:47 अब वो लीलाराम कांपते कांपते आए काका के पास बदाम में वो बारदान डाल 20:54 दिया काका को दे दिया चाबी, बोले माल ले आया बोले हां, कहां है बोले गोदाम में, 20:59 अच्छा बेटा, जा थक गया, होगा कल लिखेंगे माल नोंदणी कर देंगे अब कल वो दुकान पे आवे नहीं क्योंकि माल क्या है उसको पता था”
लीलाराम घबराए कांपते काका ने कहा अच्छा तेरे को बुखार बुखार आ गया फिर देखेंगे एक 21:12 दिन दो दिन बीताय भाई तो कांपते कांपते दिन बिता रहे कि भगवान अब तू ही जान मैं तो कुछ नहीं जानता हूं, करण कराव हार 21:19 स्वामी, तू ही कराता है तूने मौज दिलाई, अब तू ही जान मैं कुछ नहीं जानता मैं कुछ नहीं तू ही तू 21:26 है।
एक दिन शाम को एका एक काका आया बोले लीला लीला तू इतना ऐसा बढ़िया माल आया हो 21:32 तो कहां पे बढ़िया माल करके पकड़ेंगे और देंगे। बोले काका भूल हो गई बोले नहीं बेटा 21:38 भूल क्या मैं तो सोचा कि तो तेरे को ठग लेंगे लेकिन तू बहुत अच्छा पैसे भी खुटे नहीं इतना ये फर्स्ट क्लास चावर 21:46 किथ य सुजी फर्स्ट क्लास आ चावर भी फर्स्ट क्लास य सब और पैसा खुटा 21:53 नहीं बोले नहीं पैसे तो पूरे हो गए माल भी पूरा हो गया माल कैसे पूरा गया बोले बाबा 21:59 काका वो बारदान जरा काप रे बोले नहीं नहीं बेटा भरा हुआ है, चल मैं तेरे को दिखाता हूं तेरे को क्या हो गया बुखार है ना उसी 22:06 लिए तेरे को जरा गड़बड़ हो गई। और लीलाराम को काका ले गया गोदाम में गोदाम खोला और 22:12 देखा कि जो खाली बारदान रखा था वो पैक हो गया है। लीलाराम ने कहा कि जिस परमात्मा 22:18 ने जिस परमात्मा ने मेरी लाज रखी है जिसने इस गोदाम में आकर अंदर बाहर से ताला लगा, 22:26 फिर भी भरने की जिसमें सत्ता है, मैं उस उसी सत्ता को देखूंगा, अस्तित्व को देखूंगा। लीलाराम ने दुकान छोड़ दी और चल दिया और 22:33 लीलाराम में से साई लीलाशाह बन गए।
कहने का मतलब यह नहीं कि साई लीलाशाह 22:39 बड़े हैं और तुम छोटे हो ऐसा मैं नहीं कहता। मेरे गुरु जीी इसलिए वो बड़े थे ऐसा मैं नहीं कहता मैं कहता हूं कि तुम भी 22:45 उनसे एक तिल भर कम नहीं हो। लेकिन फिर भी हम तुम उनसे एक तिल भर भी कम नहीं है 22:50 उन्हीं के वचन है। लीलाशाह बापू बोलते थे कि मैं गीता सिर पर रखता हूं आशाराम, तू 22:56 हमारे से कम नहीं है भाई तू विश्वास नहीं करता है। हमारे मन में होता था बापू तो बापू है 23:01 अपने तो अपने है तो यह संदेह, ये लघु ग्रंथि हमारे में घुसी है। एक बार सुबह चार बजे सत्संग सुनाते सुनाते मौज में आ गए 23:09 बोले कईयों को होता है कि हूं तो मैं ब्रह्मा हूं, तो आत्मा लेकिन अब साई बड़े और मैं छोटा हू भाई।। आऊ छा कर लीलाराम लीला 23:16 सा छा करे मा गीता मथे दे तो खना समझ गए गीता मथे दे तो खना मां कसम तो खा ज को 23:24 लीलाशाह है सो आशा राम तू है ज को तू है सो मा दुनिया में सजी वही है
सब वही है 23:30 लेकिन हमारे अंदर कर्ता पना, भोक्ता पना, और देह की आसक्ति हो गई, उन महापुरुषों के 23:36 अंदर इतना टूट गया इसलिए वह महान दिखते हैं, और हम लोग छोटे दिखते हैं हमारी नासमझी ने हमको छोटा कर दिया और उनकी समझ 23:43 ने उनको बड़ा कर दिया। ओम ओम ओम तो कृष्ण कह रहे हैं आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ॥ तुम्हारे अंदर यदि कर्तृत्व चला जाता है तुम्हारे अंदर 24:03 भोक्तापन चला जाता है, सच पूछो तो जुड़े हुए हो, लेकिन धारणा और मान्यताओं के कारण असीम से 24:09 तुम बिखर गए, और फिर तुम्हारी बुद्धि और वृत्ति में मन में जितना जितना आता है, 24:16 उतना तुम समझते हो कि मेरा और जो तुम्हारे मन बुद्धि में नहीं आता वो बोलता और किसी का है। केवल लीला सा बापू के जीवन में 24:22 चमत्कार घटे ऐसी बात नहीं है।
ज्ञानेश्वर महाराज
ज्ञानेश्वर महाराज जनमें में थे तो जन्म 24:29 जात वे सिद्धियां लेकर जन्मे थे, सिद्धियां तो थी लेकिन भक्ति के बिना, प्रेम के बिना, 24:35 सिद्धियां भी मजा नहीं देती। एक बार नामदेव के पास गए ज्ञानेश्वर 24:40 उन्होंने कहा चलो तीर्थ यात्रा को जाएंगे नामदेव ने कहा तीर्थ यात्रा को तो 24:46 जाएंगे लेकिन मैं मेरे मित्र से पूछूंगा मेरे प्रभु से पूछूंगा। गए मंदिर में कि मैं प्रभु जाऊं 24:52 तीर्थ यात्रा ज्ञानेश्वर के साथ तीर्थ करने जाऊं ज्ञानेश्वर सोचते कि क्या बोल 24:57 रहा है मूर्ति के आगे। निमित तो मूर्ति होती है लेकिन अपना हृदय पिघलता है। अपना हृदय पिघलता है तब अहंकार पिघलता है और 25:04 अहंकार जब पिघलता है तो मित्र की आवाज सुनाई पड़ती है, बोलते कि वो बोला लेकिन बोलता तो यही है इसी ने उसी को बनाया है। 25:11 लेकिन ये पता नहीं चलता उस उसी से पूछकर भी आवाज इसकी होती 25:16 है।
अपने साधक एक बैठे उन्होंने कहा कि बापू हमारे कार में कोई अमुक अमुक आदमी थे। 25:23 पुण्य अपने काम आवे मैं बात तो साची कि अमुक माणस साथे तो य निक झट लेन ने 25:29 एक्सीडेंट न पड़ बजान जराए वाग एक नख प जराए चिरा नहीं कोने एक बजान नख प लागयो 25:35 नहीं होता है कर्मों की गति बराबर है तो नामदेव ने 25:42 पूछा भगवान से हृदय पिघल गया, आज्ञा मिली ज्ञानेश्वर और नामदेव दोनों यात्रा करने 25:49 को गए वो जमाना था कुए में रस्सा डालते थे पानी निकालने को। कई ऐसे मारवाड़ में फस गए 25:56 होंगे राजस्थान में चले गए होंगे दूर पानी था रस्ते बस्ते काम नहीं देते थे”।
खूब प्यास गला सुख रहा था। लू चल रही थी, ज्ञानेश्वर ने देखा कि अब पानी तो चाहिए 26:09 कुआ गहरा पानी है, बड़ा मुश्किल से कुआ मिला था सुबह से ढूंढते ढूंढते दोपहर को 26:14 पनघट पर पहुंचे। और बया बन में पनघट बया बन में कुआ पानी कैसे लाया 26:21 जाए ज्ञानेश्वर महाराज सिद्धियों के बल से कुए में गए और कमंडल भर के बाहर आए। नामदेव 26:27 बोलते का झूठा पानी मैं नहीं पीता। मेरे प्रभु को भी तो प्यास लगी है, 26:34 उनको सिद्धियों का पानी क्या वो हमारे प्रभु को छोटे हैं कि सिद्धियों के हाथ का पानी पिएंगे, व अपनी कृपा करें उनको प्यास 26:41 लगी तो व अपनी कृपा करें व उनको पीना होगा तो अपने आप देंगे, ऐसे करके उनके आंखों से 26:47 दो आंसू टपके और कुआ भर गया नामदेव ने खोबा से लेकर भगवान को भोग लगाकर पिया तो 26:54 हमारे अंदर कर्तृत्व नहीं होता है। और भाव से प्रेम से जब हम भर जाते हैं तो उस वक्त 27:01 जो घटना घटती व परमात्मा की लीला होती है। तुम चाहो तो अपने अंदर जो गुमडा है उसको 27:07 भी नहीं मिटा सकते हो और यदि तुम हट जाते हो तो अस्तित्व चाहे तो मुर्दे को भी जिंदा कर सकता 27:14 है। मजे की बात है तुम मुर्दे को जिंदा करना चाहो तो नहीं कर सकते हो जब तुम खो 27:19 जाते हो उसकी कुछ लीला होती है, तुम्हें लोगों के सेवा करने का मौका देने के अथवा तुमको प्रसिद्ध करने का अथवा जो भी कुछ उस 27:26 अस्तित्व की मर्जी होती है, तो गूंगा बोलने लगता है, सप्तम स्वर में गूंगा बोले तो 27:32 जितना जितना हम हट जाते हैं, जितना जितना हम भीतर से वाले से वफादार होते हैं, उतना 27:38 उतना उस भीतर के मित्र की आवाज सुनाई पड़ती है, तो निष्काम कर्म करते समय लोगों 27:44 को निष्काम दिखे, लेकिन अंदर तुम ढूंढते रहना कि सचमुच निष्कामता है कि अहंकार 27:51 को पोषाने के लिए कर रहे हैं। सचमुच निष्कामरा होता है कि नश्वर चीज की कामना है। सचमुच 27:58 निष्काम होता है प्रभु के साथ प्यार करने के लिए हमारा जीवन है कि हार्ड मास को 28:04 प्यार करने के लिए हमारा जीवन है। तुम अपने आप के परीक्षक जब तक नहीं बनोगे तब तक 28:10 बाबा 33 करोड़ क्राइस्ट, कृष्ण, मोहम्मद, राम, रहीम सब आ जाए फिर भी गाडा तो वही घूमेगा, 28:19 जहां से घूमता आया है। और तुम यदि सतर्क हो गए तो एक गुरु का एक वचन भी काफी हो 28:25 जाएगा।
सतर्क होने के लिए बारबार सत्संग सुनो जो सत्संग नहीं करेगा वो कुसंग जरूर 28:33 करेगा। जो सत्संग नहीं करता वोह कुसंग जरूर करता है।
जो अंदर में डुबकी नहीं मारता वह 28:39 बाहर जरूर डूबता है, इसलिए जितना हो सके अंदर डुबकी मारो। 28:45 सुबह, शाम, दोपहर काम करने के बाद एक कलाक काम करने के बाद एक मिनट डूब 28:51 जाओ, ब्राह्मण त्रिकाल संध्या करता है, दोपहर, शाम, सुबह लेकिन साधक तीन काल संध्या 28:58 करेगा तो फिर आगे इतना तो लोग करके आए साधक का जीवन तो हजारों जन्मों का काम इसी 29:04 जन्म में करने का होता है। साधक को तो 12 संध्या करनी चाहिए हर एक कलाक बीते और 29:09 संध्या कर लो। एक घंटे की संधि छह से सात के बीच की संधि, सात से आठ के बीच की संधि, 29:15 आठ से नौ के बीच की संधि, और उस संधि में एक दो मिनट देखो कि जो कुछ हो गया शरीर 29:20 पांच भूतों के पुतले से व अस्तित्व की सत्ता से मैं मैं कौन हूं? मैं मैं कौन हूं 29:25 मुझे ही पता नहीं, तो मैंने करता बरना करना करता मानना भोगता मानना एकाएक को हो गया 29:31 अपमान हो गया कि आड़ मास का हुआ है मान हो गया कि ईसी का हुआ। दुख मिल गया अनुकूलता 29:37 मिल गई कि इसको मिली। और प्रतिकूलता मिली तो इसको मिली और ऐसा कोई आदमी नहीं जिसको सदा अनुकूलता मिलती रहे। ऐसा कोई आदमी नहीं 29:45 जिसको सदा प्रतिकूलता मिल ऐसा कोई नहीं जिसका सदा के लिए यश होता रहे, और ऐसा कोई नहीं जिसका सदा के लिए अपयश होता रहे।
यश 29:53 अपयश, अनुकूलता प्रतिकूलता ये सब बाजी घर की बाजी है, 29:58 यह सब खेल है इस खेल को यदि खेल समझा वाह वाह।। तेरी मर्जी पूरी हो वाह गुरु गुरु का 30:05 गुरु आत्मा है बोलो वाह गुरु वाह वाह गुरु वाह किसी ने गाली दे दिया कि वाह गुरु, धन्यवाद दे दिया वाह गुरु, रोटी खिला दिया 30:12 वाह गुरु, धक्का मार दिया वाहा गुरु,
मैंने सुनाई थी आज से छ 12 महीना पहले कथा किसी 30:19 राजा का नियम था कर्म करना है पुण्य कर्म करना है साधु 30:25 को खिलाए बिना ना खाऊंगा उसके प्रतिज्ञा थी कोई ना कोई अतिथि गांव में आ जाए वजीर 30:31 ढूंढ के आते थे नया साधु आ जाए उसको भोजन कराना। महाराज एक दिन दोपहर के 12 एक बज 30:37 गया कोई साधु मिला नहीं राजा का व्रत था जब तक किसी अतिथि साधु को ना खिलाया 30:44 सन्यासी को तब तक ना खाऊंगा पाप तो पाप है लेकिन पुण्य भी अपने 30:51 अंदर गांठ बांध लेते हैं, पुण्य करने की मना नहीं है पाप करने की मना है पुण्य करने की मना नहीं लेकिन पुण्य में कर्ता 30:58 पन रखने की मनाहै। बड़ी मुश्किल से एक ताजा तवाना तगड़ा है, आया होगा कहीं नेपाल व्यापार से साधु हाथ लग 31:12 गया वजीर ले आए व्यवस्था हो गई राजा ने धर थाली देखा 31:20 कि पैर मेले हैं हाथ धोता नहीं, राजा ने कहा कि महाराज आप हाथ पैर धो 31:26 लीजिए, स्नान कर लीजिए, मानो राजा के उस पुण्य कर्म को 31:32 परिपाक करने के लिए भगवान ने उस फकीर को भेजा हो। वो फकीर बोलता है कि तूने भोजन 31:38 करने को मेरे को बुलाया कि हाथ धोने को बुलाया है, तूने भोजन करने के लिए मुझे लाए हो कि 31:47 स्नान कराने के लिए लाए हो, स्नान करना ना करना मेरी मर्जी की बात है, हाथ धोना ना 31:52 धोना मेरी मर्जी की बात है तुम मेरे पर हुकुम चलाते हो, तुम्हारा हुकम लोगों के 31:58 ऊपर है तुम्हारा हुकम फकीरों के ऊपर थोड़ा है, मैं तुम्हारे राज्य का नागरिक थोड़ा हूं, मैं रोटी खाने को आया हूं नहाने को 32:05 नहीं आया हूं। राजा को देखा कि कैसा साधु है, पैर गंदे, मैले हाथ, मेले इसको भोजन बोले 32:13 चलो शुद्र कहे के, अब राजा के सामने फकीर क्या बोले बोले ठीक है मैं शुद्र हूं या 32:19 तू शुद्र है तो बाद में पता चलेगा मैं जाता हूं वो फकीर चल दिया कथा कहती है कि 32:25 आकाशवाणी हुई के राजन वो साधु कितने साल का था बोले भगवन करीब 36 साल का बोले आज 32:33 तक वो बिना नाहे रहता है बिना हाथ धोए खाता है मैं इसको खिलाता रहा और तू एक दिन उसको नहीं संभाल 32:40 सका। मैं युगों से ऐसे व्यक्तियों को संभालता है, तू एक दिन नहीं संभाल सका और तू वो समझता कि मैं दानी 32:47 हूं। अपना हृदय विशाल रखो संभालो थाम लो कोई गिरता है तो थाम लो 32:55 गिरता है तो थाम लो। हम लोग दूसरे को तो नहीं संभालते सच पूछो 33:01 अपने कुटुंबी को भी नहीं संभालते और अपने आप को भी नहीं संभालते और मजे की बात है कि जो जिसने अपने आप को संभाला है वही 33:08 दूसरे किसी को संभाल सकता है, जिसने अपने को नहीं संभाला वह दूसरे को संभालने का दावा कर सकता है लेकिन संभाल नहीं सकता 33:15 है। कम से कम अपने आप को संभालो दूसरे को मत संभालो ले अपने आप को संभालोगे तो दूसरे संभल जाएंगे और अपने आप को नहीं 33:22 संभाला तो महाराज दूसरे को संभालने की भ्रांति होगी।
मैं पुत्र को संभालता हूं 33:27 आधो प्रेम आपे छो छोकरा मां-बाप छोकरा ने प्रेम करे संभाले पर आधो प्रेम आपे
जिस 33:34 प्रेम में अनुशासन नहीं वो प्रेम नहीं वो तो मोह है और जिस अनुशासन में प्रेम नहीं है वो तो फिर लड़ाई है बॉर्डर पर 33:44 है। मैं दो चौपाइयां गाया करता हूं, उमा संत 33:50 की यही बढ़ाई उमा संत की यही बढ़ाई 33:58 मंद करत तही करत भलाई मंद करत 34:05 तही यह प्राचीन चौपाई है पुरानी चौपाई और फिर नई आई उमा कली की यही बढ़ाई उमा कली 34:17 की यही बढ़ाई खाव ही रोटी करही 34:23 लड़ाई खाव रोटी।
आजकल हम अन्न खाते हैं लड़ाई करते हैं उस 34:31 अन्न से ब्रह्म रस बनना चाहिए, जो अन्न खाकर ब्रह्म रस बनाया जाता था, कोई मंद 34:37 करता था तो हम भलाई करते थे अब हम अन्न खाते हैं तो कोई भलाई करता उसके साथ भी हम 34:43 लड़ाई करते हैं। मोर हल म श्री राम जाओ 34:53 सतनाम जिन हाथों ने हजार हजार बार संभाला हम हाथों को भी जलाने के लिए तैयार हो 34:59 जाते हैं, जिन हृदय ने बार-बार थामा उस हृदय को भी हम ठोकर लगाने को तैयार हो जाते हैं क्योंकि हमारे अंदर इतना रजोगुण 35:06 इतना अहंकार इतना फाका आ जाता है कि हमें पता ही नहीं चलता कि हम जिस डाल पर खड़े 35:11 उसी डाल को हम काट रहे हैं श्री राम |
* * * * *
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें