सत्संग के मुख्य अंश :
जिन पदार्थों, व्यक्तियों से हमने ठोकर खायी उन्हीं की अपेक्षा हम गुरुद्वार पर जाकर करते हैं... कितना उचित ?
इसके पीछे का कारण है "माया"... विस्तृत वर्णन !
जहाँ शक्ति का पुंज श्रीकृष्ण और पुरुषार्थी अर्जुन है वहाँ श्री, विजय अचल है !
9 दिन की एकाग्र की हुई शक्ति को शुभ मार्ग पर ले जाने का संकल्प करने का दिन है "विजयादशमी" !
पुरुषार्थ तो हो पर अंधा पुरुषार्थ नहीं, शास्त्र सम्मत हो !
यह है असली पुरुषार्थ और यही संदेश है विजयादशमी का !
की हुई प्रतिज्ञा कैसे सफल होती है ?
जब भीष्म ने पांडवों को मारने की प्रतिज्ञा ली तब श्रीकृष्ण ने क्या युक्ति की ?
"0:00 यत्र योगेश्वर कृष्णो, यत्र योगेश्वर कृष्ण , यत्र पार्थो 0:11 धनुर्धर,यत्र पार्थो 0:11 धनुर्धर, तत्र श्री विजयो 0:21 भूती ध्रुव नीति मति मम ,
0:30 जहां पर योगेश्वर कृष्ण है, और जहां गांडीव धारी धनुष्य धारी अर्जुन है 0:39 वहीं पर श्री विजय विभूति और अचल नीति है ऐसा मेरा मत है, यह संजय कर रहे 0:48 हैं, भगवत गीता के 18 अध्याय का यह आखरी श्लोक है, 700 श्लोक के आखरी शलोक 0:57 है, ये कृष्ण का कहा हुआ नहीं अर्जुन का कोई प्रश्न नहीं है और कृष्ण का 1:03 कोई उत्तर नहीं है संजय का अभिप्राय है संजय का अपना मत 1:14 है, लेकिन केवल संजय का मत नहीं है सब 1:20 शास्त्रकारों का मत है, सब धर्म ग्रंथों का मत है, कि जहां योगेश्वर शक्ति का पुंज कृष्ण, 1:30 कृष्ण मना शुद्ध सच्चिदानंद अनंत अनंत ब्रह्मांड को सत्ता स्फूर्ति देने 1:36 वाला, जहां पर वो तत्व है और पुरुषार्थी जीव अर्जुन जहां पर है वहां पर विजय होगा 1:48 ही,
नौ दिन के नौ-रतों के बाद ये दसेरा विजयलक्ष्मी के नाम से प्रसिद्ध है, साधक 1:56 नव दिन जप तप करता है, उपवास करता है, नृत्य करता है, क्रिया करता है, पुण्य करता है, नौ 2:05 दिन के बाद उसके जीवन में कुछ महसूस होता है कि मेरे में कुछ है, मैंने कुछ शुभ किया 2:10 है, मैं कुछ और कर सकता हूं, नौ दिन शक्ति की उपासना के 2:17 बाद सफलता के जगत में प्रयाण करने वाले व्यक्ति मानते हैं कि अब हमारी विजय होके 2:22 रहेगी, क्योंकि माता की आराधना किया है शक्ति की उपासना 2:28 की है,
सूरत नाम के राजा रघुकुल में उत्पन्न हुए 2:33 थे, सूर्यवंश में उत्पन्न हुए थे रघु राजा तो बाद के हुए, सोरथ राजा जब राज से ठुकराए 2:42 गए, मित्रों ने और कुटुंब ने अपमानित कर दिया, शत्रु ने राज्य ले लिया, चारों तरफ से 2:49 निराश होकर 2:55 चले, तो घूमते घामते अरण्य में भटकते भटकते आत्म 3:03 साक्षात्कारी पुरुष मेघा ऋषि के आश्रम में पहुंचे, मेघा ऋषि के आश्रम में साधकों की 3:11 शिष्य बधधता गुरु के प्रति अहो भाव और आदर, 3:16 चेहरे पर निर्भयता और प्रसन्नता, आश्रम वासियों के देखकर सूरत राजा प्रभावित हो गए, और आश्रम 3:25 का सुरम्य वातावरण भी उन्हें वहां रहने के लिए बाध्य कर चुका था, और सब जगह से ठोकर 3:32 भी खाए थे, वहां रहने लगे उन दिनों में 3:41 ही एक नगर सेठ धन 3:48 दौलत मुनिमॉ ने उलट सुलट कर दी, शत्रुओं ने विरोध करा, समाज में बेज्जती हो गई और वह 3:56 भी कुटुंब से परिवार से उब कर ठुकरा कर घूमता 4:03 घामता इसी ऋषि के चरणों में पहुंचा, दोनों ऋषि के आश्रम में निवास करते और दोनों की 4:10 एक दूसरों के साथ परिचय होने पर मित्रता भी प्रगाढ़ हो गई, वो बड़ा सेठ था और बड़ा 4:16 राजा था, चर्चा करते करते उन इस नतीजे पर आए कि - तुमको मुनिम ने धोखा दिया और मुझे वजीर 4:24 ने धोखा दिया, तुम भी कुटुंब से ठुकराए गए हम भी ठुकराए गए, तुम्हारा राज्य गया और मेरा नगर 4:32 सेठ पना गया, अब खाने को रोटी मिलती है, शयन करने को जगह भी मिलती है, फिर भी हम लोग 4:39 यहां बैठे बैठे भी चिंतन तो वही का करते हैं, कि – बाबा जी की दया हो जाए *****, 4:46 जिन पदार्थों से हमने ठोकर खाई है, जिन्होंने हमसे दगा किया और जो पदार्थ 4:52 छोड़कर हमें मरना ही है, जो आते समय भी परिश्रम लेते हैं, भोगते समय भी शक्ति नाश 4:59 करते हैं, और अंत समय सर्वस्व नाश करके चले जाते हैं, उन्हीं रिश्ते नातों को उन्हीं 5:05 पदार्थों को, उन्हीं प्रियजनों को, संभालने के ही हम आशीर्वाद लेना चाहते हैं, और उन्हीं में हमारा मन बार-बार जाता 5:11 है, हालांकि उनमें कोई सार नहीं हमने सुना, और यह जिंदगी कुछ नवीन जिंदगी है, सुबह शाम 5:19 आत्म साक्षातकारी ऋषि के दर्शन करने को मिल रहे हैं, साधकों के बीच बैठकर प्रसाद 5:25 लेने का मौका मिलरहा है, और प्रभु की चर्चा सुनने को मिल रही है, फिर 5:33 भी मन करता है कि कहीं गुरु महाराज के आशीर्वाद मिल जाए, कहीं कोई मार्ग मिल जाए 5:38 तो जहां थे वहां फिर सेट हो जाए, कुटुंबी फिर हमें स्वीकार कर ले, स्नेही हमें 5:45 स्वीकार कर ले, संबंधी हमें प्यार कर ले, रिश्ता नाता हमारा फिर से क्रिएट हो जाए, 5:50 राज हमें फिर मिल जाए, नगर सेठ की पदवी फिर मिल जाए, हम फिर इसी कचरे को चाहते हैं, जिसने 5:56 हमको एकदम मैला कर रखा है,
जिस कचरे के बीच हमारा अंतःकरण मैला हुआ था, जिस कचरे 6:03 के बीच हमारी मति और मन जगत का चिंतन करके जगदीश्वर से 6:09 दूर हो गए थे, फिर भी हम उसी को चाहते हैं, हालांकि हम समझते कि कोई सार नहीं, हमसे 6:14 बड़े-बड़े राजा हाथ खाली करके चले गए, हमसे बड़े-बड़े सेठ पश्चाताप करके मर गए, और हम 6:21 यदि वहां जाएंगे तो अंत में तो हमारे शव को भी तो अग्नि लगा कर जला ही देंगे, यह भी हम जानते हैं, *****, श्री राम,
तो यह मन ऐसा क्यों करता है, ऋषि के 6:36 चरणों में प्रश्न रखा, ऋषि आत्म साक्षात्कारी 6:41 थे उन्होंने कहा की वो सचिदानंद योगेश्वर श्री कृष्ण कहो, ब्रह्म कहो, परमात्मा कहो, पुरुष और पुरुष 6:48 की शक्ति जैसे अभिन्न है, दूध और दूध की सफेदी जैसे अभिन्न है, फल और फल का रस जैसे 6:55 अभिन्न है, ऐसे ही परमात्मा और उसकी जो शक्ति 7:01 माया वो अभिन्न है, ये परमात्मा की माया शक्ति जो है, वो ऐसी भ्रमण करा देती है ,
माया 7:10 माना ऐसा नहीं कि परमात्मा से चिपकी हुई कोई स्त्री रुक्मणी या सत्यभामा, ना ना 7:16 माया का मतलब है की स्पंदन जिस चैतन्य में होता है, और वो 7:25 स्पंदन दो प्रकार का है, एक ज्ञान प्रधान और दूसरा संकल्प प्रधान, संकल्प 7:32 विकल्प, ज्ञान प्रधान स्पंदन जो है वह तो चैतन्य की शुद्ध शक्ति है, और संकल्प 7:40 प्रधान जो शक्ति है स्पंदन है वह जगत का चिंतन करती है और उसको जगत का चिंतन करने से 7:47 आदत पड़ जाती है,
जैसे बीड़ी पीने वाला आदमी आदत पड़ जाती है, एक पीता है दूसरी पीता है, 7:55 मुन्ना की मां ये में शराब शौक से नहीं पी रहा हूं, लेकिन तेरे 8:02 मुन्ना ने नाजायज फायदा उठाया उस गम को भूलने के लिए पी रहा 8:09 हूं, हालांकि समझते भी है, कि शराब जहर है, 8:14 और इससे वह मुन्ना ने जो नाजायज फायदा उठाया वह कोई सुधरने वाला भी नहीं है, वो 8:20 तो लव मैरेज करके भाग गया, अब फिर भी वो पिए जा रहा 8:27 है, एक घुट भरता है और चेहरे पर अमली आ जाती है, रख देता है, फिर वही घूंट पीता है 8:35 फिर चेहरे….. दारूड़िआ का चेहरा देखो, कड़वा होता है ना 8:56 दारू,जो बच्चा दुख दे गया उसी की याद, जिस शराब ने मुंह कड़वा किया उसी में हाथ, जिस 9:03 सिगरेट ने खांसी दिलाई उसी की फूक, जो खाया तीखा तीखा और चेहरे पर बार 9:09 बज गए, फिर उसी में हाथ जाता है, क्योंकि आदत पड़ गई है, हां कह दो न ईमानदारी से
9:16 जो कृत्य करके आप पस्ता रहे हैं वही कृत्य तुम्हारे से हो जाते हैं, गरेड पड़ी 9:23 गई, हैबिट पड़ गई, हैबिट पड़े वाले व्यक्ति के साथ भी यदि 9:31 तुम हो जाते हो तो तुमको भी उस प्रकार के थोड़े संस्कार मिल जाते हैं, तभी कहावत संगन ***** , गेटों के साथ शेर रहता है तो गेटा पना उसमें भी शेर के बालक में आ जाता है, ऐसी 9:50 पुरानी कथाए है, दुष्टों के साथ सज्जन रहता है, असाधु के साथ साधु रहता है तो साधु भी असाधु होने लगता है, 9:55 और साधु की हां में हां करते सत्पुरुष की संग में यदि असत पुरुष 10:02 भी रहता है तो वह भी सत्पुरुष हो कर पूजा मान होते 10:09 हैं,
वशिष्ठ कहते हैं कि राम जी संग की बड़ी 10:14 बलिहारी, मिट्टी का कण हवा का संग करता है तो गगन गामी हो जाता 10:19 है, पुष्प वाटिका में पहुंच जाता है, संत महात्माओं की जटाओ में पहुंच जाता है, 10:26 भोलेनाथ के बाण पर पहुंच सकता है, और और भी ना जाने कहां कहा, और आगे ऊपर उठ जाए तो 10:31 नीचे उतरना भी असंभव, पृथ्वी के गुरुत्व नियमों को लांग कर 10:37 चला जाए तो सदा के लिए ऊपर हो जाता है, वायु का संग, यदि उसी को पानी का संग मिल 10:42 जाए तो काद में कुचला जाता है, पैरों तले चिपका जाता है, और उसमें न जाने दुनिया भर की घटर 10:49 जाती है, वही तो रज कण है, संग का बड़ा 10:54 प्रभाव है, इस मन को जब जगत का संग मिलता है नश्वर पदार्थों का संग मिलता है तो 11:01 नश्वरता की आदत पड़ जाती है और बारबार ऐसा करता है, इसी मन को ही दूसरे अर्थों में 11:07 माया कहा, मन एव मनुष्याणं कारण बंध मोक्षयो, ऋषि ने समझाया कि भगवान की माया है, उस 11:15 सच्चिदानंद कृष्ण का जो स्पंदन है इसी का नाम माया है, और जिस प्रकार के स्पंदन पड़ 11:21 गए हैं, वही जाने की उनकी रुचि होती है, जय सतनाम 11:28 भक्ति के स्पंदन पड़ गए कि – ********** योगी जहां तक समाधि नहीं करे तो उसको 11:42 मजा नहीं आवे, और ज्ञानी अपने ब्रह्मानंद की बात जब तक उसके हृदय से छलके नहीं तो ज्ञानी का बोले कि आज सत्संग में मजा नहीं 11:50 आया , ओम ओम ओम ओम ओम ओम,
11:59 आदत ऐसी है कि – वह सात्विक भी हो सकती है, राजस भी हो सकती है, तामस भी हो सकती है, 12:06 लेकिन एक ऐसी आदत है कि तीनों गुणों को दबाकर अपने स्वरूप की खबर देती है, वह आदत 12:13 बादशाही आदत है बाकी सब गुलामों की आदत, यह बादशाही आदत है, ज्ञानी से ज्ञानी 12:20 मिले करे ज्ञान की बात, लोग प्रचलित बातें हैं गधे से गधा मिले करे लातम लात,
रामा और 12:29 रत्ना तीर्थ यात्रा को गए थे, तीर्थ यात्रा करके जब लौटे तो लोगों ने 12:35 सामिया किया, गांव के ढोल बजाने वाले लोग ले गया, खूब गाते गूंजते उसका आदर सत्कार 12:42 करते फूलों की माला पहरा हुए उसको ले आए, गांव के बाहर करीब करीब में जो था तलाव, 12:49 बरसात के मौसम दो पाच 10 बरसात पड़ चुकी थी रामा रत्ना ने देखा कि अपना मच्छी मारने का धंधा हम छोड़ गए दूसरा कोई आया 12:57 नहीं, तालाब भी भर गया है, देख के तालाब में कुदा कुद कर रही, यहां तो 13:03 सामैया है और लोग गीत गाए जा रहे, लेकिन उनकी जो आदत थी मछली के तरफ नीहारने की और झपड़ने की तो कितना भी स्वागत हुआ 13:11 फूलों के हार पड़े और तिलक हुआ, चंदन लगे, और ढुल पीटते पीटते गए, रामा रत्ना निवास 13:18 स्थान पर पहुंचे फिर लोगों ने कहा कुछ अनुभव बताओ तीर्थ यात्रा की कुछ खबर, तो 13:23 रामा ने अपना भजन शुरू किया और भजन में रत्ना को खबर दिया “चिले चिले चलोजी रे चिले 13:30 चिले चलो चिले चिले दे तो भगत जो करते हैं वो समझ जाना तुम, दस पाच मिनट उसी बात को 13:38 पीटा, चिले चिले चलो जी रे खाडा माहे खद बदिया हो खाडा माहे खद बदिया जी, चिले चिले 13:46 चलो रे, लोको ने कहा कि ऐसा भजन हमने कभी सुना नहीं, आखर पीछे पढ़ने वालों ने बात 13:53 निकलवा ली, तो साइड में जाकर कहा – खदबदा….तलाव में वहां फलानी जगह पर माल है, जब हम 14:01 आ रहे थे स्वागत था तो हमने अपनी लकड़ी से वहां से चीरा कर दिया लकड़ी का निशाना कर दिया, अमुक जगह पर मछलियां खूब है यह बात 14:09 बताए बिना मेरे को चैन नहीं पड़ती क्योंकि मेरी पुरानी आदत है, तो लोगों ने कहा तुम्हारी पुरानी आदत 14:16 है, तो हमको भी एक भजन बनाने की छूट है, “काशी नाया मथुरा नाया 14:24 नाया गंगा गोदावरी नाने दीवे थाए दिवाली मोटे 14:29 दीवे होली, रामो रत्नो तीर्थ नाया तोय कोली ना कोली हो तोय कोली ना कोली, भाई चिले 14:37 चिले चालो जी रे चिले चिले चालो”
आज विजया दशमी है, और ये श्लोक भी कैसे 14:46 विजय हो व खबर दे रहा है, विजय किसकी होती है, कि जिसके तरफ कृष्ण है, और पुरुषार्थी 14:54 अर्जुन धनुर्धारी है, जो आलसी है, चैतन्य तो सबके तरफ है, परमात्मा तो सबके तरफ है, 15:00 लेकिन प्रमादी का विजय नहीं होता, पुरुषार्थी तो सब है, लेकिन कृष्ण को छोड़कर यदि 15:07 पुरुषार्थ करते तो अहंकार होता है, ईश्वर को छोड़कर यदि तुम्हारे पुरुषार्थ का फल मिलता है तो अहंकार है और अहंकार बड़ी 15:14 बुरी पराजय है, और ईश्वर को छोड़कर पुरुषार्थ नहीं करते हो तो प्रमाद है, 15:20 लेकिन पुरुषार्थ भी और ईश्वर भी तुम्हारे साथ है तो ये शास्त्र का वचन कह रहा है 15:27 संजय -
हे राजन जहां योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण है और जहां गांडीव धनुष्य धारी 15:33 अर्जुन है वहीं पर श्री विजय विभूति और अचल नीति है ऐसा मेरा मत है, श्री विजय और 15:45 अचल, जिसके पक्ष में परमात्मा है परमात्मा अचल है तो जो परमात्मा के तरफ चलता है तो 15:51 उसका भी विचार अचल हो जाता है उसका संकल्प दृढ़ होता है विकल्प से वो अपनी शक्ति 15:58 काटता नहीं,
शक्ति तो सबके पास है कृष्ण तो सबके साथ 16:03 है, लेकिन वही शक्ति को हम विकल्पों के द्वारा, एक संकल्प करते फिर उसके विपरीत का 16:09 जो संकल्प है उसे विकल्प कहते हैं, विकल्प करके अपनी शक्ति क्षीण कर देते हैं, आज के16:17 दिन समर्थ रामदास के प्यारे शिष्य शिवाजी ने युद्ध आरंभ16:23किया, आज ही के दिन रघु राजा 16:30 ने कुबेर भंडारी के ऊपर अपना तीर का निशाना दिखाया और कुबेर से 16:37 सुवर्ण मोहोरों की वर्षा कराई, ऐसा 16:42 कहते, आज के दिन भगवान राम ने लंका पर युद्ध प्रारंभ किया,स्वयं क्षत्रिय थे , नौ दिन की उपासना साधना वो जो तुम्हारी मनो शक्ति एकाग्र की गई शक्ति,16:59 उस एकाग्र की हुई शक्ति को ….. एकाग्र की हुई शक्ति को यदि तुम 17:08 सत्कर्म में लगाना चाहते हो तो आज का दिन कहता है कि निराश होने की बात नहीं है, हम 17:14 सफल होंगे कि नहीं ऐसे विकल्प करके अपनी शक्तियों को नाश करने की जरूरत नहीं है, ट्राई एंड ट्राई विल बी सक्सेसफुल, तुम 17:21 दृढ़ निश्चय से अपनी शक्ति को उस सत्य को पाने में लगा दो,
******** यह काम करूंगा होगा कि नहीं होगा इस प्रकार का विकल्प ना 17:34 करके आज के दिन तुम्हारे अंदर जो असुर रावण है, जो तुम्हारी तमाम तमाम शक्तियों17:41को सामर्थ्य को छीन रहा है, उस पर आज के दिन दृढ़ जैसे राम ने विजय के लिए आज के17:47दिन प्रयाण किया था, ऐसे ही तुम आज के दिन शुद्ध संकल्प करके और प्रयाण करो भीतर ही 17:54 भीतर, काम क्रोध मद लोभ ईर्षा वाद, दूसरों 17:59 की निंदा, दूसरों की प्रशंसा , परिछनता, तो प्रशंसा सुनोगे तो परिछनता आएगी निंदा18:07सुनोगे तो परिछनता आएगी, लेकिन निंदा और प्रशंसा ये सब स्वपना है इन सबके अंतर में18:13जो छुपा है मेरा कृष्ण मेरा जो आत्मा है वही मेरा सार है इस प्रकार का यदि 18:19 तुम्हारा दृढ विचार करते जाओगे तो इधर-उधर के जो है संकल्प और विकल्प शांत होते 18:24 जाएंगे और परमात्मा तत्व की ज्ञान शक्ति तुम्हारे अंदर प्रकट होगी, और यही वास्तव में वि विजय है, किसी बाह्य 18:33 शत्रु को मार डालना ये तो सामाजिक विजय है, किसी बाह्य वस्तु को उपलब्ध कर लेना यह तो 18:40 सामाजिक श्रेय है, लेकिन सच पूछो बाह्य शत्रु सब मर जाए सामाजिक बाह्य वस्तु सब 18:47 एक व्यक्ति के पास आ जाए फिर भी जब तक उसने अपने कल्पनाओं पर विजय नहीं पाई तब 18:53 तक वो सदा के लिए विजय नहीं गिना जाता है, श्रीराम।
18:59 तो आज का दशहरा हमें संदेश देता है कि जहां पर कृष्ण है, कर्षति आकर्षति इति कृष्ण, जो 19:08 आत्मा देव सबको आकर्षित कर देता है वो जिसके पक्ष में है उसका विजय होगा 19:14 है, सामने अविजय दिखेगा असफलता दिखेगी लेकिन अंतिम घड़ी आप विजय हो जाएंगे,
साधक के 19:21 जीवन में भी कई बार दिखता है कि चारों तरफ अंधेरा, अब कोई नहीं, कमर टूट गई, अब कहने की 19:27 कोई जगह नहीं, फरियाद करने की कोई जगह नहीं, हृदय खोलने की कोई जगह नहीं, साधना में सफल होने की कोई जगह नहीं, चारों तरफ 19:34 से जब अंधेरा होता है, फिर भी कहीं से वो चिंति अंतस की प्रेरणा मिल जाती है , झलस मिल 19:39 जाती है फिर चल पड़ता है, और वो लक्ष्य को प्राप्त हो जाता है, वर्धमान के जीवन में भी ऐसा कई बार आया 19:48 बुद्ध के जीवन में ऐसा आया कि, बुद्ध चारों तरफ से निराश हो गए, और घर जा रहे थे और 19:53 देखा कि
एक पेड़ पर पेड़ के धड़ पर चढ़ता हुआ कीड़ा हवा का झोका लगा गिर पड़ा, फिर 19:59 चढ़ा फिर गिरा, 10 बार चढ़ा और गिरा, 11 में बार वो पहुंच गया, बुद्ध ने 20:07 देखा कि - मैं निराश होकर घर जा रहा हूं, राज्य को याद करके आध्यात्मिक रास्ता 20:12 छोड़ने का विचार किया था, ये कोई दृश्य नहीं है मेरे लिए कोई संकेत है, ईश्वरी प्रेरणा है, जब ये कीड़ा छोटा सा अपना 20:20 कर्तव्य कीड़ा छोटा सा अपना पथ नहीं छोड़ता, तो मैं अपना पथ छोड़कर का रोकी 20:25 नहीं, फिर जाकर राजकुमार सब भोग भोगे नहीं लग गए और विजय हो गए,
तो यहां पर तुम्हारा 20:33 अंधा पुरुषार्थ नहीं, जहां पर तुम्हारा पुरुषार्थ शास्त्र सम्मत है, कई लोग करते 20:39 हैं पुरुषार्थ, पुरुषार्थ करने में किसी ने कमी नहीं की, रावण ने भी पुरुषार्थ किया, राम ने भी पुरुषार्थ किया, विश्वामित्र ने 20:46 भी पुरुषार्थ किया, पुरुषार्थ परिश्रम तो सब जीव करते हैं, लेकिन पुरुषार्थ सच्चा तो 20:51 वही है कि शास्त्र सम्मत हो सतगुरु सम्मत 20:56 हो,
महात्मा लोग चुटका सुनाया करते हैं, कि चूहों की सभा हुई चूहों के उस्ताद ने 21:04 मुखिया ने कहा पुरुषार्थ ही देव है, पुरुषार्थ से सब सफलताएं मिलती है, और सब 21:10 एकमत हुए, ऑर्डर कर दिया कि जाओ आज इसी को खाली आने की जरूरत नहीं किसी ना किसी घर 21:17 जाओ कुछ न कुछ ले आओ, एक चूहा मदारी के घर घुस गया और उसने खूब पुरुषार्थ करा 21:24 पुरुषार्थ किया लेकिन वो टोकरा जो है ना सर्प था उसमें वो, करनडीआ काटने का पुरुषार्थ किया उसको लहू लहू निकल गया, फिर मुखिया के 21:31 बात याद आई कि पुरुषार्थ करो असफल मत होना, वो पुरुषार्थ किया बड़ी मुश्किल से प्रभात 21:39 होते होते उसने क्या करा पड़े हुए सर्प का जोकरनडीआ है सलिलों से बनता है बांस की 21:45 तीखी सल वो करनडीआ गया काटा अंदर गया तो सांप ने पकड़ लिया, कि तेरा तो मैं इंतजार ही कर रहा 21:51 था,
तो अज्ञानी आदमी पुरुषार्थ करते हैं, परिश्रम करते हैं लेकिन इतना कड़ा 21:58 पुरुषार्थ करते हैं कि काल के मुंह में जाकर पहुंचते, के लो पुरुषार्थ का फल लो, यह 22:04 पुरुषार्थ नहीं, यह तो प्रकृति अर्थ हुआ, ये मुढता प्रेरित पुरुषार्थ है, सच्चा 22:10 पुरुषार्थ तो वेदांत कहता है “पुरुष अर्थ इति पुरुषार्थ” उस परब्रह्म परमात्मा के अर्थ 22:17 जो भी तुम्हारी गतिविधि है जो भी तुम्हारा जप तप है जो भी तुम्हारा कमाना खाना है, 22:22 पत्नी को खिलाना है या पति को खिलाना है बच्चे को खिलाना है, या बच्ची को खिलाना है, लेकिन तुम्हारा बच्चे और बच्ची के अंदर इन 22:30 खंड खंड के अंदर तुम्हारा ज्ञान अखंडता की खबर दे, तो समझना पुरुषार्थ है, और अखंड को 22:37 देखते हुए भी तुम्हारा ज्ञान खंडता में रह जाए तो समझ लेना कि चूहो जैसा पुरुषार्थ 22:43 है, पुरुषार्थ करने में किसी ने कमी नहीं की, सब कर रहे हैं, लेकिन हे राम जी 22:50 पुरुषार्थ हो शास्त्र सम्मत हो, “ससना इति शास्त्र” जो तुम्हारे कल्पनाओं को शासन करे 22:57 जो तुम्हारी परिछनता को शासन करें, जो तुम्हारी धारणा और मान्यताओं को शासन करें, 23:03 संत शास्त्र उनके अनुसार जो पुरुषार्थ है, पुरुष के अर्थ जो है प्रयत्न उसका नाम है 23:11 पुरुषार्थ, आज तक हम लोग पुरुषार्थ तो करते आए हैं , ईश्वर ने शक्ति दी है, बुद्धि शक्ति दी 23:18 है, उससे हमने क्या करा जगत के संबंध बढ़ाए, संकल्प शक्ति दी है तो जगत के संकल्प और 23:24 विकल्प किए, क्रिया शक्ति दी तो जगत का ही तो मानदा हमने बढ़ाया, पुरुषार्थ तुम्हें यह खबर देता है 23:32 कि, विजयालक्ष्मी तुम्हें यह खबर दे रहे है कि,
तुम्हें यदि विजय होना है, जन्म मरण के 23:37 चक्कर से पार होना है, सदा के लिए सब दुखों से निवृत्त होना है , परम पद में स्थिर होना 23:43 है, और अचल नीति में अचल तत्व में ठहरना है, तो तुम्हें 23:49 पुरुषार्थ करना पड़ेगा, पुरुष के अर्थ , मैंने पुरुषार्थ किया मैं पढ़ा पास 23:56 हुआ, पास होता चला आया होता चला आया, सुबह 4 बजे जगा और परीक्षा के दिनों में एग्जाम 24:01 दिए, मैं बीए हुआ, मैं एमए हुआ, मैं पीएचडी हुआ, और मैंने महाराज बढ़िया से बढ़िया 24:08 नौकरी पाई, फिर नौकरी छोड़कर मैं चुनाव में गया, और चुनाव में सफल हुआ, और वहां पर मुझे 24:14 पोस्ट मिली, और मैं कोई जैसा तैसा आदमी नहीं, मैं गरीब घर का लड़का हूं और अभी मिनिस्टर हूं, अब अमुक हूं, और तो सब ठीक है 24:23 छोकरा कहने में नहीं चलता, समाज ऐसा है रात को नींद नहीं आती, ******* श्री राम, ये तुमने पुरुषार्थ के नाम लाला मेरे प्रकृति अर्थ किया, मिनिस्टर 24:38 होना एमए होना पीएचडी होना मना नहीं है, लेकिन यह सब होने के बाद तुम एक ऐसे पद को 24:44 छू लो कि– सब विपरीत हो जाए, सारी खुदाई तुम्हारे विरुद्ध में खड़ी हो जाए, फिर भी 24:50 तुम्हारे नैन का चैन ना चला जाए, भजन गाते हैं नैन का चैन चुरा कर ले गई 24:59
अब थोड़ी सी घटना थोड़ी सी लड़की लड़का महिला महिली यह वो तुम्हारे नैनों की नींद 25:05 ले लेती है, तो तुम्हारी अकल और तुम्हारा पुरुषार्थ को थैंक 25:12 यू, तुम साज तो बजा रहे हो गीत तो गा रहे हो, लेकिन गीत उसी के गा रहे हो साज उसी 25:20 लिए बजा रहे हो कि, मदारी के घर चुआ जा रहा है, 25:28 मदारी का घर ही चूहा जा रहा है, खुशी मनायो है , लाडो लादी आनी दो शहजादी आनी दो 25:36 हिंदू सिंध गोले पटरानी आनी दो और लाडा सफल हो गया लाडी ले आया लाडी सफल हो गई 25:42 लाडा ले आए और दोनों सफल हो गए कीका आ गया पर थी 25:47 सूं, ओम ओम ओम
ये तो चूहा बिला गद्ध कुत्ता 25:53 कर लेता है, यह कोई पुरुषार्थ नहीं है, यह कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है यह तो अन्य 25:59 शरीरों में कई सुविधा पूर्ण कर लेते 26:05 हैं, आज दशहरे का दिन है विजया दशमी का दिन है, यहां तो भाई संसार की 26:13 बात वेदांत की नजर से शास्त्रों की नजर से साधना की नजर से देखा जाए, कि पूरा त्रिलोक 26:19 का राज्य तुमको मिल जाए फिर भी चित्त में यदि आत्म शांति नहीं है तो तुम कंगाल 26:26 हो, और तुम्हारे शरीर पर को पहर को कोपिन नहीं और खाने को तांदीलिया की भाजी में 26:34 लूण डालने के पैसे तक नहीं, घर में निमक नहीं और पड़ोसी तुम्हे एक निमक का डेली नहीं देते, ऐसा तुम समाज में ठुकराए गए 26:41 व्यक्ति हो, फिर भी यदि तुम्हारे को आत्मा में आराम 26:47 है, राम में तुमने आराम पा लिया तो शास्त्र कहते हैं कि तुम धन्य हो, तुम कृत्य की 26:53
पीत्वा ब्रह्म रस योगिन भूत्वा उन्मत्त इंद्रोमपी रंक वत भासेत अन्यस्य का वार्ता,
27:01 तुलसीदास कहते हैं – तीन टूक कौपीन की ,तीन टूक कौपीन की, भाजी बिना लूण, भाजी बिना लूण तुलसी 27:17 हृदय रघुवीर बसे तो इंद्र बापडा कुण , तुलसी हृदय रघुवीर बसे तो इंद्र बापडा कून, 7:28 तीन टूक कौपीन की भाजी बिना लूण, तुलसी हृदय रघुवीर बसे तो इंद्र 27:35 बापडा कुन ****
साधक का पुरुषार्थ और संसारी के 27:42 पुरुषार्थ में अंतर है, संसारी का पुरुषार्थ जैसे अर्जुन और कौरव पांडव और 27:50 कौरवों का युद्ध हुआ, पांडव कौरव के युद्ध 27:56 में दुर्योधन को संदेह होने लगा कि हमारी सेना के 28:02 संचालक मुख्य व्यक्ति भीष्म पितामह फिर भी हम विजेता नहीं हो रहे, 28:09 मालूम होता है कि पांडवों के प्रति भीष्म पितामह का प्यार है, और यह हम जानते 28:17 भी हैं, शायद ये युद्ध में उनको जरा छोड़ छाड़ देते होंगे, मौका चुक जाते होंगे, जानबूझ के 28:23 नमता देते होंगे, एक शाम को आया दुर्योधन, बोले पितामह 28:31 आप पांडवों का पक्ष लेते हैं, और आपको पांडवों के प्रति प्रेम है ऐसा हमें दिखता 28:38 है, पहले भी था अभी भी है, नहीं तो आप हमारे 28:44 सेनापति आप हमारी तरफ और पांडवों का एक अभी आदमी मरता नहीं, पांडवों को कुछ होता 28:50 ही नहीं, हमारे आदमी ढेरी लगे जा रहे हैं, और आपके होते हुए 28:55 भी, पितामह आप उनके पक्ष में है, आप उन्हें प्यार करते हैं, भीष्म ने कहा सही बात है, 29:03 मैं उन्हें प्यार करता हूं, स्नेह करता हूं, लेकिन जब युद्ध तुम्हारे तरफ से कर रहा हूं ना तो उसमें मैं पक्ष नहीं लेता हूं, 29:10 मैं अपना कर्तव्य बजाता हूं, कर्तव्य बजाते लेकिन आप आप चाहे तो ये 29:16 पांडव टिक सकते हैं? तो अजय है आप आ जाए अपनी प्रतिज्ञा पर तो पांडव खलास होके 29:23 रहे, आप इनके पक्ष में है, आपका हृदय इनके तरफ झुका वाला है, और हमारे हम ऐसे तैसे 29:29 हैं, ऐसे वैसे राजी कर दिया उनको, भीष्म पितामह ने अपने पांच बाण निकाले, शपथ ली, 29:37 अच्छा चलो ये पांच बाण कल पांडवों को समाप्त कर दू, मैं प्रतिज्ञा कर देता 29:44 हूं, प्रतिज्ञा करके भगवान कृष्ण के ध्यान में आत्मानंद में स्थिर हो गए,
तुम कोई भी 29:52 प्रतिज्ञा करो ना तो प्रतिज्ञा के पीछे भागना मत, प्रतिज्ञा करके थोड़ा कृष्ण के ध्यान में डूब जाना, बंसी बजा रहे हैं, यदि 30:01 तुम्हारी साधारण बुद्धि है संसारी बुद्धि है तो कल्पना करना वट पर बैठे हैं, यमुना 30:07 का किनारा है सुहाना वातावरण है, बंशीधर मुस्कुरा रहे हैं, बंसी बज रही है, कृष्ण 30:13 कन्हैया बंसी बजैया वृंदावन की कुंज गलियों में, यदि तुम्हारी साधारण मति है तो ऐसा 30:18 ध्यान कर लेना, यदि तुम्हारी मति कुछ ज्ञान से भक्ति से वैराग्य से तत्वज्ञान से कुछ 30:25 ऊंची हुई है, तो समझना कि कृष्ण जो सबको आकर्षित करे वो आत्मा स्वरूप मैं शांत 30:30 स्वरूप संकल्पों को सत्ता देने वाला, संकल्पों को दृढ़ भूत देने वाला, मेरा 30:36 आत्मा शांति संकल्पों को निहारते जाना, संकल्प विकल्प शांत होते जाएंगे, संकल्प 30:42 ठहरते जाएंगे, वही आत्मा के शक्ति हो तुम्हारा संकल्प पाकर उठेगा तो सफल हो 30:48 जाएगा, ओम ओम ओम
योगी लोग जब चमत्कार हो जाता है, अथवा योगी लोग जो कह देते हैं वो 30:55 घटना घट जाती तो कोई बाहर के कृष्ण या राम को कोई पत्र लिखते नहीं, चिल्लाने नहीं जाते, वो अपना ही अंतर्मुखी 31:05 होते रहते हैं , अंतर्मुख होने के कारण उनके संकल्प में प्रवाह हो और घटना घट जाती है, प्रकृति अपने नियम छोड़ देती है,
खैर तो भीष्म पितामह ध्यानस्थ हो 31:12 गए, ध्यानस्थ हो गया अनुचर तो घूमते थे, सीआईडी तो जाकर पांडवों को कहा, कि भीष्म 31:17 पितामह गंभीर ध्यान में खो गए हैं, और उन्होंने शपथ ले लिए कि कल शाम होते होते 31:23 पांडवों के पांच बाणों से पांच पांडव को समाप्त करू 31:29 कृष्ण को पता चला, जहां पर धनुर्धर और कृष्ण है तो हजार 31:37 हजार शपथ आ जाती है फिर भी गाड़ी नया रास्ता ढूंढ 31:46 लेती, कृष्ण आए, बात जान ली, द्रोपदी को कहा 31:53 कृष्णा, काली थी ना इसलिए उसको कृष्णा कहते, तू मेरे साथ 32:00 चल, कृष्णा और कृष्ण जा रहे हैं, विषम पितामह ध्यान में बैठे हैं, द्रोपदी 32:06 को कहा कि तेरे जूते उतार दे, ये तेरे चप्पल उतार दे, क्योंकि तेरे मां बाप की और यह पहचान 32:15 जाएंगे, कहां रखूं और दूर भी किसी की नजर पड़ जाएगी, आन ला मेरे को दे दे, तो अपने 32:21 पीतांबर में चप्पल लपेट लिए, बगल में रख दिए, ब्रह्मवेताओ को क्या है? ब्रह्म को क्या है 32:26 छोटा मोटा? श्री कृष्ण ने द्रोपदी की चप्पल, यह पहली 32:32 बार सुनी कथा आपने, श्री कृष्ण ने द्रोपदी की चप्पल बगल में ले ली, ग्यारह नंबर में चालू 32:38 हो गए, दबे दबे पैर, फिर कृष्ण रुक गए, बोले अब तू चली 32:44 जा, मेरे को यही छुपे रहने दे, धीरे से जाकर प्रणाम 32:49 कर, प्रणाम करके जब उठो तो जरा। .. कृष्णा ने सब मसाला दे दिया उसको समझा 32:56 दिया, द्रौपदी ने ऐसा ही किया, दुर्योधन की पत्नी रोज सुबह रोज उनको 33:04 प्रणाम करने को आती थी, और प्रणाम करते ही भीष्म पितामह उसे आशीर्वाद दे देते थे, 33:11 क्योंकि उनके पक्ष के थे, उनका अन्न खाते थे, भीष्म पितामह तो ध्यान में थे, अरे माय 33:17 ने प्रणाम करके जब गहनों का आवाज उठा और सिर नीचे रखा, उसने कहा सौभाग्यवती 33:26 भव, सौभाग्यवती भव, तो के पितामह आपने कल रात 33:31 को शपथ ले रखी है कि मैं पांडवों को नष्ट करूंगा, और आज 33:37 प्रभात को सुबह के समय ध्यान में उठते उठते आप कह रहे हैं सौभाग्यवती भव, अब 33:43 आपका ये वचन तो मिथ्या हो भी नहीं सकता, और वो वचन भी मिथ्या होना मुश्किल है, अब बताओ क्या किया 33:51 जाए? सब ने कहा कि अब क्या किया जाए ? इधर उधर देखा वो भी तो भक्त थे, देखा कि 34:01 सब…
यत्र योगेश्वर कृष्णो, यत्र 34:09 योगे.., यत्र पार्थो 34:15 धनुर्धर, तत्र श्री विजयो 34:22 भूति ध्रुवा नीति मति ममः,
34:29 हे राजन जहां योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण है और जहां गांडीव धनुष धारी अर्जुन है 34:36 वहीं पर श्री विजय विभूति और अचल नीति है ऐसा मेरा मत है, इसका मत अकेले का नहीं है, 34:43 यह सब शास्त्रों का मत है, सब संतों का मत है, सब पुरुषार्थ का मत है, कि जहां कृष्ण 34:49 तत्व है, जहां एकाग्रता है, जहां योग है और पुरुषार्थ है, वहां विजय लक्ष्मी सफलता 34:57 उनकी दासी होकर .. ह हा हु हा हु हा करके बस दौड़ा 35:03 दौड़ी करते वो सफल नहीं होते हैं, सफलता के लिए तुम्हारा चित्त शांत चाहिए, तुम्हारे चित्त 35:09 में कृष्ण तत्व का ज्ञान चाहिए,
तो भीष्म पितामह जैसे आदमी भी कृष्ण का चलो कृष्ण 35:14 की मर्जी ऐसी है, ये सब कृष्ण के खेल है, अब जो कृष्ण की मर्जी हम अपनी प्रतिज्ञा हटा 35:21 लेते हैं, पांचों बाण दे दिए द्रौपदी कृष्णा को,कृष्ण आते है कि दादा तुमने अपनी 35:28 प्रतिज्ञा हटा दी, धन्य हो, जब तुम्हारी मर्जी है मैं प्रतिज्ञा 35:35 अपनी हटा लू, तुम्हारे कारण में झूठा दिखू तो कोई बात नहीं, कृष्ण ने कहा ठीक है तुम 35:41 मेरे कारण झूठे दिखो तो कोई बात नहीं, तो मैं तुम्हारे कारण भी झूठा होने को राजी, 35:46 कृष्ण ने भी शपथ उठाई थी कि मैं हथियार नहीं लूंगा, बोले अब दादा जी मैं भी हथियार 35:52 ले लूंगा, चलो मेरा भगत झूठा तो मैं सच्चा कैसे? मैं भी , मेरा भगत जब मेरे लिए मिटता है, तो मैं 35:59 भगत के लिए मिटता हूं, आप देखो कि बाह्य रूप तो ये है , और आंतरिक आध्यात्मिक अर्थ 36:06 तो ये है कि तुम्हारा मन यदि प्रभु के लिए मिट जाता है , तो प्रभु का प्रभु पना, जीव 36:12 यदि ईश्वर के लिए मिटता है तो ईश्वर जीव के लिए भी मिट जाता है, और ब्रह्म रूप हो जाते है , जीव और ईश्वर का फिर भेद नहीं 36:21 रहता,
जब हम जीव बने हैं तब वो ईश्वर है, तुम जीव खो जाओ तो वो ईश्वर नहीं बनेगा, वो 36:26 आत्मा हो जाएगा, 36:32 धर्म की गहराई समझे तो कोई संप्रदाय अलग अलग खवाद हो ही नहीं सकता, सर्व देवो नमस्कार केशवं प्रति 36:40 गच्छति, अब केशव चार भुजा वाले को और बैकुंठ वाले को कहोगे तो फिर गड़बड़ है, वासुदेव 36:46 वही बसने वाले को, जो सब में बस रहा है वो वासुदेव है, जो सबको आकर्षित कर देता है वो 36:54 कृष्ण है, जो सब में रम रहा है वो राम है, 37:03 फिर श्री कृष्ण ने भी युद्ध के मैदान में कहा था कि हथियार नहीं 37:08 उठाऊंगा, रथ का पहिया उठाया, भीष्म पितामह को भी हंसी आ गई .. बुढ़ा भीष्म 37:14 को भी हंसी आ गई क्या करता है? तूने कहा था हथियार नहीं 37:20 उठाऊंगा, ओम ओम ओम
जहां कृष्ण है योगेश्वर 37:26 श्री कृष्ण और जहां पुरुषार्थ को ठीक से समझने वाला प्रश्न उत्तर शंका समाधान करके 37:34 सही क्या है उसको जानने वाला व्यक्ति रहेगा वहा विजय होगी .
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