रविवार, 15 जून 2025

Sukshm Satya - सूक्ष्म सत्य - part 2

 


0:00 कदम अपने आगे बढ़ाता चला जा, तेरे मार्ग में वीर कांटे बड़े हो, लिए 0:09 तीर व्याख्याओं के अथवा निंदा के, वैरी खड़े हो, बहादुर सबको हटाता चला जा, कदम 0:16 अपने आगे बढ़ाता चला जा,

 0:22 संतो मे तो समता हो इनने मान अपमान में कहीं थाए नहीं सच्चा संत होने 0:30 तो कहीं ना हो, gj  बात तो सच्ची बिल्कुल सच्ची है, कुछ नहीं होता है उनके गहरे चित्त में, 0:36 अपने स्वरूप में समता बनी रहती है, लेकिन वो यह संत नहीं है कि हिमालय में समाधि 0:42 करके बैठे वो तो बेचारे लोक उत्थान के काम में अथवा लोक 0:47 सेवा में लोगों के बीच रह रहे हैं, तो उनके लिए तो व्यवहार 0:52 में व्यर्थ के आक्षेप लगाना ठीक नहीं और कोई लगाते हैं 0:58 तो उनके के प्रशंसक उन आक्षेपों को उखाड़ के फेंक दे यही उनका कर्तव्य है, राम जी पर 1:04 आक्षेप लगा था तो देखो राम जी ने उस आक्षेप को हटाने के लिए सीता जी 1:10 को त्याग दिया, कृष्ण पर आक्षेप लगा था तो मणि चुराने का तो मणि का आक्षेप हटाने के 1:19 लिए कृष्ण ने भी पुरुषार्थ किया, ऐसे किसी महापुरुष पर गिने गिनाए कुछ लोग 1:27 आक्षेप लगाते हैं, तो उनके जो प्रशंसक है 1:32 अथवा उनसे जो उन्होंने लाभ लिया है उन्होंने प्रत्यक्ष फायदा उठाया तो वो तो 1:37 बोलेंगे ही, नारायण नारायण नारायण ओम

 जो मनुष्य 1:45 मधुर सत्य शुभ विनम्र, सत्य शुभ,  देखो आपको 1:51 वक्ता बनना है तुम्हारी वाणी लाखों लोग सुने ऐसा बनना है तो ये सिद्धांत समझ लो 1:57 आपकी वाणी का आदर हो जाएगा, मधुर तो भाई बदमाश आदमी भी बोलता 2:05 है, चोर भी मधुर बोल देगा, चुनाव के समय नेता भी मधुर बोलते हैं बहुत और जिससे 2:13 बोलते हैं उनके हित की बात हो, नेता लोग बोलते हैं लेकिन वह सामने वाले के हित की 2:20 बात नहीं अपनी कुर्सी की बात लक्ष्य होता है, इसीलिए उनकी बात सत्संग नहीं 2:26 बनती, तो आपके जीवन में अगर वाणी का प्रभाव लाना है तो आपके वाणी मधुर हो, हितकर हो और 2:36 सत्य हो, हां फिर विनम्र विनम्र हो विनम्र भी बोलते हैं 2:43 नेता लोगों में तो बड़ी नम्रता होती है भाषण में तो, 2:49 और आवश्यक वाणी बोलता है वह अपना तथा सबका हित करता है, 2:54 आहा जो आवश्यक वाणी बोलता है वह अपना, और दूसरों का हित करता 3:01 है, उत्तम वक्ता की पहचान क्या? कि उसने भाषण सत्संग जो भी पूरा किया तो श्रोताओं 3:09 के चित्त में उदासी छाई, अथवा श्रोताओं के चित्त में किसी के लिए 3:15 नफरत पैदा हुई, या जो श्रोताओं चित्त में वैर भाव या हंगामा या हिंसा करने का भाव 3:23 पैदा हुआ, तो वो 3:29 वक्ता हल्का माना जाता है छोटा माना जाता है, 3:35 और प्रवचन सुनने के बाद श्रोताओं में शांति प्राप्त 3:42 हुई हो, सत्कर्म करने की भावना लेकर उठे उठते हैं, कि कहीं आग लगाने की भावना लेकर 3:51 उठे, मजहब खतरे में, इस्लाम खतरे में करके हिंसा के लिए उठे 3:57 हैं, तो वो वक्ता हल्के वक्ता से उठे 4:04 हल्कट वक्ता की बात सुनकर उठे हैं, अगर परस्पर देवो भव की भावना से उठे हैं तो किसी 4:11 उत्तम उच्च वक्ता का सुनकर उठे हैं,  दिल में शांति आनंद और प्रसन्नता है और 4:18 परोपकार के भाव लेकर उठे हैं और अंतःकरण 4:25 भारी नहीं लेकिन हल्का फूल जैसा करके उठे हैं तो समझो कोई उत्तम वक्ता उत्तम सत्संग 4:32 करने वाले महापुरुष के यहां से आए हैं,  चेहरे पर प्रसन्नता है और मुख में भक्ति 4:37 के ज्ञान के गीत है तो समझ लो कोई चलते फिरते भगवान स्वरूप महापुरुष का दर्शन और 4:44 सत्संग सुनकर आए हैं, वक्ता कैसा है वो वक्ता को ना देखें 4:52 केवल वक्ता का श्रवण करके जो श्रोता जो मास (भीड़) गुजर रहा है, उसके चेहरे पर से पता चल 4:59 सकता है कि कैसा वक्ता होगा?

 5:04 तो आपके जीवन में अगर वाणी का प्रभाव लाना है तो 5:11 आप जितना जरूरी है उतना ही बोलिए, सत्य बोलिए, हितकर बोलिए, मधुर बोलिए, 5:19 सांत्वना प्रद बोलिए और ईश्वर अभिमुख हूं ऐसा बोलिए, 5:25 भगवान राम जी ऐसे ही बोलते थे, सार गर्भित बोलते थे, प्रसंग उचित बोलते थे, 5:34 इसलिए राम जी की वाणी का बड़ा प्रभाव पड़ता 5:41 था, वाणी व्यर्थ नहीं बोलना 5:46 चाहिए, नारायण नारायण नारायण

 किसी के प्रति चित्त में शत्रुता रख के नहीं बोलना चाहिए, 5:53 हां किसी की गलती है उसकी भलाई के लिए भले बोल दे, लेकिन द्वेष बुद्धि से प्रेरित 5:59 होकर ना बोले, भलाई बुद्धि से प्रेरित होकर 6:05 बोले, ऐसे तो राम जी भी कहते हैं, वशिष्ठ जी भी कहते हैं राम जी मैं गुजरता हूं तो 6:11 मूर्ख लोग मेरे लिए क्या-क्या बकते हैं, ऐसा बोल दिया है तो कड़क शब्द है, लेकिन वो द्वेष 6:18 बुद्धि से नहीं दूसरे लोगों का पतन ना हो यह हित बुद्धि से प्रेरित होकर बोल रहे 6:27 हैं, और शास्त्र से ज्ञात्म ज्ञान हो चाहे ना हो लेकिन इस मेरे शास्त्र से आत्मज्ञान 6:34 होगा, और उपदेश खली है, और मेरा उपदेश तिल है, तिलों से तिल निकलता है खली से नहीं 6:43 निकलता, तो ये लगेगा तो बाहर से अरे देखो अपने अपनी प्रशंसा कर रहे, अपने शास्त्र की 6:50 प्रशंसा कर रहे हैं,, दूसरे को नीचा दिखा रहे हैं, नहीं.. “जो सुन रहे हैं उनको दूसरी 6:56 भटकान से बचाने के लिए कृपा करके सत्य बात कह रहे"

  7:03 हे राम जी मैं समर्थ गुरु हूं, और सतपात्र शिष्य हो और समर्थ गुरु हो, 7:11 तो काम बन जाएगा, अहिंसा, अस्तेय, 7:17 ब्रह्मचर्य, गुरु सेवा दैवी सद्गुण तुम में है, शिष्य में जो 7:23 लक्षण चाहिए शिष्यत्व के सद्गुण चाहिए वह तुम में है, और गुरु में जो सामर्थ्य चाहिए 7:29 वह मुझ में है, मैं भी समर्थ गुरु हूं, तो ये बोल रहे हैं तो क्या अपने 7:35 अहंकार से प्रेरित होकर नहीं बोल रहे हैं,  श्रोताओं के कल्याण की भावना से बोल 7:43 रहे हैं,  किताब पढ़ोगे तो ऐसा लगेगा कि ये तो अहंकार की वाणी है, अहंकारी को अहंकार की 7:50 वाणी लगेगी, लेकिन जो लीलासाह बापू के चरणों में बैठे हैं या किसी ब्रह्मवेत्ता के 7:55 चरणों में बैठ चुके हैं उनको वशिष्ठ जी की वाणी अहंकार युक्त नहीं करुणा युक्त लगती 8:01 है, कल्याणकारी लगती है,

 ऐसे ही कृष्ण जी ने गीता में 108 गालियां दी, 8:08 लेकिन वह गालियां प्रसाद रूप है, वो गालियां गालियां नहीं है वह कृष्ण की कृपा 8:14 है,  ऐसा लगेगा अगर कोई विधर्मी या क्रिटिसाइज की दृष्टि से गीता पढ़ता है तो 8:20 लगेगा लो भगवान भगवान और भगवान भी लोगों को गालियां दे रहे 8:26 हैं, जैसे मां बेटे को गाली देती है करुणा करके कृपा 8:32 करके, अरे मर जाएगा ऐसा करेगा तो बेवकूफ है, 8:38 तो अंधा है, ऐसा गिरेगा, उसको तकलीफ ना हो बच जाए इसलिए, ऐसे ही भगवान ने 108 गालियां 8:45 दी गीता में विमुढा वीआईपी कोटा के मूर्ख है, वो लोग नरा अधमा नरों में भी अधम 8:53 है जो अपने मनुष्य जीवन को व्यर्थ बर्बाद कर देते हैं, सत्संग की शरण नहीं जाते, साधन 9:02 भजन जिनके जीवन में नहीं है, विमुढ़ है, विमुढानानु पश्यती, 9:08 वो विमुढ लोग मुझे आत्मा को नहीं देख सकते, पशती ज्ञान चक्षुसा, आसुरम भाव 9:16 आश्रिता, मनुष्य तो है लेकिन आसुरी भाव का आश्रय किया 9:23 है, जंतु है, जैसे जीव ऐसे बोल रहे, तेन 9:29 मुह्यंति जंतवा, इस प्रकार की कृपा कृपामय गालियां 9:35 है, इसमें श्री कृष्ण की करुणा कृपा है, द्वेष नहीं 9:42 है, श्री कृष्ण का द्वेष नहीं है किसी के प्रति, 9:49 कौरवों के प्रति भी कृष्ण के चित्त में द्वेष नहीं है,

 श्री कृष्ण ने उत्तरा का जब शिशु की 9:58 हत्या हो गई थी और उत्तरा को उदास होते हुए देखा तो, श्री कृष्ण ने कहा देख अब 10:04 तेरी समता की परीक्षा तो, मैं भी अपनी समता का परिचय देता हूं, 10:11 संधि दूत होकर गया और उन्होंने नहीं माना कौरव पक्ष ने, तब से लेकर महाभारत का इतना खुन खराबी हुआ 10:20 और युद्ध हुआ अभी तक मेरेि चित्त  में कौरवों के प्रति द्वेष ना रहा हो तो, और पांडवों के 10:29 प्रति राग ना रहा हो तो, मेरेि चित्त में अगर समता रही हो तो, यह मृतक बालक मेरी समता की 10:37 परीक्षार्थ जीवित हो जाए, वो  मृतक बालक जीवित हो गया, तो बालक का नाम परीक्षित पड़ा, 10:45 वही परीक्षित राजा भागवत की कथा के मुख्य श्रोता तो श्री कृष्ण के दिल में कितनी 10:51 समता है, व्यवहार तो विषम है,

 ऐसे तो मां भी व्यवहार विषम करती हुई दिखती है, किसी बेटे 10:59 को मालपुए दे रही क्योंकि वह एमबीबीएस होने जा रहा है एग्जाम है उसका, दूसरे को 11:05 सूखी रोटी और प्याज दे रही है खेत में जाएगा लू ना लग जाए है, तीसरे को खिचड़ी और दही 11:11 दे रही है क्योंकि दही उसके लिए ठीक है जुलाब लिया, चौथा रो रहा है ना खिचड़ी देती है 11:18 ना मालपुए देती है ना रोटी देती है थप्पड़ दिखाती है आंखें दिखाती है पड़ बाप नो कह 11:25 ***** क्योंकि उसको उपवास कराना ही जरूरी है, तबीयत ऐसी है, तो व्यवहार तो मां का विषम लगता 11:34 है, लेकिन चित्त में मां की रगरग में समता भरी है, 

ऐसे भगवान और भगवान को पाए 11:40 हुए ब्रह्म ज्ञानी महापुरुषों का व्यवहार तो विषम लगेगा, 11:45 लेकिन अंदर से कितनी करुणा है कि इसके दोष निकल जाए, इसका मंगल हो, इसकी पुरानी आदतें दूर 11:53 हो, भगवान और माता और 12:01 सद्गुरु बुरा करना चाहे तो भी नहीं कर सकते, माता तो अज्ञानवश शायद कर भी दे, 12:09 लेकिन गुरु और भगवान तो बहुत दूर का जानते मानते हैं,  इसलिए वह बुरा नहीं कर सकते,

 12:16 जैसे आप अपनी जीभ का बुरा करना चाहे तो भी नहीं कर सकते, आप अपने दांतों का बुरा करना 12:22 चाहे तो भी नहीं कर सकते, क्योंकि आपको पता है कि दांत हमारे हैं अपने हैं, ऐसे ही 12:29 भगवान और ब्रह्म ज्ञानी गुरु को सारा विश्व मानव अपना अंग लगता है,  क्यों 12:35 बुरा करेंगे, फिर भी कभी कभार तो दांतों में 12:42 भी खसनी पड़ती है अदार नोकीली लकड़ी 12:47 नोकीली कुछ चीज, कभी कभार दांतों को भी जरा डॉक्टरों के पास सजा करानी पड़ती है 12:56 नहीं तो सड़ जाएंगे, कड़क दवाएं डालनी पड़ती है, ये तो वही दांत है जीभ जीभ को कुचल 13:05 डालती तो क्या करते? तो पत्थर ले दांत निकालते थोड़े फेंकते थोड़े हैं, सहलेना पड़ता है,

 ऐसे ही महापुरुष भी, 13:15 भाई उनकी महिमा वही जाने, एक बार आप हो जाइए महापुरुष फिर पता चले कैसा होता है 13:22 हृदय? महापुरुष का हृदय कैसा होता है उसका वर्णन नहीं कर सकते, भगवान कैसे हैं उसका 13:28 वर्णन पूरा हम नहीं कर सकते, महापुरुष का हृदय कैसा होता है उसका पूरा वर्णन तो कोई 13:34 नहीं कर सकता, हे राम जी ज्ञानी का बयान क्या किया जाए, गुरु नानक बोलते हैं मत करो वर्णन हर 13:42 बे अंत है, क्या जाने वो कैसे, ब्रह्म ज्ञानी की मत कौन बखाने 13:49 ब्रह्म ज्ञानी की गत ब्रह्म ज्ञानी जाने, ब्रह्म ज्ञानी को बाहर के व्यवहार से 13: 55 तौलोगे तो बुद्धि चकरा जाएगी, उसकी मति गति के क्या है वह तो एक बार आप ब्रह्म ज्ञान 14:02 पालो तो पता चले, 

कई लोगों को दुराग्रह होता है कि ऐसा होना 14:10 चाहिए, अरे बुद्धू तेरी मति है ऐसा होना चाहिए, दूसरे की मति है ऐसा होना चाहिए, 14:16 कबीर जी को ऐसा होना चाहिए, कबीर को ऐसा करना चाहिए, दूसरा बोलेगा ऐसा करना चाहिए, 14:22 तो तुम्हारी लाखों खोपड़ी के अनुसार कबीर अकेले तुम्हारी लाखों तराजू में कैसे तुलेंगे मूर्ख , 14:32 और तो सब ठीक लेकिन यह इनको यह नहीं करना चाहिए, दूसरा बोलेगा यह तो ठीक वो ऐसा नहीं 14:37 करना चाहिए, तीसरा बोलेगा इनको ऐसा करना चाहिए, अपने अपने सुझाव और सजेशन देते 14:43 फिरते मूर्ख लोग,

 एक महामूर्ख आया, प्रोफेसर था, घाट वाले बाबा के पास, बोले क्या महाराज 14:52 आजकल तो दुनिया बड़ी ऐसी हो गई, नेता तो बदमाश ही है, कोई नेता अच्छा नहीं, कोई नेता 14:57 अच्छा ही नहीं, मेरा राज्य हो ना तो सारे नेताओं को गोली मार के 15:02 बस पहुंचा दूं, अब उसको मूर्ख को पता नहीं तेरा राज्य और नेताओं को गोली मारेगा तो 15:08 तेरा राज कैसे चलेगा, नेता तो चाहिए भाई कैसे भी है, कुछ 15:13 तो राज करने वाला तो चाहिए, चुनाव लड़ने लड़ाने वाले चाहिए तो सही, और सब नेता ऐसा 15:19 है ऐसे कैसे बोल दिया, कुछ तो अच्छे भी होंगे लाल बहादुर शास्त्री जैसे भी होंगे, और उनसे पांच पच्चीस 15:26 टका कम वाले भी तो होंगे, अगर सब बदमाश हो 100 टका तो राज्य चल नहीं 15:32 सकता, दुनिया टिक नहीं सकती, 

फिर उसने साधुओं के लिए बोला, साधु भी 15:38 आजकल देखो महाराज पड़े हैं, आश्रम में ये करें तो आश्रम में पड़े तो क्या बीड़ी 15:44 नहीं पीते दारू नहीं पीते दो टाइम रोटी खा रहे हैं ये गुण नहीं दिख रहा है, आश्रम में 15:49 पड़े हैं तो क्या करें छाती कूटे तेरी?  साधु का ऐसा होना चाहिए साधु को ऐसा 15:55 होना चाहिए, साधु आजकल ऐसा हो गया, आजकल जमाना बिगड़ गया, साधु ऐसा हो जाए, एक भी 16:01 साधु हरिद्वार में ऋषिकेश में भारत में एक भी ऐसा साधु नहीं जहां सिर 16:06 झुके, ऐसा साधु नहीं मिलते महाराज साधुओं को ऐसा होना चाहिए साधु को ऐसा करना 16:12 चाहिए, देश की स्थिति हालत ये हो रही है साधु को यह करना चाहिए वो करना चाहिए, बड़ा 16:18 उसने लेक्चर छांटा, आखिर घाट वाले ने कहा अब तेरी बात 16:23 सुन लिया अब मेरी बात सुन, साधु को ऐसा नहीं करना चाहिए ऐसा नहीं 16:31 होना चाहिए और साधु को ऐसा होना चाहिए तो तुम जैसा साधु चाहते हो ऐसा साधु पूरे देश 16:38 में एक भी नहीं है , हां बोले महाराज, ऐसा साधु मिल जाए तो –बोले दुनिया झुक जाएगी 16:43 उसके आगे महाराज, तो देख तू जानता है कि साधु को यह नहीं करना चाहिए और तू यह भी जानता है कि 16:51 साधु को ऐसा बनना चाहिए सब जानता है तो तू बनके दिखा, 16:57 जब नहीं है तो तू होके दिखा दे , बोले हैं …., हैं  क्या हिजड़े जैसी बात करता 17:05 है?  साधु को ऐसा होना चाहिए, भक्तों को ऐसा करना चाहिए, फलाने को ऐसा करना चाहिए, इसको 17:13 यह नहीं करना चाहिए, उसको वो नहीं करना चाहिए, तो तू अपने जीवन में लाकर तो देखा।

 17:20 अब आखरी बात, सुखी आदमी वे रहते हैं जिनके पास दृष्टि है, गुण 17:29 ग्राही ।  श्री कृष्ण ने ऐसी गुण ग्राहता लाई थी, कि देवता लोग 17:36 प्रशंसा कर रहे थे, इंद्र ने बड़ी भारी प्रशंसा की कि, धरती पर अगर जीने की कला 17:42 सीखना हो तो, षोडश कलाधारी कृष्ण के गुण को अपने जीवन में लाओ, 17:49 श्री कृष्ण कैसी भी परिस्थिति हो दोष की बजाय गुण देख लेते हैं, घृणा की जगह पर 17:56 प्रेम प्रकटा लेते हैं, अशांति की जगह पर शांति ले आते हैं, अज्ञानता की जगह पर 18:02 ज्ञान की बंसी बजा लेते हैं, माधुर्य माधुर्य उनके जीवन में, जब देखो श्री कृष्ण 18:09 माधुर्य ही माधुर्य क्योंकि उनकी दृष्टि ही ऐसी है, सोचने की एक कला है, कृष्ण को, कितना 18:17 भी बुरा और गंदे से गंदा भी वस्तु व्यक्ति परिस्थिति हो कृष्ण उसमें अच्छाई भलाई 18:24 माधुर्य ढूंढ लेते हैं, ऐसा करके इंद्र ने भारी प्रशंसा की, देवता को शंका हुई कि, 18:32 गंदे से गंदी चीज में श्री कृष्ण भला और अच्छा और माधुर्य कैसे खोजते होंगे, जब 18:39 गंदगी में माधुर्य कैसे होगा, चलो परीक्षा लेते हैं, श्री कृष्ण वृंदावन की उस कुंज गलियां 18:48 कहो नाली वाली गलियां कहो, अभी भी वृंदावन में नाली वाली गलियां मिलेगी, भले कुंज 18:53 गलियां तो है लेकिन नालियां भी तो है, तो कृष्ण वहां से गुजर रहे थे, सकड़ी गली से, 19:00 देवता रूप बदलकर, कुत्ते का रूप लेकर उस सकड़ी गली में 19:07 लेट गया, कुत्ते की पूंछ कटी ऐसा बद्दा कुत्ता गंदा कुत्ता तुम कल्पना ना कर सको ,19:14 ऐसा कुत्ते का रूप लिया उसने, 

नकल होती है ना तो जरा नकल और जोरदार होती 19:22 है, असली असली रुदन से नकली रुदन बड़ा ज्यादा पिघला देने वाला होता है, असली 19:30 भिखारी से भी जो रंग मंच पर भीख मांगता है उसकी नकल बड़ी भिखारी होने की तेज होती है, 19:37 ऐसे वो कुत्ता ऐसा बद्दा बना कि महाराज क्या कहे, पूछ कटी है चमड़ी पे चांदे पड़े हैं, 19:47 पीप बह रहा है, रक्त बह रहा है, मक्खियां बिनबिन आ रही है, बदबू दुर्गंध 19:55  कान कटा है, आंखों में भी कुछ गड़बड़ी है, 20:00 कहीं रोग के कीटाणु है, ऐसा बद्दा कुत्ता 20:05 लेटा है, ना जिंदा है ना मरा है, मुंह फटा है, 20:11 उसका श्री कृष्ण के साथ ग्वाल मित्र जा रहे, अरे रा कृष्ण देखो तो कुत्ता कितना 20:16 गंदा आ हा हा, कितनी उसकी दुर्दशा है, ये उसके पाप का 20:22 फल है, कृष्ण मुस्कुराए बोले उसके दांत चमचम चमक रहे हैं पागल हो ये उसके पुण्य 20:27 का फल नहीं दिखता है, तो श्री कृष्ण ने उसके चमकीले दांत 20:33 देखकर पुण्य का फल दिखा दिया, उसके चमकते हुए दांत उसके पुण्य का फल 20:40 है, देवता को लगा कि श्री कृष्ण की दृष्टि बड़ी महत्वपूर्ण,

 ऐसा है वैसा है ये 20:47 है लेकिन गुरु के द्वार पर है ये उसके पुण्य का फल नहीं है? गुरु के द्वार पर टीका है ये उसके 20:54 पुण्य का फल नहीं है? गुरु के प्रति श्रद्धा है ये उसके पुण्य का फल नहीं है? 21:01 और गुरु उसको अपना समझ के डांटते उसके दोष निकालते ये भी तो उसके पुण्य का फल है, 21:07 क्योंकि गुरु ने, गुरु ने अपना समझकर उसको डांटा है तो गुरु अपना बनाना चाहते तभी तो 21:15 उनको अपना समझा है डांटते हैं ये उसके पुण्य का फल है, जब गुरु आज्ञा के अनुसार काम में लगा 21:22 है सेवा में लगा है तो कितना पुण्य आत्मा है, गुरु का देवी कार्य करने का अवसर मिला 21:28 है कितने भाग्यशाली लोग हैं , ऐसा भी सोच सकते 21:34 हैं, एक दिन में कोई सीधा कर दे ऐसा कोई हिटलर धरती पर पैदा ही नहीं हुआ, जब तक 21:39 सामने वाला सीधा होना नहीं चाहता तब तक अपन क्या करेंगे उसको सीधा करने का, वो 21:46 अपनी समझ बढ़ाए तो सीधे हो जाएंगे, जो समझ बढ़ाए, ईश्वर को पाने की 21:54 तत्परता है तो सीधा हो जाएगा,

 ऐसा कोई सद्गुण नहीं जो भगवान को 22:00 पाने की इच्छा से ना आए, और ऐसा कोई दुर्गुण नहीं जो संसार की भोग की इच्छा से 22:06 पैदा ना हो, ऐसा कोई दुर्गुण नहीं है जो संसार की 22:13 वासना वासनाओं से पैदा ना हो, और ऐसा कोई सद्गुण नहीं कि भगवान की प्राप्ति की 22:19 भावना से पैदा ना हो, जितनी भगवत प्राप्ति की भावना तीव्र होती जाएगी उतने ही सद्गुण ऑटोमेटिकली विकसित होते जाएंगे...और जितना संसार के भोग की इच्छा बढ़ती जाएगी, उतने 22:32 ही दुर्गुण अपने आप बढ़ते जाएंगे, अब देखो सामने वाले का लक्ष्य क्या है भोग 22:38 लक्ष्य है तो समझो वह दुर्गुण अभी नहीं तो कल उसके पास है, अभी दिखाई नहीं देते तो कल 22:44 दिखाई देंगे लक्ष्य अगर भोग है तो उसमें दुर्गुण छुपे हैं प्रकट हो जाएंगे, और 22:51 लक्ष्य अगर परमात्मा है तो दुर्गुण छुपे हुए हैं तो भी निकल जाएंगे,

 इसलिए ईश्वर प्राप्ति की इच्छा डाल 22:59 दो तीव्र बाकी का सब आ जाएगा, लेकिन एक बार ईश्वर पद की प्राप्ति हो तो 23:05 कोई लोक तो क्या लोकेश्वर भगवान भी उठाके नहीं फेंक सकते, एक बार भगवान का ज्ञान हो 23:11 जाए तो भगवान के बाप की भी ताकत नहीं कि भाग सके, हमारे यहां से, भगवान के बाप की 23:17 ताकत नहीं वो छुप सके, भगवान इस बात में कमजोर है, हम इस बात में बलवान है, एक बार 23:24 वो दिख जाए प्यारा, फिर उसको डांट दो के जाओ छुप के दिखाओ अगर तुम्हारे में ताकत 23:29 है तो, वो नहीं छुप सकता है, क्योंकि वो तो सर्वव्यापक है सर्वत्र 23:39 है, ईश्वर ईश्वर की दो कमजोरियां हैं, 23:45 ईश्वर की दो कमजोरियां हैं एक तो अपनी सृष्टि में से किसी को निकाल नहीं सकता, ये 23:51 उसकी बड़ी भारी कमजोरी है, भगवान भगवान जो है अपनी दुनिया से किसी को 24:00 बाहर नहीं निकाल सकता, हम तो आश्रम से बाहर निकाल सकते हैं, तुम अपने बेटे बेटी को घर 24:06 से बाहर निकाल सकते हैं, कोई जज अथवा राजनेता कुछ करे तो आदमी 24:13 को उस इलाके से तड़ी कर सकता है, बाहर निकाल सकता है, लेकिन भगवान में ये कमजोरी 24:19 है, किसी को तड़ी नहीं कर सकते, और भगवान के बाप की ताकत नहीं वो छुप सके, ये दो बड़ी 24:27 भारी कमजोरियां है , 24:32 अगर तुमको मिले तो कह देना कि बापू बोलते हैं ये कमजोरियां है तुम्हारे में , मेरा कुछ नहीं बिगाड़ 24:39 सकते, कह देना मैं तो अभी कह रहा हूं और वो वो तो 24:44 सुनता ही रहता है सदा, सबके दिलों में बैठा है, अभी मैं बोल रहा हूं, अभी भी उसकी सत्ता से बोल रहा हूं , वो सुनता रहता है , मुझे डर 24:52 नहीं है, मैं तो अभी कहता हूं, हे भगवान हे ब्रह्मा तेरे में दो कमजोरियां है, 25:00 सुर दास ने कहा – निर्बल जानकर मेरा हाथ छुड़ा के जाते हो, लेकिन सबल तो तब मानूंगा जब 25:07 मेरे हृदय से निकल के जा सको, ये कमजोरी कह दो उनकी महानता कह दो, बस 25:16 वो तो वही है , जो भी कह दो , भगवान तो भगवान है बस, 

 25:28 कहीं भी जाओ आकाश तो रहेगा ही,  ऐसे आकाश से भी ज्यादा सूक्ष्म सच्चिदानंद 25:36 प्रभु 25:41 है, जैसे तुम्हारा घर अथवा तुम्हारा यह आश्रम आकाश के अंदर है, ऐसे आकाश भी भगवान 25:50 के अंदर है, ऐसे भगवान है, बोलो अब वो क्या करें बेचारे , कैसे 25:56 निकाले तुमको, ये बाप सुरे बापड़ो बेचारो फिर भी उसको घाटा नहीं, 26:06 क्योंकि बापड़ा होकर भी वही घूम रहा है, बेचारा होकर भी वही घूम रहा है, और शहंशाह 26:11 होकर वही घूम रहा है, उसको कोई गाली नहीं 26:17 लगती, बोले गाली नहीं लगती तो फिर शिशुपाल ने 100 गालियां दी 101 में दी और लगी, तो 26:26 उसको सुदर्शन चक्र से 26:31 मार दिया, मार दिया नहीं अपने में मिला दिया, 26:38 लीला है उसको क्या गाली 26:43 लगेगी ? उसको प्रलय नहीं लग सकता है, तो गाली क्या लगेगी?  26:49 ईश्वर को प्रलय नहीं लग सकता है प्रलय नहीं छू सकता उसको महाप्रलय नहीं छू सकता 26:55 है परमात्मा को , अरे परमात्मा के जो आत्मिक भगत है ब्रह्म ज्ञानी को महाप्रलय  27:02 सकता है तो फिर गाली क्या छुएगी ? 27:20 चार 72 वाला आ जाएगा ईश्वर मिल गया, ईश्वर प्राप्ति माने 27:25 क्या ? वासना निवृत्ति हो जाए, अपने आप में शांत सुख का अनुभव हो जाए तो ईश्वर 27:37 प्राप्ति, निर्विकार निर्विषय 27:43 सुख, निर्विषय सुख ईश्वर प्राप्ति 27:49  है, मरने के बाद मुक्ति तो बहुत छोटी 27:57 मुक्ति जीते जी मुक्ति, विषय विकारों से मुक्ति, जीव भाव से 28:03 मुक्ति, 28:09 तीन मिनट अगर वह स्थिति हो जाए तो 28:14 बस…. और जो यत्न करता है ना उसके और संस्कार मिटते जाते हैं, ईश्वर प्राप्ति के यत्न से 28:21 दोष निवृत्ति होती जाती है, तुम एक कदम चलते हो परमात्मा 100 कदम निकट 28:28 हो जाता है 28:36 तुम्हारे,

 रामतीर्थ रोते थे, कहा तू कब 28:42 मिलेगा? कब मिलेगा? और मिला तो पता चला कि मौजूद ही था, कभी बिछड़ा ही नही था, 28:49 जब नहीं मिला तब तक रोना तड़पना पड़ता है, अब मिलता है तो पता चलता है कि ओो मौजूद 28:56 ही था, सदा साथ में, 

सो साहिब सद सदा हजूरे, गुरु 29:04 वाणी में आता है, सो साहिब सद सदा हजूरे, अंधा जानत ता को दूरे,  हाजरा हजूर जागंदी 29:13 जोत, आद सत, जुगात सत, है भी सत हो से भी 29:18 सत, वो तो हाजरा हजूर है जागती जोत है 

29:24 कितना भी सात गुफाओं में बैठकर छुप के भजन करो तब तभी भी वह देखता है, और सात भेरों 29:31 में छुपकर पाप करो तभी भी वह देखता है, ऐसी जागती जोत है 29:39 परमात्मा, तुम किसी को बात में मसका मारते हुए झूठ बोलते हो तो उसको तो पता नहीं चले 29:45 लेकिन फिर भी वो परमात्मा तो जानता है, जैसे तुम झूठ बोलते हो उसको भी वह देख रहा 29:50 है , उस समय तुम्हारे हृदय की धड़कने कुछ और ढंग की हो जाती है, जब झूठ आता है तो, 29:58 और जब सत्य बोलते हो तो सामने वाला भले उस सत्य को झूठ मानता हो, फिर भी तुम्हारे 30:04 ह्रदय की हिम्मत वो कौन दे रहा है, वही दे रहा है 30:10 हाजरा हजूर, नारायण हरी नारायण हरि








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