शनिवार, 5 सितंबर 2026

अपनी महिमा में जागो p1

 






        थोड़ी सूक्ष्म बात समझ लेना। शरीर को सुखाकर पिंजर कर दे कोई। दिन रात तप करें। दिन रात उपवास करे। दिन रात संसार की खटपट में लगा रहे हो। फिर भी सब दुखों का अंत कभी नहीं होता। जब तक आत्मज्ञान आत्म तत्व को नहीं चिन्ह ।

जा लगी आत्म तत्व चीन्यो नहीं त्या लगी साधना सर्व झूठी।


        ०.41 कितनी संसार की मजदूरी करो, कितना ही तप करो। आत्मज्ञान के बिना तन सुखाए पिंजर कियो धरे रहन दिन ध्यान। तुलसी मिटे न वासना बिनाचारे ज्ञान उस ज्ञान का विचार करें और उसी ज्ञान का बार-बार ध्यान के द्वारा अनुभव करने का प्रयास करें तो आदमी जल्दी तर जाता है। जल्दी उस परमेश्वर का अनुभव करके मुक्त आत्मा हो जाता है। तृप्त आत्मा हो जाता है।

भगवत गीता के सातवें अध्याय में भगवान कहते हैं

भूमिरापो अनलो वायु कम मनो बुद्धिरेव च

अहंकार देवम में भिन्न प्रकृति अष्टधा

        ये अष्टधा प्रकृति से मैं भिन्न हूं | पांच भूत भूमि, आपो माना जल वायु, अनल माना अग्नि, खम माना आकाश, ये पांच भूत मन और बुद्धि, ये सूक्ष्म शरीर अहम, कारण शरीर स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर से मैं भिन्न हूं | जैसे फ्रिज से, पंखे से, हीटर से, पावर हाउस भिन्न है, विद्युत भिन्न है और इनमें विद्युत व्याप्त है। ऐसे ही अष्टधा प्रकृति में परमात्मा चेतना व्याप्त है। परमात्मा व्याप्त है फिर भी इनसे भिन्न है। जैसे पेड़ पौधों और जीव सृष्टि में सूर्य की सत्ता व्याप्त है। फिर भी सूर्य इनसे भिन्न है। जीवों के मरने से सूर्य मरता नहीं। अगर सूर्य इनसे अभिन्न होता तो जीव मरते तो सूर्य मरता। अगर यह भिन्न होते तो जी नहीं सकते। सूर्य से आप अगर अलग रहते तो आप जी नहीं सकते। आप सूर्य से जुड़े हैं। जय राम जी की।

        3.06 ऐसे ही यह पावर हाउस से पंखे और आपके इंस्ट्रूमेंट जुड़े हैं। फिर भी पावर हाउस की सत्ता इनसे इनको दे सत्ता मिलती है। इनके मरने मिटने से पावर हाउस का कुछ बनता बिगड़ता नहीं। ऐसे ये पांच भूत और भौतिक वस्तुएं बनने बिगड़ने से भी तुम्हारे चैतन्य आत्मा का कुछ बनता बिगड़ता नहीं।

भगवान की दो प्रकार की प्रकृति

अपर नित्यम अन्य प्रकृति विधि में परम जीव भूता महाभाव धारते जगत

        पृथ्वी जल तेज वायु आकाश ये पंच महाभूत और मन बुद्धि तथा अहंकार ये आठ प्रकार के भेदों वाली मेरी अपरा प्रकृति है। हे महाबाहु इस अपरा प्रकृति से भिन्न मेरी जीव रूपा परा प्रकृति भी है | जिसके द्वारा यह जगत धारण किया जाता है। आकृति को लेकर रचना आदि ये जीव भूता प्रकृति परा प्रकृति, और अपरा प्रकृति ये अपरा प्रकृति है। आकृति को लेकर रचना तक काम करने वाली अपरा प्रकृति है और अपना जीव अंश यह परा प्रकृति है। निकृष्ट और जड़ परिवर्तनशील परा प्रकृति और श्रेष्ठ चेतन और अपरिवर्तनशील अपरा प्रकृति है।

        ध्यान देना तात्विक बात है। जिसको परमात्मा से भिन्न नहीं परमात्मा स्वरूप में एक स्वरूप है। वह परा प्रकृति है। और जो बदलती है परमात्मा की प्रकृति वो अपरा प्रकृति है। तो यह शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार यह अपरा प्रकृति है। और जीवात्मा का अनुभव कराने वाली भगवान की परा प्रकृति है | और भगवान भी आपके साथ आपका आत्मा होकर बैठा है। खूब ध्यान देना बहुत सुखदाई बहुत कल्याणकारी ये बात है भगवान की।०५.43

भूमि रापो अनलो वायु खम मनो बुद्धि रेवच

अहंकार इव में भिन्ना प्रकृति अष्टधा

        5.५५ ये मेरे से अष्टधा प्रकृति भिन्न है। जैसे भगवान से अष्टधा प्रकृति भिन्न है और फिर भी भगवान की सत्ता से चल रही है। पावर हाउस से तुम्हारे इंस्ट्रूमेंट पंखा, फ्रिज, कूलर, गीजर भिन्न है। फिर भी उससे जुड़े हैं। इन इंस्ट्रूमेंटों के मरने मिटने से पावर हाउस का कुछ बनता बिगड़ता नहीं। ऐसे तुम्हारा पंच भौतिक शरीर मन बुद्धि और अहंकार के बदलने से मरने मिटने से तुम्हारे आत्मा का तुम्हारा स्व का कुछ बनता बिगड़ता नहीं है। फिर भी जरा सा शरीर में कुछ होता है तो हाय रे मैं मर गया। कुछ मिला तो हाय मेरी जिंदगी खुशहाल हो गई। यह भ्रांति क्यों होती? कि उस चैतन्य को जीव भाव में लाने वाली जो भगवान की परा प्रकृति, है तो चैतन्य शुद्ध बुद्ध असंग आत्मा उनको इन शरीर मन बुद्धि के साथ संगी बना देती है | वो भगवान की जीव भूता प्रकृति परा प्रकृति अब वो परा प्रकृति है तो श्रेष्ठ स्वभाव अपना चैतन्य आत्मा लेकिन वह चैतन्य आत्मा को लीला करके प्रकृति, प्रकृति और पुरुष आपस में अभिन्न है | जैसे पुरुष और पुरुष की शक्ति अभिन्न है। दूध और दूध की सफेदी अभिन्न है। जैसे तेल और उसकी चिकनाहट अभिन्न है। ऐसे पुरुष और पुरुष की प्रकृति परमात्मा और परमात्मा की प्रकृति अभिन्न है। जैसे सूर्य और सूर्य के किरण अभिन्न होते हुए भी किरण मर जाते हैं। बदल जाते हैं सूर्य अपनी महिमा में। ऐसे ही भगवान की प्रकृति बदलती है। खेल दिखाती है लेकिन भगवान की सत्ता के बिना नहीं दिखा सकती और प्रकृति के बिना भगवान की सत्ता का खेल दिख नहीं सकता। लकड़ी में आग छुपी है। फिर भी वह ठंडक नहीं हटा सकती। अंधेरा नहीं मिटा सकती। लकड़ी की छुपी हुई आग को जगाना पड़ता है। ऐसे भगवान की सत्ता को दिखाने के लिए भगवान की प्रकृति है। पावर हाउस से आने वाली वायरों में विद्युत होती है। दिखती नहीं है। बल्ब आदि से वह दिखती है। और काम में आती है। ऐसे ही भगवान की सत्ता ओतप्रोत है। तो जो जीव भूता प्रकृति है अपरा तो निष्कृष्ट है लेकिन परा प्रकृति श्रेष्ठ है। चेतन जो अपरिवर्तनशील आत्मा है वह परा प्रकृति है।

        तो तुम देखो शरीर बदल गया, बचपन बदल गया। किशोरावस्था बदल गई, जवानी बदल गई, बुढ़ापा बदल गया, मौत आई। ऐसे कई बार यह प्रकृति के शरीर बदले, मन बदला, बुद्धि बदली, चित्त बदला, अहंता बदली, फिर भी कोई अबद बैठा है। जो अदल बैठा है वो जीवात्मा होकर बैठा है। उसका असली स्वरूप परमात्मा से अभिन्न है। लेकिन अज्ञानवश वो इस शरीर को मैं मेरा मानता है इसलिए जन्म मरण के चक्कर में जाता है। अपने को कर्ता मानेगा तो विहित कर्म करना चाहिए जिससे सुख मिले। अपने को कर्ता माने तो अच्छे कर्म करना चाहिए ताकि फल अच्छा मिले। लेकिन अपने को भगवान का माने तो जिज्ञासा होगी। भगवान कौन है? मैं कौन हूं? भगवान कहां है? और मैं कैसे उसको मिलूं? इस प्रकार की जिज्ञासा की पूर्ति करने में भगवान की परा प्रकृति मदद करती है। अच्छे विचार और बुरे विचार। ऐसे अपरा प्रकृति और परा प्रकृति। आप जब इस भोग को चाहते हो संसार का ऐश आराम और मजा चाहते हो तो अपरा प्रकृति में उलझ जाता है आदमी लेकिन जब आप संसार के ऐश आराम मजे नश्वर समझकर सच्चा सुख चाहते हो तो परा प्रकृति आपको मदद करती है। जब परा प्रकृति मदद करती है तो परमेश्वर का सुख मिलता है। परमेश्वर का ज्ञान मिलता है। परमेश्वर का अनुभव हो जाता है। फिर यह जीवात्मा समझता है कि मैं परमेश्वर से जुदा नहीं था। परमेश्वर मेरे से जुदा नहीं था। आज तक जिसको खोजता फिरता था वही मेरा आत्मा था। ११.20

बंदगी का था कसूर बंदा मुझे बना दिया। मैं खुद से था बेखबर तभी तो सिर झुका दिया।

वो थे ना मुझसे दूर ना मैं उनसे दूर था। आता ना था नजर तो नजर का कसूर था।




        ११.३५ नजर बदली तो नहीं जा रहे बदल गए। वो नजर थी जो अपरा प्रकृति की चीजों में उलझ रहे थे तो लगता था यह मिले तो सुखी हो जाऊं ये भोगू तो सुखी हो जा ये करूं तो ऐसे करते करते सुख के पीछे मर मिटे | मामा घर के दी बड़े इटले मामा घर के द बड़े इटले अब इतना हो जाए तो प्रॉब्लम सॉल्व इतना हो जाए तो प्रॉब्लम सॉल्व और प्रॉब्लम सॉल्व सॉल्व सॉल्व होते ही लाइफ सॉल्व हो गई | प्रॉब्लम तो बने रहे | तो अपरा प्रकृति में रहकर कोई पूरा सुखी हो जाए या पूरे प्रॉब्लम उसके सॉल्व हो जाए यह संभव ही नहीं है। परा प्रकृति में आ जाए |

        12.22 एक अविद्या है। दूसरी विद्या | अविद्या अविद्यमान वस्तुओं में सतबुद्धि करके जीव को भटकाती है। खिलौनों के जैसे खिलौनों के आम, खिलौनों के चॉकलेट, मिट्टी के खिलौने, मिट्टी का सीताफल, मिट्टी का लॉलीपॉप वो चाटने से बालक को वो रस नहीं आता। असली चाटने से रस आता है तो एक नकली खिलौने और नकली फल फ्रूट होता है। हम एक जगह पर गए बहुत आग्रह किया उन्होंने बापूजी भोजन यहीं करोगे। हमने उनको कह दिया कि तुम्हारे यहां हम आएंगे और थोड़ा सा फल और दूध ले लेंगे। उन्होंने व्यवस्था किया अबेजमेंट में हमारा एक हॉल था नीचे मैंने कहा अभी ये कब लाएंगे ये सामने फ्रूट पड़ा है उसमें से एक सेब ले लेता हूं और एक केला ले लेता हूं, और दूध लाएंगे तब पी लेंगे ये कब तक लाएंगे कब तक सुधारेंगे सवारेंगे वो दूर से लग रहा था कि ये टोकरे में जो पड़े हैं फल बिल्कुल ताजे और इतने बढ़िया है नजदीक गया तो देखा है तेरे ये तो आर्टिफिशियल है |

        13.38 तो आर्टिफिशियल असली से भी कभी-कभी अच्छे लगते हैं। ऐसे ही एक असली सुख है अंतरात्मा में और बाहर ये सब आर्टिफिशियल और आर्टिफिशियल असली से तब तक अच्छा लगता है जब तक आर्टिफिशियल को आर्टिफिशियल नहीं जाना। नकली को नकली नहीं जाना तब तक नकली अच्छा लगता है। ऐसे तो नकली को नकली तब जानेंगे जब असली का स्वाद कोई चखा दे संत फकीर कोई चखा दे भगवान की रहमत

        14.०९ जब असली स्वाद जरा आता है। परा प्रकृति की कृपा प्रसादी जब मिलती है अंतरात्मा का अपने स्वाभाविक सहज स्वभाव सुख

शंकर सहज स्वरूप संभारा लागी समाधि अखंड अपारा


            14.22 अपना सहज स्वाभाविक आत्म स्वरूप की जब स्मृति आ जाए उसी में विश्रांति मिले तो ये बाहर की तू तू मैं मैं ये करना ये भोगना ये पाना ये सब फीका हो जाता है। असली को ठीक से जानो तो नकली के आकर्षण से पिंड छूट जाता है। ऐसे असली सुख को थोड़ा सा ले ले तो फिर नकली विकारों का सुख का प्रभाव टूट जाता है। फिर विकारी सुखों में जीवात्मा रहता हुआ दिखता है। जनक राज्य करते हुए दिखते हैं। वशिष्ठ महाराज आश्रम चलाते हुए दिखते हैं। सब व्यवस्थित काम करते हुए दिखते हैं। लेकिन अपने आप में बैठे हैं।

उठत बैठत ओई उठाने कहत कबीरम उसी ठिकाने

        १५.06 और ऐसे महापुरुष गजब की चाल चलते है। किस पामर व्यक्ति को किस ढंग से उठाया जाए, वह महापुरुषों की असली सुख के अनुभूति में ऐसी विलक्षण बुद्धि काम करती है। असली सुख लेने से बुद्धि भी असली ढंग से व्यवहार करने लग जाती है।

        १५.32 कबीर जी के आय का कोई पक्का स्रोत नहीं था। खाना बुनते कपड़ा बनाते कभी सत्संग में समय चला जाता। कम बनता कपड़ा नहीं बनता। कभी रोजी रोटी तक का बन जाता। जो आए वह भोजन करके जाए। परा प्रकृति में रुचि हो जाती है और अपने परा स्वभाव को जान लेते हैं। वो सबके हित में ही आनंद का अनुभव करते हैं। आपका महापुरुषत्व कब से जगा? आप महान आत्मा या श्रेष्ठ पुरुष कब बने? कि जब दूसरों का दुख आपको अपना लगे। दूसरों का दुख मिटाकर आपको आनंद आने लग जाए। तो समझो आप महानता के तरफ परा प्रकृति के तरफ आए | दूसरों की खुशियों में और उन्नति में आपको आनंद आए तो समझ लो कि आप परा प्रकृति के राज्य में प्रवेश कर चुके आप कब जगे

जाने जीव तब जागा हरि पद रुचि

उस परा प्रकृति के स्वभाव में रुचि

विषय विलास विरागा

        तुच्छ प्रकृति से बचा और असली प्रकृति में रुचि हुई कबीर जी ऐसे महापुरुष थे | तो जो आए सत्संगी गए भैया जरा भोजन करके जाइए | तो आटा दाल तो समाप्त रहता था, घर में कुछ आ गए भगत हो गए कोई साधु संत जाकर धीरे से लोई को कहा कि रोटी बनाना है साधु लोग आए, कुछ भगत भी हैं | मुझे पता है घर में आटा नहीं है, दाल नहीं है, कुछ भी नहीं है। मुझे पता है। और उधार मांग मांग कर सारे बाजार के लोगों को हम लोगों ने इमली खाता हुआ कर दिया है। तो हम जाएंगे और मिलेगा नहीं उधार , यह भी मैं जानता हूं। फिर भी तू जा। शायद मुझे नहीं मिलता तो तुझे मिल सकता हूं। किसी न किसी दुकानदार को उधार देने के लिए राजी करके आना , ले आना सामान | लोई गई दुकानदारों ने तो मुंह सुकड़ लिया, लेकिन लोई जाकर खड़ी दुकानदार ने कहा एक शर्त है तुम्हें आटा दाल जितना चाहिए उतना तो मैं दे दूंगा | लेकिन शर्त एक है कि रात को मेरे बिस्तर पर आकर सोने का आप वचन देगी तब, लोई माता जानती थी कबीर की महिमा महिमा | उसने वचन दे दिया अच्छी बात है आ जाऊंगी तेरे बिस्तर पर भैया अभी तो दे दे | भैया तो मैं गलती से बोला उन्होंने कैसे भी बोला होगा भगवान जाने | तो माताजी थी भैया बोले चाहे ना बोले उसकी नजर में तो सब …| शब्द वहां काम नहीं करते |

        आटा दाल ले आए भक्तों को और संतों को भोजन बनाकर खिला दिया। शाम को कबीर जी को कहा कि आपने कहा था कि कैसे भी करके आटा दाल ले आओ। कोई दे नहीं रहे थे। एक दुकानदार राजी हो गया। उसने दे दिया। इस बात पर राजी हुआ कि रात को तुम मेरे बिस्तर पर रहोगी और मैं हां बोल के आई हूँ। अब आप ही बताओ क्या किया जाए कबीर जी ने कहा बस वचन दिया तो पूरा करना चाहिए | चलो ! मैं तुम्हें लिए चलता हूं | कैसे गजब के महापुरुष बरसात है तूफान चल रहा है | बोले कोई बात नहीं वचन दिया है | सुबह तक बरसात चलेगी तो कंबल ओढ़ ले हल्की सी बूंदा बांधिए कीचड़ में पैर खराब हो जाएंगे, मेरे कंधे पर ही बैठ | कबीर जी उनको कंधे पर बिठाकर….| वो दुकानदार बड़ा खुश हुआ कि ऐसे बरसात में भी तुमने वचन पूरा किया, शाबाश है | लेकिन तुम भीगी नहीं और तुम्हारे पैर कोई खरोच भी नहीं, कीचड़ की बरसात के पानी की ये कैसे लोई ने | बताया कि मैंने आपको वचन दिया था और मेरे पति पतिदेव को मैंने बताया कि समय हो गया वचन दिया तो मुझे कंधे पर उठा के ले आए | इसलिए पैर नहीं भीगे कंबल ओढ़ाए इसलिए शरीर नहीं भीगा | वचन दिया था आपको | लेकिन मुंह पर जो शांति और निर्दोषता थी प्रकृति का तेज था अपरा नहीं परा प्रकृति का तेज था, उस तेज ने विकारी दुकानदार के चित्त जो अपरा आकर्षण निष्कृष्ट प्रकृति का था उस पर अच्छी प्रकृति का प्रभाव पड़ा। तो वो कबीर जी तुम्हें छोड़ के चले गए? बोले नहीं अंधेरी रात है। बरसात का मौसम है। मेरे को छोड़कर दरवाजे के नजदीक आप बाहर खड़े हैं। मेरे इंतजार में मैंने आपको वचन दिया था। श्रेष्ठ प्रकृति का प्रभाव निष्कृष्ट प्रकृति पर पड़ा। दुकानदार के चित्त में भीतर ही भीतर श्रेष्ठ प्रकृति ने नहाल बरसाई। कबीर जी आपको उठाकर लाए। मैं कैसा पापी, मैं कैसा अभागा के तुम्हारे जैसे पवित्र आत्माओं के प्रति भी। मैंने यह दुष्ट मांग रखी और आप वचन निभाने के लिए चले आए और कबीर जी आपको उठा लिया। हद हो गई मैं कौन से नरक में भुगतंगा? मेरे कर्म कैसे कटेंगे? चरणों पर सिर धर दिया। मां मुझे माफ करो। निष्कृत प्रकृति पर श्रेष्ठ प्रकृति का प्रभाव पड़ा।व माँ चलो कबीर जी के चरणों में प्रणाम किया, फूट फूट कर रोया आगे चलके वो कबीर के श्रेष्ठ भक्तों में से एक बन गया | महापुरुषों की गजब की महिमा गजब की लीला गजब की चाल होती है |

        22.०५ निष्कृष्ट प्रकृति में जीने वाले जंतु जैसे स्वभाव के लोगों को श्रेष्ठ परमात्मा स्वभाव में जगाने की उनकी अपनी अलौकिक चाल …| गुरु अर्जुन देव के पास रागी आते हैं। म्यूजिक पार्टी अपन कहते हैं म्यूजिक बजाने वाले | और म्यूजिक बजाने वालों के नाम उन दिनों में लोग कहते थे। मिरासी आप म्यूजिक म्यूजिक बजाने वाले को अपन आर्टिस्ट बोल देते | मीरासी, मीरासि दो व्यक्ति थे उनके घर में कोई शादी थी एक का नाम था सत्ता दूसरे का नाम था बलबड़ा उन्होंने गुरु अर्जुन देव को कहा कि हां मेरे रुपयों की जरूरत है | हमारे घर शादी है | गुरु जी ने उस जमाने में दो तीनसो तिनसो रूपए दिलाने का आश्वासन दे दिया बोले | आपके इतने सारे सेवक हैं एक एक टक्का भी एक एक शिष्य से मिल जाएगा तो हमारे हजारों रुपए हो जाएंगे | ये दो तिनसो आपके नहीं चाहिए आपके शिष्यों के पास से एक एक टक्का मिल जाए टक्का माना आज के तीन पैसे लेकिन वो जमाने में टक्का बड़ा महत्व रखता था। टक्के में जो चीज मिलती थी वो अभी 200 पैसे में भी नहीं मिलेगी। 500 पैसे में भी नहीं मिलेगी। आज से करीब पौने पांच सो वर्ष पहले टक्का भी बड़ा मान मूल्यवान है। एक पैसे में तो भरपेट रोटी खा लेते लोग । धोखा ले लेंगे। एक एक टक्का आपके सेवक से दिला दो। अर्जुन देव ने कहा ठीक है। आते गए, राग गाते गए, अर्जुन देव के सामने रोज खड़े हो जा के गुरु जी सब सेवकों से आपके तो मुल्तान तक के फैले हुए हैं सेवक टक्का टक्का दिलाने की व्यवस्था करो , शिष्यों से ही लेंगे दूसरों से नहीं लेंगे | गुरु ने साधे चार टक्के धर दिए उनके हथेली पर, बोले इतना ही मिल पाएगा। ये कैसे? बोले एक तो शिष्य हैं। सच्चे शिष्य उस परमेश्वर के अकाल पुरुष के नानक देव दूसरे अंगद। अमरदास तीसरे और रामदास चौथे और मैं आधा शिष्य हूं तो आधा टक्का मेरा रहा। आधा ही उस ब्रह्म को समर्पित हुआ हूं। वे तो पूरे के पूरे शिष्य थे। पूरे के पूरे अपने जीव भाव को ब्रह्म में मिला चुके थे। वो पूरे शिष्य थे। पूरा प्रभु आराध्या पूरा जहां का नाम पूरा पाई पूरे के गुणगान अपने पूर्ण महिमा में। जैसे बिंदु पूरा का पूरा मिल गया सिंधु में। तो ये तो चार पूरे के पूरे थे। मैं हूं आधा। तो वो चार शिष्य और आधा में साढ़े चार टक्के ले जाओ। वो साढ़े चार टक्के धर के वहां और चल दिए। बोले अब देखो क्या होता है। जय राम जी के।



        जो निकट के होते हैं, क्लोज होते हैं, वे भी कभी-कभी ऐसे खतरनाक गद्दार होते हैं कि उससे दूर वाले अच्छे। उन्होंने निंदा करना चालू कर दिया। अर्जुन देव ने संदेशा भेजा कि आप आओ, कीर्तन करो, भजन करो, संगत को उल्सित आनंदित करो, नहीं आएंगे | दूसरी बार आदमी भेजा बोले हम नहीं आएंगे | तीसरी बार भेजा बोले क्या रोज रोज आदमी भेजते हमारे बिना तुम्हारा आश्रम कैसे चलता है वो अब देखेंगे | ये तो तुम्हारे गुरु नानक को भी हमारी कौम का हमारे आदमी बाला मर्दाना ने चमकाया था नहीं तो तुम्हारे गुरुओं की कौन चिकनी लेता है बाबा कौन पूछ तो हमें वारी प्रशंसा करी इट तुमने रोटला मोटा आया हां ये निष्कृष्ट प्रकृति का स्वभाव | हमारे कारण ही तो तुम गुरु हो के पूजे जा रहे हो, अब देखो क्या होता है सरल स्वभाव अर्जुन देव खुद चले गए कि भाई जो हुआ सो हुआ तुमने तो कहा था शिष्यों से टक्का दिलाओ | तो शिष्य तो हो महापुरुष चार शिष्य पूरे थे और मैं आधा साढ़े चार टक्के दिए तुमको | चिंता नहीं करो तुम्हें पैसे मिल जाएंगे बेटी की शादी हो जाएगी, फर्क क्या पड़ता है, आपकी बेटी हमारी, बोले अब ये मीठी मीठी बातें से नहीं चलता, जब तुम्हारा काम रुका है तब हमारे पास आए, हम आने वाले नहीं है | तुम तो ऐसे हो तुम्हारे अंगद देव भी ऐसे थे, अर्जुन देव, तुम क्या समझते हो तुम्हारे गुरुओं की गादी गुरु ये वो सब ऐसा करके गुरु नानक तक के गुरुओं की निंदा करना चालू कर दिया | अर्जुन देव ने कहा देखो मेरी जब तक निंदा कर रहे थे तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था | कि निष्कृष्ट प्रकृति की निंदा हो रही है, मैं मान लेता | लेकिन वे पूर्ण स्वरूप में लीन हुए मेरे ब्रह्मवेत्ता गुरुओं की तुम निंदा करते हो। यह मेरे से नहीं स जाता है। बोले नहीं साता तो क्या कर लोगे? हम तो करेंगे। फिर बकने लग गए। बकने लगे तो उस महापुरुष ने अपना वाक का तीर छोड़ा। श्राप दिया। अब हम तुम्हारा त्याग करते हैं जाओ तुम्हारा सत्यानाश। ......(contd to part 2)











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