गुरुवार, 27 अगस्त 2026

अद्वैत ब्रह्म का ज्ञान

 



अद्वैत ब्रह्म का ज्ञान  

0:000 अपना काम तो पूरे जगत से पार तत्व जो  है, उस तत्व को में  रूप में जानकर उसमें  आराम पाना ही अपना पुरुषार्थ है,   साधन से रिद्धि सिद्धि मिलती है,  लेकिन सतगुरु अगर सूरमा नहीं है शब्द की चोट करके साधनों के साथ की, शरीर की साथ की  अहम् प्रत्यय बुद्धि तादात्म्य बुद्धि नहीं तुड़वाया तो साधक भटक जायेगा | 

 इष्ट मंत्र गुरु को त्याग कर जो इधर उधर भटकते हैं समझ लो उनके चित्त  पर श्रद्धा नहीं है  | और श्रद्धा हीन व्यक्ति कहीं भी सफल नहीं हुए | ……आत्मज्ञानी महापुरुष जैसा विश्व में और हमारा कोई हितैषी था  नहीं, है नहीं, होना चाहे तो हो नहीं सकता |......

  ०१. जय हो ओम ओम ओम ओम

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। 

बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥

हमारा राग भय क्रोध व्यतीत हो गए लेकिन परिच्छिन्नता दूर नहीं हुई , में निर्भय हूँ अंतःकरण उपहित  हो जायेगा की में निर्भय हूँ | मुझे क्रोध नहीं तो,  भय राग क्रोध से अंतःकरण मलिन हो जाता है और जिव बेचारा जन्म मरण का भागी होता है | भय राग क्रोध मिटने पर फिर भी जिव को साधनों में मैं बुद्धि रहती है | 2.10 हकीकत में भय राग क्रोध रहते हैं मन बुद्धि में और मन बुद्धि साधन है | तो हम साधनों की सुद्धि साध्य को देखने के लिए तो करे तो वो तो ठीक है लेकिन साधनों को मैं मानते रहे तो साध्य  ठीक से नहीं देख पाएंगे|


 2.25   ईश्वर हमेशा सिद्ध तत्व है, सिद्ध वस्तु है|  ईश्वर अगर इंद्रियों का विषय होता, साधनों के द्वारा दिखने का विषय होता तो गाय, भैंस, कौओं,  घोड़े, गधे  को ईश्वर दिख जाता| ईश्वर इंद्रियों का विषय नहीं है, ईश्वर तो यह सब इंद्रियों को नेती नेती करने के बाद, जो स्वत सिद्ध तत्व है वह इश्वर है | 3.00 उस इश्वर में माम्माना होना चाहिए, सत्कर्म करने के लिए धन आदि का उपयोग, ईश्वर प्राप्ति के लिए साधनों का अवलंबन, और सत्कर्म करने के लिए बुद्धि का अवलंबन लेने वाले व्यक्ति से भी जो मामउपाश्रिता है, इश्वर के माम के नजदीक बैठता है वह जल्दी पहुंचता है|

ध्यान से सुने| 3.४४ यहां तक कि संग्रह और भोग का त्याग  करने का साधन भी उतना तीव्र नहीं पहुंचाता, जल्दी नहीं पहुंचाता, जितना मामुपाश्रिता  होने से होता है |3.52 इश्वर का माम, उपाश्रिता माने समीप, इश्वर के उपवास, उप माने नजदीक   वास, 4.०५ 

संसार में  हम लोग किसी ना किसी का आश्रय लिए बिना नहीं रहते ,  किसी में हमारी प्रीति होती है और   किसी का हम आश्रय लेते हैं,  धन में कुटुंब  में परिवार में मकान में गाड़ी   में गहनों में कपड़ों में हमारी प्रीति होती है,  और जो बलवान है उनका हम आश्रय  लेते हैं|04.३५ पदार्थों में प्रीति होती है,  और बलवान उन पदार्थों की रक्षा करने में जो समर्थ है,  उनका हम आश्रय लेते हैं| 4.48  तो पदार्थों की प्रीति नश्वर पदार्थों की प्रीति हमें दुख  देती है और पराधीन रखती है| और वही आश्रय भी हमें भय से बनाए रखता है|  उनका भय बना रहता है|  सेठ का आश्रय साहूकार का आश्रय   किसी न किसी का  नेता का किसी न किसी का आश्रय  लेंगे,  तो यह जीव  हमेशा कोई न कोई आश्रय भीतर थमा हुआ है| 5.16 कहीं न कहीं  इसकी प्रति है और कहीं ना कहीं इसका आश्रय है |  प्रीति और आश्रय  जब तक बाहर बना रहेगा तब  तक भय क्रोध और राग जायेगा नहीं | 5.३३   और प्रीति और आश्रय  जब तक बाहर रहेगा तब तक भय क्रोध और राग जायेगा नहीं |  क्योंकि जो वस्तु हम चाहते हैं उसमें अगर विघ्न डालता है कोई तो उसके प्रति क्रोध होगा|  अगर हमारे बराबरी  का है | 5.५५ और हमारे से बड़ा   होगा तो उसे भय होगा,  कि अब उसने विघ्न  डाला  है|  यह बड़े पहुंचवा उसके भय होगा |  तो भय कभी-कभी तो कल्पना करके भूतकाल  का चिंतन करके द्वेष  होता है| 6.११  दुख होता है, भूतकाल में सुख भोगा है उसकी याद में भी  दुख होता है,  और भविष्य काल का कल्पना करके भी भय पैदा होता है|  वर्तमान में हमारी बुद्धि में मोह होता है |  हम जब तक माम उपाश्रिता नहीं   होंगे  इश्वर के उपासक ठीक से नहीं होंगे |  इश्वर के तत्व को समझेंगे तो उपासक को |  तो इश्वर का माम , इश्वर का माम खोजो तो तुम्हारा माम मिल जायेगा, और तुम्हारा माम खोजा तो तुम्हारा माम मिल जायेगा | 6.45   क्योंकि -


ईश्वर अंश जीव अविनाशी,  चेतन अमल सहज सुख रासी,  


सो मायाबस भयउ गोसाईं बँध्यो जीव  मरकट की नाइ


 जैसे तोता बांसुरी पर  बैठता है तो उसकी वजन से बांसुरी घूम जाती है | 7.04  तोता चोंच से पकड़ता है कि मेरे को किसी ने पकड़ा है| अथवा मरकट अपनी ही मुट्ठी बांधकर पकड़ा जाता है ऐसे ही हमारी वृत्तियों से ही हम इस नश्वर भोग में नश्वर पदार्थों में नश्वर आश्रयों में बांधे हुए हैं,  वरना बांधने की संसार में ताकत नहीं,  यह बंधन हमारा स्व निर्मित है, यह स्व  निर्मित बंधन को जब तक हम स्वयं नहीं उखाड़ फेंकेंगे,  तब तक महाराज परम पद का अनुभव नहीं होगा|  तो जो लोग अज्ञान के तिमिर में गोते खा रहे वो  अज्ञानी हैं , और दूसरे शंकाशील| 7.५४  भागवत में आया है ,  कि कौआ  कदम-कदम पे  शंका  करता है | जो दाना चुगाता है  प्रतिदिन जो रोटी का टुकड़ा निकालता है नि  उस पर कौआ शंका करती  है | ऐसे ही जो अज्ञानी  है, और अहंकारी हैं, वो  अपने परम हितैषी संतों पर भी शंका करते हैं | जयरामजी की |जो हमें ज्ञान का चुगना चुगाते हैं उनके प्रति भी शंका होती है | धरम पे शंका इष्ट पे शंका शास्त्रमे शंका  अरे भाई श्रद्धा बिना तो तुम माँ को भी माँ  भी नहीं कह सकते, और बाप को बाप नहीं कह सकते क्यूँ की मान और बाप को तुमने देखा नहीं | 8.29


श्रद्धा तो एक  ड्राइवर पर  भी रखनी पड़ती है 80 आदमी  धनमाल जान सब एक ड्राइवर के सुदर्शन चक्रपर स्टेरिंग पर भरोसा रखते हैं |  एक हवाई जहाज अमेरिका  जाता है महराज दश 12 हजार टिकिट लेकर टिकट पहले लेकर आन माल श्रद्धा के बल पर रखते हैं अमेरिका जाते हैं और अमेरिका से आते है| हालाँकि  कई हवाई जहाज गिर पड़ते हैं और कई पायलट नशेबाज हो जाते हैं |कई कुछ होजाते हैं ड्राईवर फिरभी गाड़ी चलती है | 9.०५ आप श्रद्धा चाहे बनाने वाले पर भी रखते हैं कि गाय भैंस का दूध का दूध होगा गेटे या बकरे का या गधे का दूध नहीं होगा | अथवा तो जूठा नहीं होगा सुद्ध होगा | अथवा तो आप इंजेक्शन लगाने वाले पर भी श्रद्धा रखते हैं की दिस्तिल्वाटर नहीं होगा हालाँकि दिस्तिल्वाटर की इंजेक्शन लगाकर डाक्टर लोग , कई ऐसे मुर्ख डाक्टर हैं जो प्रजा का शोषण कर लेते हैं |9.26 फिर भी और लोग इंजेक्शन लगवाते हैं |आप दाढ़ी उतरवाने वाले हजम के पासव जाकर सलून वाले पर श्रद्धा रखते हैं अपने गर्दन डे देते हैं | वो जरा यूँ देता है तो और यूँ कर देते| यूँ करते करते इधर भी तो घुमा सकता है लेकिन फिर भी श्रद्धा से दाढ़ी उतुर्वाते हैं | ये छोटे मोटे बिखरे बाल ये भी आप श्रद्धा से , नै का को तो देख अस्त्र कितना तेज है | उसको आप गर्दन देदेते हैं तो जनम जनम की जो दाढ़ी बढ़ी है उसको कटाने के लिए ब्रह्म वेत्ता के आगे गर्दन रखदी तो क्या बात है |

श्रीकृष्ण कहते हैं - श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रिय

 श्रद्धा के साथ तत्परता,  हमारी इष्ट में ब्रह्मवेत्ता  के वचनों में कितनी श्रद्धा है उसको अगर अंदाजा लगाना चाहिए तो उनके बताए हुए मार्ग पर उनके बताए हुए उपदेश पर  उनके बताए हुई युक्तियों पर  हम तत्परता कितने है,   हमारे उनके बताई हुई निष्ठा पर बनाई हुई टेक्निक बताई हुई ज्ञान कला पर तत्परता है तो हमारी श्रद्धा है | नहीं तो ,  हमारी तत्परता नहीं गुरूजी आपको तो में  बहुत मानता हूं, लेकिन आपकी बात मैंने नहीं स्वीकार करता|   गाँधी को तो बहुत मानता हूँ   लेकिन गांधीवाद से मुझे नफरत है | तो गांधी को क्यों मारा ऐसे ही गुरु पर श्रद्धा शास्त्र पर श्रद्धा, गुरु वचन पर श्रद्धा आदमी को …| श्रद्धा का धागा पतला है लेकिन, भव पार करा देता है| जो बोलते हैं की हम श्रद्धा फ्राद्धा नहीं रखते | तो समझ लो वो मुर्ख है या तो अभिमानी है, वो इस पृथ्वी पर या अतल वितल में 14 लोकों में अपना कोई हितैषी नहीं समझता या अपने से कोई श्रेष्ठ ज्ञानी नहीं समझा है | ११.19 इसलिए उसकी श्रद्धा नहीं | तो जो अभिमानी  होते हैं दुसरे को  श्रेष्ठ नहीं मानते , जो महा मुर्ख होते हैं पशु तुल्य होते हैं उनकी श्रद्धा नहीं होती | पशुओं में श्रद्धा नहीं होती | ११.३४  जिसका रजो तमो गुण बढ़ गया और पाशवि वृत्तिओं से आक्रांत है वो श्रद्धा हिन् व्यक्ति कदम कदम पर भयभीत होते हैं  कदम-कदम पर महाराज उनको उद्वेग  होता है,  कदम-कदम पर उनको द्वेष होता है राग  होता है उस लिए उनका चित्र खंड-खंड हो जाता है|  तो सुविधाएं होती  है लेकिन सूख नहीं होता है, सुविधाओं और सुख  का संबंध इतना नहीं है, शांति और सुख का संबंध है, चित्त  में अगर सुविधाओं के लालसा है तो सुविधा से सूख की भांति होगी  हास …| लेकिन फिर हास कहीं  कि कहीं घूमेगी लेकिन चित्त  में अगर श्रद्धा है साधन और ज्ञान के बताए मार्ग पर तत्परता है, तो आपको अनुकूलता मिलेगी तब भी उसका उपयोग करलोगे, और प्रतिकूलता मिलेगी तब भी आप समझ लोगे  कि  आगमों पायी अनित्यास च - ये अगमो है अपायी है अनित्य है,  आने-जाने वाले सुख-दुख हैं |  मैंने दोपहर के सत्संग के समय में अर्ज किया था - कि सुख आया या दुःख आया 2 घंटे के बाद उसका प्रभाव उतना नहीं रहता जो  पहली बार प्रभाव होता है | 2 दिन के बाद उसका प्रभाव अत्यंत शिथिल हो जाता है 2 महीने के बाद अत्यंत शिथिल हो जाता है | 2 वर्ष के बाद तो महाराज उस दुःख का प्रभाव याद ही नहीं रहता है |  10 -  20 साल के बाद उसको याद दिलाने वाले लोग भी मुलाकात नहीं मिलते वह भी कहीं-कहीं हो जाती है|  तो जो बहने वाली सरिता में फूल, भी बहे तिन्खे भी बहे  उस समय बड़ा प्रभाव दिखाते हैं| लेकिन आप ज्ञान में तत्परता है मन्मय हो आप अपने स्वरूप तरफ हो , तो इन साधनों को , सुख दुःख दिखने वाले आपके लिए एक मनोरंजन हो जायेगा ,  स्वनिर्मित खिलवाड़ हो जाएगा नहीं  तो आपके लिए प्रारब्ध निर्मित, ईश्वर निर्मित,. समाज निर्मित गेंद बन जायेगा| वही  का वही घटना अगर आपके पास ज्ञान है,  तो आप के लिए स्व  निर्मित विनोद हो जायेगा, 13.33। 

विनोद मात्र व्यवहार येन ब्रह्म निष्ठ प्रमाण 

बिनोद मात्र जिसका व्यवहार होता है वही ब्रह्मवेत्ता है। बड़ी बड़ी प्रवृत्ति जिन महापुरुषों ने की, बड़े बड़े सुधार किये हैं कि उनके चित्त में देखो तो कभी कर्तृत्व नहीं बड़े-बड़े दुख जिन्होंने सहे और फिर भी मुस्कुराते रहे प्रसन्न रहे तो उनके चित्त में दुख की रेखा या सुख की रेखा नहीं पडती,   हकीकत में इंद्रियों पर, शरीर पर,  यह व्यवहार में जो दुख आता है या सुख आता है उसका तब तक प्रभाव नहीं पड़ता जब तक बुद्धिपूर्वक हम उससे सहमत नहीं होते। जय राम जी की बोलना पड़ेगा। 14.18।  जब तक हम अपने हस्ताक्षर नहीं करते तब तक दुख सुख का प्रभाव भय क्रोध का प्रभाव हम पर नहीं पड़ सकता है। तो बंधन, स्वनिर्मित बंधन इसलिए कृपा करके स्व निर्मित बंधन - स्व को ही दूर करना पड़ेगा कोई आकाश के देव आकर आपके बंधन का दूर करेगा ऐसी मान्यता मे मत रहना। 14.40। संतोषी दुख दूर कर देगी इस चक्कर मे मत पड़ना। तुम्हारा हस्ताक्षर तुम संतोषी को तो संतोषी दुख दूर कर देगी। और जिसस को महत्व दे दोगे तो जिसस दुख दूर कर देगी  लेकिन महत्व तो तुम दोगे। महत्व तुम दोगे तो वो आये और कहें और तुम मानो इससे पहले कृष्ण की बात मान लो कोई संत की बात मान लो। तुम क्यों परेशान कर रहे हो। जय रामजी की 15.09। तो बुद्धि हमारे शंकाशील रहती है, तो जो कदम-कदम पर शंका करता है। एक तो करेला हो, करेला कड़वा होता है, और दूसरा नीम चढ़ा करेला हो।  Gj - नीम चढ़ा करेला होये…. एक तो करेला और दूसरा नीम चढ़ा करेला, एक तो अज्ञानी और दूसरा शंकाशील एक तो अज्ञानी और दूसरा अहंकार वाला15.45। श्री राम|

स धूनी धूनी पछताबही 

कालही कर्म ही मिथ्या दोष लगावही।

क्या करें जमाना ऐसा है| आज कल गुरु नहीं मिलते | आज कर धरम के नाम पे ये वो कहीं शांति नहीं कहीं सुख नहीं | ऐसा नहीं वेसा नहीं |   लेकिन जिस की तत्परता है वह वृद्ध पुरुषों को खोज लेता  है ज्ञानियों को खोज लेता है , गुरुओं  को खोज लेता है, अपना मार्गदर्शन खोज लेता है और अपनी बेवकूफी मिटाते-मिटाते अपने घर में पहुंच जाता है| बेवकूफी मिटाने का नाम ही भगवान की प्राप्ति है | 

की बाबाजी में MA पढ़ा हूँ| बेवकूफी मैंने मिटा दिए|  तुम को राजी करना होतो बोलेंगे ठीक हो साहेब हो | लेकिन वेवाकुफी नहीं मिटेगी | मैं आईएस होगया हूँ बेवकूफी मितादिया मैंने | … नहीं शास्त्र वह इस प्रकार, किस को बेवकूफ बोलते हैं कि - इंद्रियों को मन को शरीर को इन साधनों को  को मैं मानकर जो हम जीते हैं तो बेवकूफी है | 16.52 इन साधनों को साधन मानकर अपने मैं को आप जानते हैं तब बेवकूफी मिटती है | अपने मैं  को जाना तो आप किसी भी प्रदार्थ से किसी भी स्वर्गीय सुख से किसी भी ब्रह्म लोक सुख से प्रभावित नहीं होंगे| 

 देखा अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो गया,

 ना छेड़ो मुझे यारों में खुद पे  मस्ताना हो गया |

रुबिया और  हसन मित्र संत  थे| कोई उत्सब में कोई गए थे | वहां लो नमाज पढ़ने को कर रहे थे , लेकिन हसन के मन में हुआ की कुछ कर दिखाएँ| हसन ने रुबिया को कहा बहन चलो अपन वहां बैठकर नमाज पढ़ने| रुबिया समझ गयी की हसन प्रदर्शन  करने निकले हैं | 

 साधन से पाई हुई चीज में अहम् प्रत्यय  करके अब दूसरों को प्रभावित करना चाहते हैं | अभी द्वैत  बना हुआ है |  चादर बिछा दी पानी पर और उस पर खड़े हो कर सिजदा  कर लें, रवीना ने उन्हें उन्हीं की भाषा में जवाब देना चाह ,  रुबिया  ने क्या करा  कि अपनी चदरिया हवा में ठहरा कर कहा,  के अब इधर तो लोग देख लेंगे , अपन ऊपर ही जाकर सिजदा करते हैं |  हसन को अपनी भूल समझ में आ गई , और हुआ के  आप तो मेरे से बहुत आगे हैं ,  बोले भैया जो मछली कर सकती वह तो कर  दिखाया,  और जो एक चिड़िया कर सकती है  वह मैं कर दिखाया | यह कोई  सार बात नहीं यह सार  बात तो यह है कि अपने  स्व में टिको  और  संसार को सपना  मान कर अपने राम में आराम करना ही सार बात है | १८.48 

   हवा में चदरिया टिका  देना, या  अथवा पानी पे चल लेना, मछली कौओं का काम है | अपना काम तो पूरे जगत से जो पार तत्व है , उस तत्व को में रूप में जानकर उस तत्व में आराम पाना ही अपना पुरुषार्थ है | जो मछली और कौआ  कर सकते हैं उतना ही किया तो मानवता का फल क्या ? 19.00 


तो साधन से रिद्धि सिद्धि मिलती है , लेकिन सतगुरु अगर सूरमा नहीं है शब्द की चोट करके साधनों के साथ की, शरीर की साथ की  अहम् प्रत्यय बुद्धि तादात्म्य बुद्धि अगर नहीं तुड़वायेगे  तो साधक भटक जायेगा | 


 मैं भुत सिद्धि का मंत्र लेने गया, में प्रेत सिद्धि का मंत्र लेने गया, क्यूँ की मेरे जीवन में शोक है मे अशोक होना चाहता हूँ। नाम तो अशोक रखा लेकिन शोक भरा है। भुत सिद्धी का प्रेत सिद्धि का पूछड़ा सिद्धिका, अरे


 तू क्यूँ सिद्ध बनना चाहता, तुझसे सब सिद्ध है,

 चाह न कर चिंता न कर चिंता ही बड़ी दुष्ट है,

 तू श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ है मगर तू चाह करके भ्रष्ट है।19.57


तू श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ है महान से भी महान है। तू अपने आप मे मनमया हो जा तब पता चले। इष्ट मंत्र गुरु को त्याग कर जो इधर उधर भटकते हैं समझ लो उनके चित्त मे श्रद्धा नहीं है। और श्रद्धा हीन व्यक्ति कहीं भी सफल नहीं हो सकता।  एक कुआं खोदा फिर देखा के पानी नहीं निकला 15 फीट मेहनत की फिर दूसरा खुदा तीसरा खोदा पूरा खेत कुओं से भर दिया महाराज दो बून्द पानी की नहीं निकला। पुरुषार्थ तो बहुत किया लेकिन मनमाना किया, मनमाना काम अगर हम करते गए तो मन पुष्ट होगा। एक जन्म क्या हजार जन्म मे भी अपने स्वरूप का बोध नहीं होगा।


इसलिए गीतांकार ने कहा 20.56

विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञान चक्षुषा।


अज्ञानतिमिरांधस्य ज्ञानांजनशलाकया

 चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः


 जो अज्ञान तिमिर को हटाकर, ज्ञान की आँख दे दे ऐसे गुरुओं को हमारा नमस्कार है।  ऐसे गुरुओं के हमें खोज है। 

 हमारी बुद्धि जब तक साधनों से अटैचमेंट नहीं करती तब तक हम बंधन नहीं होता, हम घर से यहां आये कई गाड़ियाँ मोटर मकान व्यक्ति मिले लेकिन उनकी स्मृति नहीं है।   जिनके प्रति राग था उनकी स्मृति है। और जिनके प्रति द्वेष था उनकी स्मृति है।   जिस मकान दुकान व वहीकल के प्रति राग था 21.49  कि रास्ते में वह फलानी व्हीकल देखी  कि फलानी कार  देखि,  हम ऐसे लेने वाली हैं ,  आप अगर कार खरीदते हैं तो जिस प्रकार की कार खरीदने उसी प्रकार अगर रोड से गुजर रही है तो आप चित्त पे रेखा पड़ेगी, जिस प्रकार की कार  आपके पास या बेचना चाहते हैं तो कुछ, मतलब जिसके प्रति आप राग होगा द्वेष होगी तो वही चीज आप के चित्त पर रेखा डालेगी | अगर आपके मन में मन्मया  है,  अपने स्वरूप का बोध है , स्वरूप का बोध होने से संसार गन्धर्व नगर लगेगी ,  गन्धर्व नगर कोण सी चीज के प्रति राग करोगी और कोंसे चीज के प्रति द्वेष करोगे  संसार  भी एक सिनेमाघर गंधर्व नगर का भाई तो है,  और क्या है सिनेमा मैं आपको एक स्त्री दिखी जो भोजन बनाकर तैयार रखिए कह रही है - के ले लो लो मेरे भैया मेरे पति | और पति अकड़ा है की - नहीं ऊँ…| आपको भूख लगे तो क्या आप कुर्सी छोड़ कर खाने जायेंगे ? की चल वो नहीं खाते तो मेरे को दे दे बहन,  सिनेमा घरो में बहुत जोरो की मारा मरी हुई| एक दुसरे के दांत तोड़ डाले तो क्या आप महम पट्टी करने जायेंगे ? अथवा छुडवाने जायेंगे ? अगर छुड़ाने जाते हैं तो आप सिनेमा को सच्चा मान रहे हैं | और  डर के भाग जाते हो की भागो भागो भागो | सिनेमा पूरी होने के बाद सिनेमा का जो कुछ तुमने देखा उसके प्रति क्या तुम्हारे राग या द्वेष की बुद्धि रहेगी?  नहीं सिनेमा को सिनेमा समझ लिया,  तो उसने सिनेमा ठीक से देखा | और सिनेमा को सच्चा माना तो .. ऐसी लंबी चौड़ी हो जाएगी,  नखें  आवारा कट हो जाएगी,  और चाल-ढाल ऐसी हो जाएंगे,  क्यूँ की साइन माँ देखने में अशांति आएगी |  कि सिनेमा वाले नहीं चाहते कि आप अशांति  आ जाये लेकिन सिनेमा में स्त्री-पुरुष दिखाए जाते हैं, उनके रहन-सहन घूमना-फिरना और हवाओं और तूफानों और बारिशों का मजा लेना जो दिखाया जाता है,  हिचके में डोलना और  कार चलाना और एक दूसरे तरफ मुस्कुराना निहारना वह दिखाया जाता है एक्टिंग|  और उनका पॉप पाउडर और महाराज  श्रृंगार हरसिंगार मेकअप जो है सो, वो वो   मेकअप  किया होता है , तो सिनेमा की स्त्री , आपके स्त्री तो सिनेमा की स्त्री के नहीं हो सकती , और आप के घर तो सिनेमा वालो के घर जैसा तो बनेगा नहीं | और आप का हस्बैंड भी हीरो जैसा  होगा नहीं ,  और आपकी मिसिस भी   हीरोइन जैसी होगी नहीं,  तो वह देख कर अगर चित्त में  राग   घुस गया तो अपनी मिसेस होते हुए भी चित्त  में खिन्नता  रहेगी,  अपना मिस्टर होते हुए भी चित्त  में खिन्नता  और अपने घर में रहते हुए भी आप अपने घर में नहीं है,  किस काल्पनिक घर में गोते खा रहे हैं| जय राम जी की | 24.५१  इससे अशांति होगी , क्यूँ की बुद्धि में राग आ जाता है | 


किसी की मोटर देखकर किसी की बड़ी देखकर , किसीकी लाड़ी देखकर ,किसी का रूप देखकर,   किसी का कुछ देखकर बुद्धि अगर अटैचमेंट कर रही है,  इच्छा कर रही है, तो आप का सूख खंडित  हो जाएगा, आपके शांति हो गुम हो जाएगी| और बुद्धि निर्णय शक्ति से कुछ नीचे चली आएगी | हकीकत  में किसी रूप, किसी की लाडी को देखकर सत्ता देख कर बांछा नहीं करो , उसके सत्ता उसकी लड़ी बाड़ी उसके  भी चार दिन का है और ये भी चार दिन का है| 25.30 लेकिन वो जिस  सत्ता से जी रहा  है वह अमर आत्मा तो अभी मेरे पास इतने का उतना है, उसको तो उसका  पता नहीं लेकिन मेरे को सत्संग के द्वारा पता है, तो इसी के रूप में मैं तो भोग रहा  हूं , हरि ओम शिवोहम शिवोहम|  यह तुम्हारे ज्ञान का उपयोग है , श्रद्धा का उपयोग है ,  और तत्परता की निशानी है|


किसी राष्ट्रपति और प्रेसिडेंट को देखकर सुकडो  मत और उसको देखकर इर्षा मत करो लेकिन अंदर में सोचो के जवाब दरिंआँ तो वह विचारा  सहन  करेगा, सुख तो हम ले सकते हैं कि प्रेसिडेंट होकर हम बात कर रहे हैं, राष्ट्रपति होकर हम एस  कर रहे हैं या सैर कर रहे हैं| महाराज नेता बने हुए तो हम हैं, जनता है तो हम हैं ,  साहूकार  है तो हम हैं, और शाहनी  नजर से,  उनके शाहनी  नजर तुम अपनी नजर मान लो , उनका टेंशन अपने सिर पर मत लो, लेकिन उनकी शाहनी  नजर  जिस  सत्ताधीश से  है,  वह परम सत्ता मुझ आत्मा परमात्मा की है|  सो हम | 26.32 जो राष्ट्रपति जिस कि सत्ता से उनकी आंखें देखती है, जिस सत्ता से उनके कान सुनते हैं, जिससत्ता से  वह बोलते हैं,  जिस सत्ता से  यान से यात्रा करते हैं,  वह सत्ता चैतन्य आत्मा की है, और आत्मा परमात्मा मेरे ह्रदय में भी उतने का उतना है ,  राष्ट्रपति को जो सत्ता डे रहा है,  वह मेरे शारीर को सत्ता दे रहा है और वही वास्तविक में मेरा स्वरूप है,  तो यह सब मेरे स्वरूप ही अनेक है ,  शिवोहम शिवोहम करके आनंद लीजिये  |  लेकिन वह बनना,  और बनना तो फिर महाराज पोस्ट छूटेगा’  फिर जब घर जाना तो वहां भी सुकड़ना 27.११  


 मैंने सुना कोई चीफ मिनिस्टर  गुजरात के 10-5-15 साल पहले की बात है, देसाई थे कोई केंद्र मे, वो जब गद्दी छोड़ी और उनकी गाड़ी दिल्ली दरवाजा पुलिस वाले ने रोकी, ट्रैफिक कंट्रोलर होता है न?  साइड देते हैँ न? दो दिन पहले तो सायरन बजाकर गाड़ी निकली थी सैरान बजाकर, और महाराज ट्रैफिक कंट्रोलर ने कंट्रोल दिल्ली दरवाजा के लारी वालो ने देखा की, देखने को आये तो उन्होंने अखवार मे मुँह ढक दिया, जो वाह्य पद प्रतिष्ठा पाकर अनुभव करता है तो, वाह्य पद प्रतिष्ठा तो एक दिन छूटता है,  5 वर्ष की सत्ता 10 वर्ष की सत्ता पा कर जो अपने को सुखी मानता है उसकी दयनीय स्थिति है, क्यूँ की सत्ता तो तुम्हारी नहीं है, सत्ता तो प्रकृति का है, व्यवस्था की है, तुम्हारी बस्तविक सत्ता तो तुम्हारा केंद्र है, 28.14। तुम्हारी सत्ता ये बाहरी सत्ता है, व्यावहारिक सत्ता है, परामर्थिक सत्ता  स्थिर रहती है, व्यावहारिक सत्ता बदलती रहती है, 

खून पसीना बहाता जा तान के चादर सोताजा

यह किस्ती तो हिलती जायेगी तू हँसता जा या रोता जा 


उन यात्रियों की दयनीय स्थिति है, जो महाराज चलती नाव मे स्थिर रहना चाहते हैँ। जय जय। उन यात्रिन की बिलकुल दया जनक स्थिति है बहती पानी मे चलती नाव में स्थिर रहना चाहते हैँ, समय की बहती धारा और व्यवहार की चलती नाब, और उसको स्थिर करके सुखी रहना चाहते कितनी दयनीय सोचनीय स्थिति है। एक तो करेला और दूसरा नीम चढ़ा करेला, gj…. ऐसे एक तो अज्ञानी और दूसरा श्रद्धा हिन, श्रद्धा हीन व्यक्ति क्या करेगा मन में जो आएगा ऐसे करेगा और मन में जो मंत्र आया वो जाप लिया तो जिस मंत्र की व्याख्या सुनेंगे बढ़िया आज वह दूसरे पुरुष के पास दूसरे मंत्र की स्थिति सुनेंगे दूसरे जपेंगे। जिस आराध्य का आप आराधना कर रहे हैं 15 25 दिन दो साल दूसरे की महिमा सुन उसका जप तप करने लगे तो साधन बदलते-बदलते महाराज काम नहीं बनेगा लेकिन

आपके जीवन में जो अज्ञान अज्ञान उस को निवृत्त करने के लिए आत्म ज्ञानी महापुरुष मार्ग निर्दिष्ट कर दे उस मार्ग पर आप चल रहे हैँ उनकी सिख को तत्परता से आप व्यवहार में ला रहे हैँ। तो आप स्वतंत्र सिंहासन पर बैठने की अधिकारी हो जायेंगे। स्वतंत्र सिंहासन क्या है? जीवन मे काम का प्रसंग आएगा, क्रोध का आएगा, भय का आएगा, लोभ का आएगा और आप उसके साथ अटैचमेंट नहीं करेंगे।30.23 काम क्रोध लोभ भय चिंता दुख यह तब तक प्रभाव रखते हैं जब तक 30:30 हम उनके साथ जुड़ते हैँ, स्लॉटर हाउस कि खूंखार तलवार तब तक प्रभाव रखती है, जब तक उसके साथ करंट जुडा है, सिगड़ी तब तक प्रभाव रखती है जब तक इलेक्ट्रिसिटी जुडी है। ऐसे ही तुम्हारे चित्त में जो दुख आता है,  तो दुख के साथ नडोगी नहीं ती दुख का प्रभाव डिसकनेक्ट हो जाएगा। जो सुख की लोलुपता आती है उसके साथ बुद्धि का हस्ताक्षर न करो तो डिसकनेक्ट हो जाएगा।31.05 यह बहुत ऊंची साधना है, बड़ी ऊंची समझ है। 


आज श्रीकृष्ण के इस लोक से हमें बहुत ऊंची समझ मिल रही है कि -  मनमया ईश्वर तत्व को ख्याल करके उसमें टिक जाएं। भय  राग और क्रोध को छोड़कर  भय राग क्रोध को सम्मति न दे कर अपने स्वरूप में सम्मति दे तो भय राग क्रोध प्रभाव तेज हीन हो जायेगा। जैसे जली रस्सी बांध नहीं सकती और टॉर्च मारकर बिखरा हुआ ठुठा जो चोर डरा नहीं सकता,  रस्सी में दिखने वाला सांप और उसका मायबाप महत्व नहीं रखता ऐसे ही ब्रह्म मे दिखने वाला जगत आप के लिए महत्व नहीं रखता।  ना बंधन रखता है, न भय रखता है न शोक रखता है। क्यूँ कि आपके पास देखने के ठीक निगाह कि।.. जगत में जो भी दुख है उसका मूल अज्ञान है। 32.23 और उसके अब बेटा-बेटी उनका है अहंता-ममता उसका परिवार है। 


अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः


अज्ञान से जिनका ज्ञान ढक गया है वे लोग थोड़ी-थोड़ी बात विमोहित हो जाते हैँ। तो वर्तमान में विमोहित हो जाते हैं और भूतकाल में घृणा और दुख और भविष्य की चाँटा मे भय मे भर जाते हैँ। तो वर्तमान भुत और भविष्य उस अन्तःकरण का मैं जो आत्मा है जो मैं मैं मैं जो बोल रहे हैं। जिसने उसको खोजा उसके बंध खुल जाते हैँ।


जिन खोजा तिन पाया गहरे पानी पैठ

 मे भीरी डूबन डरी रही किनारे बैठ 


  33.21 मिस्र देश में एक संत हुए, उनके भक्तों का आग्रह था के गुरुदेव पधारो, अलेक्जेंडर कोई सिटी होंगी वहीँ ले गए। वहां वे भक्तों के बीच उत्सव में रहे।उन्होंने जाहर में तय किया कि कल उन दूर-दूर पहाड़ियों पर अज्ञातवास के लिए जा रहा हूं।  भक्तों ने देखा कि गुरु महाराज की हाजिरी हमारे लिए बड़ी हिम्मत देती है। गुरु महाराज के हाजरी हमारे लिए बड़ी शांति दायी। गुरु महाराज की हाजरी दुख निवृत्क सुख और प्रेम प्रकट को प्रगट करती है। आत्म विश्रान्ति देती है और सच्चा जगत में विश्व में आज तक हमारा अगर आज तक अगर जीवन मे परम हितैसी मिला हो। करोडो जीवन मे कोई परम हितैसी व्यक्ति खोजना हो वो सद्गुरु हो सकता है उसे बड़ा हितैसी कोई हो नहीं सकता। 34.23 हमारे साधनों के हितैसी तो हमारे मित्र परिवार हो सकते हैं लेकिन हमारा हितैसी सद्गुरु ही हो सकता है, दूसरे की बस की बात नहीं। और होना चाहे तो हो नहीं सकता। जय राम जी की। ध्यान से सुने।  हमारा परम हितैषी तो कोई ब्रह्मवेत्ता महापुरुष ही हो सकता है| दूसरा होना चाहे तब भी नहीं हो सकता। दूसरा हमारे शरीर का हितैषी हो सकता है खान-पान की सुविधा कर दे,  इज्जत-आबरू अहंकार बढ़ाने में जरा सहाय कर दे। ऐसा हितैषी हो सकता है। लेकिन हमें जन्म मरण से छुड़ाकर अपनी गद्दी पर जो बैठा हुआ है वहीं बैठा सकता है। जो बैठा हुआ है वह  ब्रह्मवेता है, और वही बैठा सकता है,  इसीलिए वही हमारा परम हितैषी है। उसे अतिरिक्त और पूरा हितैषी कोई हो नहीं सकता। आत्मज्ञानी महापुरुष जैसा विश्व में और हमारा कोई हितैसी था नहीं, है नहीं, होना चाहिए तो हो नहीं सकता। 35:24 विश्व के सब लोग सब अज्ञानी, जिसे आत्मज्ञान नहीं हुआ ऐसे सब लोग मिलकर भी हमें सूखी करना चाहिए सदा के लिए तो उनके बस की बात नहीं।  और हमें ब्रह्मवेता गुरु की प्रसाद पच गयी तो -  विश्व के सब लोग मिलकर हमें सदा दुखी करना चाहे तो उनके बस की बात नहीं। क्योंकि हस्ताक्षर हम करेंगे तभी  तो। खूब देखो हमारी कितनी स्वतंत्रता है कितनी आखिरी बात। ऐसे गुरु को उन्होंने ने कहा कि बाबा जी  कि आप हमारे बीच रहे आपके रहन-सहन खान-पान आने-जाने गाड़ी मोटर की सब सुविधाएं हम और बढ़िया कर सकते हैं लेकिन आप की पहाड़ियों में अज्ञात बात मत…..।  उन्होंने कहा कि भाई और तुम्हारा तुम्हारी दुनिया और हमारी दुनिया अलग। हम कभी कभी तुम्हारी दुनिया में आते हैं। नीचे उतरते हैं साधनों को मैं मानकर उसका उपयोग करके दिखा देते हैं लेकिन हम सिद्ध वस्तुओं में अपने प्रियतम में मस्त रहने के लिए….।


 एकान्तवासो लघु भोजनादौ मौनं निराशा कर्णवरोधः  


चित्त के प्रसाद को पाने के लिए एकांत और हम उस प्रियतम मे तृप्त रहेंगे एकांत में। अब बखड़े में ज्यादा नहीं।


गिरधर कविराज हो गए वेदांतिक जगत में, बहुत लोगों उन्हें जानते हैं कि गिरिधर कविराय जी ने कहा थोड़े दिन के वास्ते कौन उपाधि करें किस जीवन के वास्ते जग में पची पची मरे। जो राग मे द्वेष मे क्रोध मे लोभ मे पच रहे हैँ ऐसे व्यक्तिओं के साथ भक्त भी संत भी अधिक समय बने रहेंगे उन का थोड़ा बहुत, उशनता लगती है। जब उसनता लगती है तो स्वरुप मे निष्ठा है  हटा देंगे अथवा तो एकांत मे जाकर और गोता मारेंगे। और नीता होते हुए भी स्वरुप मे जो मजा है। ब्रह्म बेत्ता को नदी तालाब का किनारा  एकांत जंगल  झाड़ी जिज्ञासुओं के बीच उनको जितना आनंद आता है उतना संसार के बड़े-बड़े रईसों और आडंबर से जीने वाले व्यक्तियों के बीच नहीं आता।… वह संत चले एकांत मे । 


मेरे गुरुदेव भी साल में दो ढाई महीना नैनीताल के जंगलों में एकांत में निवास करते थे। ये बात इसलिए कह रहा हूं कि कभी-कभी कृपानाथ आपने जो सुना है उसको मनन निदिध्यासन के लिए कभी मौन, कभी एकांत कभी पवित्र जगह का अवलंबन लेकर अपनी निष्ठा बनेगी, रुपया बनाया आपने शरीर बनाया मकान बनाया घर बनाया लेकिन यह सब बहुत कुछ चीजें हैं छोटी चीजें।  यह बनाने के लिए आपका अवतार नहीं हुआ है,  आपका जन्म यह कुछ खिलौने बनाने के लिए नहीं हुआ। आपका जन्म हुआ है अपनी वृत्ति बनाने के लिए। वृत्ति ऐसी बनाओ के निवृत्तिऑ से निवृत्त हो जाए।  जय राम जी। कर्म ऐसा करो के कर्तृत्व का लोप हो जाए। भोग ऐसा भोगो की साक्षी भाव से की भोक्ता का लोप हो जाए। समझ ऐसी लाओ की समझ और समझाने वाला दोनों अपना स्वरूप दिख जाए।




ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ 





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