सत्संग के मुख्य अंश:
क्या हम अपने प्रयास से जी रहे हैं, क्या हमारा आदि-अंत अपने हाथ में है?
अज्ञानी जरा-सी बात में सुखी-दु:खी होता है पर बुद्ध पुरुष अपने स्वरूप में स्थित होता है।
अभी जो हमारी वृत्तियाँ हमें नचा रही हैं उसका 100 साल बाद कोई मूल्य नहीं है... काल की धारा सुख-दुख खा जाती है !
अपने स्वरूप को पहचानने के लिए इस प्रकार के विचार बड़े ही अनुकूल हैं।
हमारे मोह पर जब चोट लगती है तब हम सुखी-दु:खी होते हैं और कर्म के बंधन को बनाते हैं।
पद्मासन पर बैठकर यह उपाय करने से बड़ा सामर्थ्य प्राप्त होता है।
जब तक हम अपने आप को नहीं जानते तब तक सबकुछ व्यर्थ है।
मैन्युअल ट्रांसक्रिप्शन
00:01 जिसको ठीक से समझने वाला व्यक्ति संसार के जन्म मरण के चक्कर से छूट सकता है। ओर तो रामायण है, लेकिन योग वशिष्ठ को महारामायण कहा है ,और तो पुराण है लेकिन भागवत को महापुराण कहा हैं, और तो सब पुरुष है लेकिन इनको समझने वाला महापुरुष कहा गया है, और तो सब देव है लेकिन उसमें डुबे रहने वाले का नाम महादेव कहा गया है, शंकर भगवान को महादेव। 00:44
चित्त का एक स्वभाव, चित्त कि एक कमजोरी कहो , मनुष्य की एक कम नस भी कहो, जो छोड़ना है उसके पीछे जीवन बिताता है, और जो जीवन का सार है उसके लिए उसको समय नहीं मिलता। जिसको पाने के बाद कुछ पाना शेष नहीं रहता ,जिसको जानने के बाद कुछ जानना शेष नही रह जाता ,उसको पाना और जानना छोड़ कर जो जाना हुआ अनजाने में बदल जाता है पाया हुआ पराया हो जाता है ,उसके पीछे पूरा जीवन बर्बाद कर देता है, यह मनुष्य जीवन की कमनसीबी है। 01:36
रहता था एक फकीर किसी गांव में लोग उसे पागल कहां करते थे, और ऐसे पुरुष करीब-करीब पागल जैसी होते हैं । जिन अर्थों में संसारी चतुर होते हैं जिन बातों में संसारी कुशल होते हैं उन बातों में वे संत पागल होते हैं, और जिन बातों में संत जगे होते हैं उन बातों की तो संसारियों को खबर भी नही होती । वो फ़क़ीर एक बोजका लिए घूमा करता था | कहि कोई बस्ती मिल जाए टोकरा रंगा हुआ लाल रंग का अंगूर खाकर लोग फेंक देते ऐसा कोई टुकड़ा मिल जाता कागज का,वो अपनी गठरी में डाल देता ,कहि चिकना चमाता पत्थर देख लेटा हूं अपनी गठरी में डाल देता,कहि गोल मटोल इट का रोड़ा देखता अपनी गठरी में डाल देता, रोज अपने गठरी में कुछ न कुछ डालता भर बाजार में। घूमता गठरी लेकर देखता कुछ पड़ा है कोई सुहावना पत्थर कोई सुहावना कागज उतरता गठरी जल्दी से भर देता की आआ आ हा हा क्या मेरी माया बड़ी । दिन दिन गठरी बढ़ती जाती थी मस्तक पर बोझ बढ़ता जाता था ,गर्दन टेढ़ी होने जा रही थी, लोग उसे समझाते थे कि बाबा तुम जरा सुधर जाओ, इस पागलपन से तुम जरा बाज आ जाओ , बोलता था क्या काहे का पागलपन, ऐसा करके छीनना चाहते हो मुझसे, लेना चाहते हो, यह मेरी माया है, गठरी पर लिखा रहता तो मेरी माया ,मेरा संसार, मेरी माया गठरी के एक तरफ लिखा रहता था दूसरे तरफ लिखा रहता मेरा संसार ,तीसरी तरफ लिखा था मेरा सर्वस्व ,चौथी तरफ से लिखा रहता दुनिया क्या जाने, लोगों को पक्का पक्का पागल लगता ,दुनिया क्या जाने पढ़ते थे माया, लोगों को हसी आती,मेरा संसार, हसी आती मेरा सर्वस्व लोग हँसते ओर चौथी बात दुनिया क्या जाने लोग उसे चिढ़ाते थे कोई पागल कहता ,कोई अलमस्त कहता,कोई मंजूर कहता, कोइ गधा कहता जैसी जिसकी दृष्टि होती वैसा कह लेते सोच लेते ,लेकिन उसका काम चालू ही रहा ।सुबह हो वो चादर को गठरी के रुप में बना देता सारा दिन ढोता फिरता रात को कहीं रखता ,फिर सिरहाने रखता, उसको संभालता । दिन बीते ,सप्ताह बीते, महीने बीते। एक दिन उस गांव में कोई तत्ववेत्ता संत पसार हुए ,उसकी गठरी पर सुवाक्य लिखे थे पढ़े उन्होंने उसने, उसे बुद्ध पुरुष ज्ञानी पुरुष की नजर गई फकीर की आंखों में झाँका,उनको प्रणाम किया, लोगों को कहा की मूर्ख लोगो उसको पागल मत कहो, मूर्ख लोगो इसको बेवकूफ मत कहो,ये तुम्हे उपदेश दिए जा रहा है । ये गठरी में जो कंकर पत्थर और पत्ते कागज इकट्ठे करता है तुम्हें संदेश देता है, की तुम सारा दिन यही तो करते हो यही तो ढोते रहते हो बोझका का सफेद कागज सरकार के छपे कागज भी तो तुम इकट्ठा करते तिजोरी में रखते हो कल्पना 06:00 करते हो तो मेरा ये संसार, मैं ये महल बनाऊंगा मैं मकान लूंगा मैं यह दुकान लूंगा मैं यह शादी करूंगा मैं यह बारात निकलूंगा मैं यह करूंगा मैं वह करूंगा तुम्हारा भी अपना कूड़ा कर्कट के कल्पना का संसार है, ईट चुना बढ़ा दिया की मेरा मकान हो गया, कंकर पत्थर का इकट्ठा करके अपने जीवन को धन्य मान रहे हो,अपने को सर्वस्व मान रहे हो,ये तुम्हे खबर देता है कि जिसे तुम सर्वस्व मान रहे हो वह कचरे का ठेर ही तो है,ये तुम्हारे साथ चलेगी भी नही ओर इसी के बोझ से तुम परेशान हो रहै हो,2 रोटी के टुकड़े खाने वो भी आराम से नही खा रहे हो,2 सांसे लेनी वो भी आराम से नही ले रहे हो कितने बोझीले जीवन से से गुजर रहे हो । 06:49
तब वह फकीर कहता है की महाराज चुप हो जाओ इन बेवकूफो को समझने से कुछ न होगा मैं पूरा जीवन इसी गांव में रहा कोई मिल जाए कोई जग जाए लेकिन कोई जगा नहीं | मेरे को सुनाने की कोशिश कर रहे हैं ,मेरे को अपनी तराजू में तोलने की कोशिश कर रहै है। मैंने सोचा की कोई आ जाए मेरे मेरे इस गठरी के राज को समझ ले ताकि अपनी गठरी के बोझे वो ढोल सके ,लेकिन वो बोझा अपना वो नही फेकते मेरे को समजाते है कि फेक दे।
7.21 मेरा यह गठरी इनको बेवकूफी लगती है और स्वयं जो गठरी उठा कर भागे जा रहे हैं दिन रात, और परेशान भी है चिल्लाते भी हमें तो खुशी से विनोद मात्र उठाता हूं | मैं तो इनको समझने के लिए दिखाने के लिए जरा चेताने के लिए उठा रहा हूं और ये लोग तो सचमुच में उठा रहे हैं | मैं तो अभिनव मात्र कर रहा था, मैं तो विनोद मात्र कर रहा था, विनोद भी कर नहीं रहा था मेरे से विराट परमात्मा विनोद करवा रहा था, अभिनव करवा रहा था, लेकिन यह तो सचमुच में कर रहे हैं, उनके चेहरे पर देखो कहां है सहजता। इनके चेहरे में देखो, उनकी आंखों में झांको कहा है जीवन का संगीत। 07:58 इनके हिलचाल में झांको कहां है वह मस्ती, कहां है सहजता,कहा है वह निर्दोष बालक जैसा जीवन, महाराज इनको उपदेश देना व्यर्थ है इनके साथ बात करना व्यर्थ है,, मैंने पूरा जीवन खोया इनके पीछे लेकिन यह कल्पना के महल बाधते जाते हैं ।मेरा संसार सर्वस्व है, मेरा धन सर्वस्व है, मेरी इज्जत सर्वस्व है, अपनी कल्पनाओं की पोटली सर पर लिए भागे जा रहे हैं सारा दिन, और मैं भी इस बाजार में पिछले 32 साल से घूमता घुमा रहा हु महाराज ।
08:31 32 साल हो गए लेकिन कोई सत्य का खरीदार नहीं मिला। सब गठरियां बांध रहे है, बुद्ध पुरुषों के लिए बड़ी हैरानी है। बुद्ध पुरुष जो देना चाहते हैं वह तो हम नहीं लेते लेकिन हमारी वही शराबी हालत, वही जुआरी पने की हालत ,वही गंदी आदत है, हम छोड़ना नहीं चाहते, जब संत पुरुष बुद्ध पुरुष डांटते हैं तो हम कुछ का कुछ उनके लिए भी सोच लेते हैं उनके लिए भी कह लेते हैं कहला देते हैं । |जय श्री राम ,,,,,,,,,,,,,,,,|
09:26 शास्त्र कहते है कि मूर्ख ह्रदय न चेत यद्यपि मिलाई गुरु विरंची सम |
मूर्ख दिल जो है, वह फ़क़ीर कहता है, वह चेतसा नही है,ब्रह्माजी जैसा गुरु मिल जाये फिर भी भेस के आगे भागवत जेसी बात है । यह भागवत का श्लोक है, भगवान कृष्ण कहते हैं, भागवत का 11 स्कंद है अध्याय 28 वा श्लोक नंबर 25 वा ,,,,,,,,,,,,,, 09:50 जिसका चित समाजित हो गया, जिसने धारणा ध्यान द्वारा मेरे स्वरूप को पहचान लिया ,उसको कोई कर्तव्य नहीं है ,उसको कोई प्राप्तव्य नही है,उसको कुछ खोना नहीं है उसको कुछ पाना नहीं फिर भी गठरी उठाये जा रहा है | उस फकीर को गठरी उठाकर संसार में घूमने से कुछ लाभ लेना नहीं था ,गठरी उठाने से उसका ज्ञान जा भी नहीं रहा था बाजार में घूमने से उसकी शांति भग भी नहीं हो रही थी ,गठरी उठाने से उसकी शांति भग भी नहीं हो रही थी | कंकड़ और पत्थर इकट्ठा करने से उसका मोह बढ़ भी नहीं रहा था, और कंकर पत्थर फेंकने से उसका मोह घटे, ऐसे अवस्था भी नही थी।
वह एक ऐसी जगह पर था की उसके लिए सारा का सारा व्यवस्था सब फेल हो गई । जिससे मेरे स्वरूप का भली भांति ज्ञान हो गया है उसकी वृति और इंद्रियां यदि समाहित रहती है तो, ऐसा बुद्ध पुरुष यदि एकांत में समाधि में बैठता है तो, और व्यवहार में आता है तो, उससे कोई लाभ और हानी नहीं होती क्योंकि उसने जान लिया। ओर अब आपने जान लिया 11:02 मैं कहता हूं तो मान लो यह गुलाब है मानोगे की नहीं ? मान लिया की यह गुलाब है, लेकिन तुमने यह जानकर माना है ।
लेकिन यह मान लो कि यह गुलाब है आप नहीं मानोगे क्योंकि आपकी जानकारी होती है गेंदा है, यह गुलाब है।
जानकर जो माना जाता है उसमें फिर भ्रांति नहीं होती है। केवल जैसे माना जाता है अंजान में जो माना जाता है वह बदल जाता है जान कर जो माना जाता है वह नही बदलता।
Sindhi line आँख डीसी कन बुद्धि कड़े न विचार श्री राम,,,,
11:41 गांधी जी बोलते थे किसी सज्जन आदमी , दुष्ट आदमी को तुम अच्छा आदमी कहो तो तुम्हें पाप नहीं लगेगा, लेकिन किसी सज्जन आदमी को तुमने बुरा आदमी सोच लिया तो तुम्हारे ऊपर कर्मों का असर होगा | श्री राम ,,,,,,,,,,,
12:01 जानकर मानोगे तो बदलेगा नहीं लेकिन सुनकर मानोगे तो आपके विचार बदलेंगे । मान लो, मान लो यह दुनिया है, लेकिन ठीक से तुम यदि जानोगे फकीर को तो फिर तुम्हारे चित में परिवर्तन नहीं होगा। तुमने यदि किसी को गुरु मान लिया है ,तुमने यदि किसी को भगवान मान लिया है, तुमने यदि किसी को अच्छा मान लिया है, तो तुम्हारी वो मान्यता बदलती रहती है, क्योंकि मान्यता मन की होती है | मान्यता कल्पना सापेक्ष होती है ,जानकारी वस्तु सापेक्ष होती मान्यता कल्पना सापेक्ष होती है।
तुम्हारी कल्पना है, तुम मानते थे s sc पास हो जाऊं सुखी हो जाऊंगा, तुम मानते थे कि बस यह एग्जाम निपट जाए तो आराम से जियूँगा, लेकिंन वो आराम नही रहा क्योंकि तुम्हारी मान्यता थी तुमने जाना नही था माना था। तुम मानते थे कि बस नोकरी मिल जाए आराम मिल जाये आराम , धंधा हो जाए बस शांति , बस शादी हो जाए मजे की जिंदगी शुरू हो जाएगी , बच्चा आ जाए मजे की जिंदगी शुरू हो जाएगी, तुमने माना था जाना ना था । ये सारी मान्यताएं तुम्हारी बदलती गई वह मान्यता है तुम्हारे लिए धोखा हो गई, तुम जब सातवी में कक्षा में थे पढ़ते थे तब तुम्हारा मान्यता थी कि बस फिर फाइनल हो जाए फिर आराम, ये जरा कठिन पेपर है मास्टर जी जरा ऐसा है इसमें से गुजर जाऊं बस , तुम जब s s c में थे तब भी तुम्हारी मान्यता रही होगी बस इतना कोर्स पूरा हो जाए ये पेपर अच्छा जाए फिर तो बस आ हा,,,,6 तो अच्छे गए सातवाँ जरा कुछ हो जाए ठीक हो जाए आ हा,,,,,,पूरा बोझ था पूरा जीवन उसी ढाल में ढल गया था, मान्यता थी।
13:43 एसएससी पढे, BAपढ़े , B.Sc पढ़े जो कुछ पढ़े, उस समय जो तुम्हारी मान्यता थी कि इतना हो जाए तो शांति इतना हो जाए तो निराद, शादी हो जाए तो निराद, मकान हो जाए तो निराद, एलएलबी हो जाए तो निराद। ये सारे तुम्हारी मान्यताएं तुम अभी मन के चक्रराव में जी रहे हो जैसे और लोग मन के चक्कर में जीते हैं समाज के लोग, ऐसे हम लोग भी जी रहे हैं । वो बुद्ध पुरुष उस चक्रराव से पार हो जाते है | जो मानता है वह मरता है और जो जानता है वो तरता है । जो मानता है वो मरता है तो जानता है वह तरता है ।
14:33 मान लिया के सुख इसमें है, मान लिया की सुख उसमे है में है और सुख के पीछे दौड़ लगाए जा रहे हैं जीवन भर सुख को पकडते ओर हाथ में सुख आता ही नहीं । छुआ नहीं की गया नहीं ,,,,छुआ नहीं ,की गया नहीं उस सुख के साधनों के लिए प्रयास तो पूरा करते हैं और आ भी जाता है, थोड़ी देर के लिए सेल्फ हिप्नोटाइज हो जाते और हा हा हा हा मैं बहुत सुखी हूं | उतना एहसास लेते-लेते वह सुख चिंता में,भय में ,शोक में ,अथवा वियोग में बदल जाता है ।मैं कई बार कहां करता हूं
ईश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगाया तो अंत में तुम्हें रोना ही पड़ेगा।
15:24 भागवद में 12वे सकन्द में आता हैकि जो आदमी अद्वेत के विचार छोड़कर, है उद्धव द्वेत के विचार में बहेगा, जो किसकी निंदा या किसी की स्तुति का ख्याल करेगा, वह परमार्थ से तुरंत गिर जाएगा। किसी की अच्छाई या बुराई तोलने लगेगा, वह सत्य का घाट करके असत्य में गिरेगा। बुद्ध पुरुष जो है किसी की अच्छाई और बुराई तोलते नहीं लेकिन किसी की अच्छाई और बुराई मन की कल्पना समझकर उनके मन को मोडने के लिए नाटक किया करते है, अभिनव किया करते हैं | इसी प्रकार का अभिनव वह फ़क़ीर किया करते | मिल गया कोई टुकड़ाकागज का लाल रंगीन कोई जिलेटीन मिल गई, डाल दिया, मिल गया कोई पत्थर डाल दिया, लोग बोलते क्या करते हैं बोले महल बनाऊँगा, बगला बनाऊँगा उस पर मेरा झंडा लगाऊँगा, शादी करुगा,लाड़ी लाऊँगा बच्चो को जन्म दूँगा , बच्चे की शादी कराऊँगा , बच्चे का गोट पी थीडसफिर बहु आएगी मेरे बुढापे में सेवा करेगी, मेरे को खाँसी होगी तो वह मालपूए तल के दूध में डालकर मुझे चांदी के बर्तन में खिलाएगी। मैं थकुगा तो मेरा बेटा मेरे पैर दबाएगा, मुझे भूख लगेगी तो बहु मुझे खाना देगी , मेरे जीवन का अंतिम समय सुख से बीते इसलिए मैं यह सब महल की तैयारी कर रहा हूं , इस धन को इकट्ठा किये जा रहा हु, लोग बोलते थे महाराज तुम्हारी खिसक गई है, ….. उनको पता नहीं चलता की हमारी खिसकी हुई है हमें पता नहीं, और इनकी खिसकी नहीं तो इनकी खिसकी हुई हमें दिखती ।
17:07 फकीर हंस लेता, लोगों को पक्का हो जाता कि बिल्कुल खिसकी हुई है। फ़क़ीर चल लेता गठरी उठाकर, गठरी वोही जिसके चारो तरफ लिखा हुआ होता क्या लिखा हुआ होता,,,,,मेरा सर्वस्व, मेरी माया, मेरा संसार ,दुनिया क्या जाने । हर आदमी जीता है अपने को श्रेष्ठ मानता है अपने को कुशल मानता है दूसरे को समझता की क्या जाने ,,,,हिनके केडी खबरसिन्धी लाइन दुनिया क्या जाने, यह क्या जाने, यह क्या जाने किसी लड़के को शादी की तैयारी हो रही थी, तैयारी में बड़ा उत्सुक था, ,,,,,शिवलाल का परिचित था ,खूब दौड़ भाग की बड़े उत्साह से कमाया हुआ धन खर्च करने को राजी था ,शिवलाल ने धीरे से कहा कि देख भाई बहुत उत्साह से तो शादी करता है, लेकिन इसमें कोई सार नहीं सार बेटे में नही मैंने पैदा किया इसमे सार नही, मुजे पता है , सार भजन में लगे , बोले काका तमे की खबर वह छोकरा बोलता है काका तमे छू ख़बर काका अर्ध कलाक समझाता है की कोई सार नही अभी जो इतना उत्साह लेता है शादी शादी कोई सार नही है हमारा अनुभव है बोलता है काका तमे की खबर,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गुजराती लाईन है यहां
१८.३३ young person says life is full of joy but wise person says life is full of sorrow 18:36 जवान बोलते हैं जिंदगी मजा लेने के लिए लेकिन बूढ़े समझते जिंदगी में कोई सार नहीं | कोई सार नहीं कहे जा रहे हैं, फिर भी वही पोटका बढ़ाये भी तो जा रहे हैं| वही परिचय इसने क्या करा, उसने क्या करा , उसने क्या दिया, उसने क्या दिया ,उसने क्या खाया ,उसने क्या छोड़ा।
१८.५८ भागवत में आता है यदि तुमने लोगों की कृति देखी, यह अपनी स्तुति सुनी, यदि अपनी निंदा को सच्चा माना यदि अपने को देह माना ,यदि संसार को सच्चा माना, तो तुम्हारा खैर नहीं। संसार को यदि सच्चा मानोगे परमार्थ से गिर जाओगे, संसार सापेक्ष है, काल्पनिक है | जैसे जिसकी दृष्टि होती है जैसी श्रद्धा होती है, तो पत्थर में भी भगवान दिखता है और जब शराब और कबाब से बुद्धि मंद हो जाती है, तो भगवान जिनके हृदय में नाचता ऐसे संत भी तुमको ढोगी दिखेगे,बेवकूफ दिखेगे पागल दिखेगे।
19:35 संत कैसा है उस बात का ज्यादा विचार नहीं, भगवान की मूर्ति कैसी है उसे बात का ज्यादा विचार नहीं, पूजा करने वाला कैसा है, वही मूर्तियां थी जिसके आगे हज़ारो हजारों लोगों ने सिर झुकाया होगा, लेकिन मूर्ति बोली नही हसी नही ,लेकि गोरांग ने जब सर झुकाया तो मूर्ति खिलखिलाने लगी,वही मूर्ति होगी जो मीरा के आगे मुस्कराने लगी ,और भी तो लोग गए होंगे । मूर्ति तो वही की वही ,मीरा के पास जो मूर्ति थी कइयो ने देखी, होगी दुसरो को पत्थर की मूर्ति दिखी, मीरा को साक्षात कृष्ण दिखे , दुसरो को पत्थर की मूर्ति दिखी थी और गौरांग को साक्षात ठाकूर जी दिखे | 20:15 ऐसे बुद्ध पुरुष को दूसरा बुद्ध पुरुष दिख जाएगा ,मुर्खो को ज्ञानी भी आने जैसा अज्ञानी दिखेगा ,उसको ऐसा करना चाहिए, ऐसा नहीं करना चाहिए ,ऐसा है, ऐसा है, उन मुर्खो को समझाने के लिए संतो को महामूर्ख का पार्ट अदा करना पड़ता है । पार्ट अदा करना जैसे आप सम्राट बन गए रंगमंच पर ,आपको अहंकार नहीं आएगा ,सम्राट बनेगा का। आप दरिद्र बन गए तो आपको विशाद नही होगा, आप थोड़ी देर में स्त्री का पार्ट अदा करते हैं थोड़ी देर में पुरुष का पार्ट अदा करते फिर भी आप अपने को जानते हैं。20:53 ऐसी कोनसी क्षण है की आप चले गए ? आप स्त्री बने - तभी भी आप थे, पुरुष बने - तभी भी आप थे , रंक बने तब भी आप थे, आप राय बने तब भी आप थे, पटावाला बने तब भी आप थे और कारटून बने तभी भी थे। ऐसे ज्ञानी समझता है की अनेक रूपरुरुपाय, ॐ ॐ श्री राम,,,,,
ज्ञानी सबका कारना,निर्लेपी निजधाम,
अपने भीतर बालका रहता सदा अकाम।
21.32 वह ऐसा अकाम पुरुष था, अपने भीतर बालक था, जैसे बालक स्वाभाविक हंस लेता है ,स्वाभाविक गुनगुना लेता है ,ऐसे ही उस ज्ञानी की स्वभाविक चेष्टा है लेकिन लोगों की नजरों में कोई कुछ समाझता है,कोई कुछ समझता है, कोई कुछ समझता है।
22:00 जब ज्ञानी को ज्ञानी ने निहारा तब वह ज्ञानी अपना स्वभाव खोलकर कहता है कि इनको मत समझाओ, हद हो गई पूरी हो गई,अब हम न कहेगे कुछ हम न समझायेंगे। न रोष करेंगे ना ममता देंगे ना कुछ करेंगे बस तुम्हारे कर्म अब तुम्हारे पर है, हमने समझाना था समझा दिया, कहना था कह दिया, सुनाना था सुना दिया, रोकना था रोक दिया, छोडना था छोड़ दिया , जो कुछ करना था हमने प्रयास अपना कर दिया अब तुम्हारे कर्म तुम्हारे जवाबदारी पर है , श्री राम,,,,,,, अब तुम स्वत्रत हो,तुम चाहे गठरी अपनी बढ़ाओ, चाहे घटाओ , चाहे नई गठरी ले आओ, मर्जी तुम्हारी है,तुम पूरे स्वतंत्र हो हमने अब छेड़ा अपना छोड़ दिया ,बचाने का, रखने का ,संभालने का, उठाने का ,जय श्री राम….
सिंधी लाइन्स,,,,,,,,,,,,,,,
22.४९ अब हम इनको कुछ न कहेगे, क्योंकि हमने अपनी गठरी इकट्ठा करके दिखाया इनको , लेकिन इन्होंने तो हमारे को बेवकूफ समझा , अपनी बेवकूफी की तरफ कभी निहारा ही नही | श्री राम । इनको पता ही नहीं चला की हम क्या ले रहे हैं, हम किस रास्ते जाते हैं, किस ढ़ग से फ़क़ीर की तरफ निहारते है, हमको क्या उनसे लेना है , उनके पास क्या-क्या खजाना है, वह मेरे पास से जो खजाना था वह तो उन्होंने लिया नहीं लेकिन मैंने जो कूड़ा करकट इकट्ठा किया था इनको समझाने के लिए उसको इन्होंने मेरा देखा उसी का चिंतन किया।
२३.24 बुद्ध के पास तो आदमी गए, दोनी मित्र थे, लगोटिया यार । मित्र ने कहा की महाराज तुम्हारे पास हम दो मित्र आए हैं, एक दूसरे की फरियाद ले आए है, मुझे यह महसूस होता है की मेरा मित्र कहीं बिल्ली न बन जाए, क्योंकि सारा दिन बिल्ली को साथ रखता है , बिस्तर में भी बिल्ली , भोजन करे तब भी बिल्ली, दुकान जाए तब भी बिल्ली साथ मे , मिनी, मिनी, मिनी कार में बैठे तो भी मिनी रथ में बैठे तो भी मिनी मिनी साथ में, तो दूसरे जन्म में मिनी होगा की नहीं।
दूसरे मित्र ने कहा की महाराज मेरी भी सुन लीजिए , क्योंकि मेरी फरियाद करने जो आया है वह साथ मे कुत्ता रखता है, ओर सारा दिन मोती , मोती,मोती करके उसको पुचकारता रहता है सारा दिन मोती का चिंतन करता है । सारा दिन कुत्ते का चिंतन करता है, पलँग में भी कुत्ता सो जाता है इसके, भोजन के समय भी होता है और रथ में भी कुत्ते को ले जाता हैं , ये कुत्ता होगा कि नही?
24.24 अब बुद्ध ने कहा कि नही ये कुत्ता नही होगा, ये कुत्ते का चिंतन करता है, कुत्ते का चिंतन करता है, ऐसा चिंतन तू कर रहा है, तेरे मस्तिष्क में कुत्ता है और उसके मस्तिष्क में बिल्ली है तो वह बिल्ली होगा और तू कुत्ता होगा।
24.४४ ऐसे गुरु के मस्तिष्क में तो परमानंद है, ब्रह्म है | लेकिन हमारे मस्तिष्क में गुरु की कृति है , हम गुरु की कृति है तो तुम्हारे जीवन में विकृति होगी और गुरु की निष्ठा यदि तुम्हारे अंदर निष्ठा आ जाएंगीतो मेरा बेड़ा पार हो जाएगा। फ़क़ीर की कृति को देख रहे हैं, फकीर की वृत्ति को नहीं देख रहे हैं। ज्ञानी बालवत होता है, ज्ञानी का जीवन सहज होता है। हम लोगों का जीवन बोझिला होता है , हम लोग कृति में जीतें है और ज्ञानी वृति में जीते है।
25.21 कहते है मेरे स्वरूप का भली भांति ज्ञान हो गया है, उसकी वृत्तियां और इंद्रियां यदि समाहित है, यदि ध्यानस्त है, समाधी में है तो उसे उनसे लाभ क्या है और यदि वे विकसित रहती है तो उनसे हानी भी क्या है। आकाश में बादलों के छा जाने से अथवा बिखर जाने से सूर्य का क्या बनता या बिगड़ता है ? 25:54 यह श्लोक इसी प्रकार का श्लोक पंचदशी में आता है -
माया मेघो जगत निरम बर्शेते यथा तथा
महाकाशेती का हानि लाभमपी विद्यते |
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माया रूपी मेघ कैसे भी बरसो बादल बने तो सूर्य का क्या हुआ,बादल बिखरे तो सूर्य का क्या घाटा। बादल खूब बरसे तो आकाश में थोड़े कीचड़ होगी और बदल बरसे बिना बिखर गए तो भी आकाश में कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं होगी। जो शुध्द आकाश है वह ऐसे का ऐसा है। ऐसे ही जिसने माना नही जिसने जाना है, जिसने जानकर अपने स्वरूप में संसार की मिथ्यात्व को जान लिया है, अपनी चेतना को जान लिया है, वो बुद्ध पुरुष कभी तो सर पर गठरी ले के कर चले तो क्या ,राज करें तो क्या, नृत्य करें तो क्या , समाधि करें तो क्या, क्योंकि उसने एक बात हकीकत जान ली है कि सारा विनोद है , सारा खेल है, खेल में तुम सम्राट बने तो अहंकार नहीं आएगा तुम भिखारी बने तो संसार नहीं आएगा क्योंकि तुम्हारी वहां कृति नहीं है केवल वृति है। वहाँ तुम कृत्य को सत्य नही मानते हों। अभिनव करते हो तो कभी कृत्य को सत्य मानते हो ? कृति में और वृति में फेर है ,तुम्हारा जन्म तुम्हारे हाथ में नहीं है | ,तुम्हारा जन्म तुम्हारे करने से नहीं होता है , और मौत भी तुम नहीं करते हो , वह हो जाती हूं तो तुम्हारा आदि भी तुम्हारे हाथ में नहीं ,तुम्हारा अंत भी तुम्हारे हाथ में नहीं ,तो तुम्हारा मध्य तुम्हारे हाथ मे केसे।
क्या साँस तुम ले रहे हो तुम्हारी कोशिश से जी रहे हो तुम ??? नही तुम्हारे कोशिश की तो एक साँस ज्यादा लेकर दिखाना मौत के समय, नहीं होगा। तुम्हारी कोशिश से खून बह रहा है ? नही | तुम्हारी कोशिश से प्रयास से बाल बढ़ रहे है, नही तुम्हारे प्रयास से साँस चल रहे है नही, जी आदि भी है, अंत का मालिक है तो मध्य का मालिक भी वही तो हैं।

