सोमवार, 7 सितंबर 2026

ब्रह्मज्ञानी की ज्ञानमयी दृष्टि| Brahmagyani ki Gyanmayi Drishti| Part-1|

 


सत्संग के मुख्य अंश:

क्या हम अपने प्रयास से जी रहे हैं, क्या हमारा आदि-अंत अपने हाथ में है? 

अज्ञानी जरा-सी बात में सुखी-दु:खी होता है पर बुद्ध पुरुष अपने स्वरूप में स्थित होता है। 

अभी जो हमारी वृत्तियाँ हमें नचा रही हैं उसका 100 साल बाद कोई मूल्य नहीं है... काल की धारा सुख-दुख खा जाती है !

अपने स्वरूप को पहचानने के लिए इस प्रकार के विचार बड़े ही अनुकूल हैं। 

हमारे मोह पर जब चोट लगती है तब हम सुखी-दु:खी होते हैं और कर्म के बंधन को बनाते हैं। 

पद्मासन पर बैठकर यह उपाय करने से बड़ा सामर्थ्य प्राप्त होता है। 

जब तक हम अपने आप को नहीं जानते तब तक सबकुछ व्यर्थ है। 


मैन्युअल ट्रांसक्रिप्शन

        00:01 जिसको ठीक से समझने वाला व्यक्ति संसार के जन्म मरण के  चक्कर से छूट सकता है। ओर तो रामायण है, लेकिन योग वशिष्ठ को महारामायण कहा है ,और तो पुराण है लेकिन भागवत को महापुराण कहा हैं, और तो सब पुरुष है लेकिन इनको समझने वाला महापुरुष कहा गया है, और तो सब देव है लेकिन उसमें डुबे रहने वाले का नाम महादेव कहा गया है, शंकर भगवान को महादेव। 00:44


चित्त का एक स्वभाव, चित्त कि एक कमजोरी कहो , मनुष्य की एक कम नस भी कहो, जो छोड़ना है उसके पीछे जीवन बिताता है, और जो जीवन का सार है उसके लिए उसको समय नहीं मिलता। जिसको पाने के बाद कुछ पाना शेष नहीं रहता ,जिसको जानने के बाद कुछ जानना शेष नही रह जाता ,उसको पाना और जानना छोड़ कर जो जाना हुआ अनजाने में बदल जाता है पाया हुआ पराया हो जाता है ,उसके पीछे पूरा जीवन बर्बाद कर देता है, यह मनुष्य जीवन की कमनसीबी है। 01:36

  

        रहता था एक फकीर किसी गांव में लोग उसे पागल कहां करते थे, और ऐसे पुरुष करीब-करीब पागल जैसी होते हैं । जिन अर्थों में संसारी चतुर होते हैं जिन बातों में संसारी कुशल होते हैं उन बातों में वे संत पागल होते हैं, और जिन बातों में संत जगे होते हैं उन बातों की तो संसारियों को खबर भी नही होती । वो फ़क़ीर एक बोजका लिए घूमा करता था | कहि कोई बस्ती मिल जाए टोकरा रंगा हुआ लाल रंग का अंगूर खाकर लोग फेंक देते ऐसा कोई टुकड़ा मिल जाता कागज का,वो अपनी गठरी में डाल देता ,कहि चिकना चमाता पत्थर देख लेटा हूं अपनी गठरी में डाल देता,कहि गोल मटोल इट का रोड़ा देखता अपनी गठरी में डाल देता, रोज अपने गठरी में कुछ न कुछ डालता भर बाजार में। घूमता गठरी लेकर देखता कुछ पड़ा है कोई सुहावना पत्थर कोई सुहावना कागज उतरता गठरी जल्दी से भर देता की आआ आ हा हा क्या मेरी माया बड़ी । दिन दिन गठरी बढ़ती जाती थी मस्तक पर बोझ बढ़ता जाता था ,गर्दन टेढ़ी होने जा रही थी, लोग उसे समझाते थे कि बाबा तुम जरा सुधर जाओ, इस पागलपन से तुम जरा बाज आ जाओ , बोलता था क्या काहे का पागलपन, ऐसा करके छीनना चाहते हो मुझसे, लेना चाहते हो, यह मेरी माया है, गठरी पर लिखा रहता तो मेरी माया ,मेरा संसार, मेरी माया गठरी के एक तरफ लिखा रहता था दूसरे तरफ लिखा रहता मेरा संसार ,तीसरी तरफ लिखा था मेरा सर्वस्व ,चौथी तरफ से लिखा रहता दुनिया क्या जाने, लोगों को पक्का पक्का पागल लगता ,दुनिया क्या जाने पढ़ते थे माया, लोगों को हसी आती,मेरा संसार, हसी आती मेरा सर्वस्व लोग हँसते ओर चौथी बात दुनिया क्या जाने लोग उसे चिढ़ाते थे कोई पागल कहता ,कोई अलमस्त कहता,कोई मंजूर कहता, कोइ गधा कहता जैसी जिसकी दृष्टि होती वैसा कह लेते सोच लेते ,लेकिन उसका काम चालू ही रहा ।सुबह हो वो चादर को गठरी के रुप में बना देता सारा दिन ढोता फिरता रात को  कहीं रखता ,फिर सिरहाने रखता, उसको संभालता । दिन बीते ,सप्ताह बीते, महीने बीते। एक दिन उस गांव में कोई तत्ववेत्ता संत पसार हुए ,उसकी गठरी पर सुवाक्य लिखे थे पढ़े उन्होंने उसने, उसे बुद्ध पुरुष ज्ञानी पुरुष की नजर गई फकीर की आंखों में झाँका,उनको प्रणाम किया, लोगों को कहा की मूर्ख लोगो  उसको पागल मत कहो, मूर्ख लोगो इसको बेवकूफ मत कहो,ये तुम्हे उपदेश दिए जा रहा है । ये  गठरी में जो कंकर पत्थर और पत्ते कागज इकट्ठे करता है तुम्हें संदेश देता है, की तुम सारा दिन यही तो करते हो यही तो ढोते रहते हो बोझका का सफेद कागज सरकार के छपे कागज भी तो तुम इकट्ठा करते तिजोरी में रखते हो कल्पना 06:00 करते हो तो मेरा ये संसार, मैं ये महल बनाऊंगा मैं मकान लूंगा मैं यह दुकान लूंगा मैं यह शादी करूंगा मैं यह बारात निकलूंगा मैं यह करूंगा मैं वह करूंगा तुम्हारा भी अपना कूड़ा कर्कट के कल्पना का संसार है, ईट चुना बढ़ा दिया  की मेरा मकान हो गया, कंकर पत्थर का इकट्ठा करके अपने जीवन को धन्य मान रहे हो,अपने को सर्वस्व मान रहे हो,ये तुम्हे खबर देता है कि जिसे तुम सर्वस्व मान रहे हो वह कचरे का ठेर ही तो है,ये तुम्हारे साथ चलेगी भी नही ओर इसी के बोझ से तुम परेशान हो रहै हो,2 रोटी के टुकड़े खाने वो भी आराम से नही खा रहे हो,2 सांसे लेनी वो भी आराम से नही ले रहे हो कितने बोझीले जीवन से से गुजर रहे हो । 06:49


तब वह फकीर कहता है की महाराज चुप हो जाओ इन बेवकूफो को समझने से कुछ न होगा मैं पूरा जीवन इसी गांव में रहा कोई मिल जाए कोई जग जाए लेकिन कोई जगा नहीं | मेरे को सुनाने की कोशिश कर रहे हैं ,मेरे को अपनी तराजू में तोलने की कोशिश कर रहै है। मैंने सोचा की कोई आ जाए मेरे मेरे इस गठरी  के राज को समझ ले ताकि अपनी गठरी के बोझे वो ढोल सके ,लेकिन वो बोझा अपना वो नही फेकते मेरे को समजाते है कि फेक दे।


7.21 मेरा यह गठरी इनको बेवकूफी लगती है और स्वयं जो गठरी उठा कर भागे जा रहे हैं दिन रात, और परेशान भी है चिल्लाते भी हमें तो खुशी से विनोद मात्र उठाता हूं | मैं तो इनको समझने के लिए दिखाने के लिए जरा चेताने के लिए उठा रहा हूं और ये लोग तो सचमुच में उठा रहे हैं | मैं तो अभिनव मात्र कर रहा था, मैं तो विनोद मात्र कर रहा था, विनोद भी कर नहीं रहा था मेरे से विराट परमात्मा विनोद करवा रहा था, अभिनव करवा रहा था, लेकिन यह तो सचमुच में कर रहे हैं, उनके चेहरे पर देखो कहां है सहजता। इनके चेहरे में देखो, उनकी आंखों में झांको कहा है जीवन का संगीत। 07:58 इनके हिलचाल में झांको कहां है वह मस्ती, कहां है सहजता,कहा है वह निर्दोष बालक जैसा जीवन, महाराज इनको उपदेश देना व्यर्थ है इनके साथ बात करना व्यर्थ है,, मैंने पूरा जीवन खोया इनके पीछे लेकिन यह कल्पना के महल बाधते जाते हैं ।मेरा संसार सर्वस्व है, मेरा धन सर्वस्व है, मेरी इज्जत सर्वस्व है, अपनी कल्पनाओं की पोटली सर पर लिए भागे जा रहे हैं सारा दिन, और मैं भी इस बाजार में पिछले 32 साल से घूमता घुमा रहा हु महाराज ।


08:31 32 साल हो गए लेकिन कोई सत्य का खरीदार नहीं मिला। सब गठरियां बांध रहे है, बुद्ध पुरुषों के लिए बड़ी हैरानी है। बुद्ध पुरुष जो देना चाहते हैं वह तो हम नहीं लेते लेकिन हमारी वही शराबी हालत, वही जुआरी पने की हालत ,वही गंदी आदत है, हम छोड़ना नहीं चाहते, जब संत पुरुष बुद्ध पुरुष डांटते हैं तो हम कुछ का कुछ उनके लिए भी सोच लेते हैं उनके लिए भी कह लेते हैं कहला देते हैं  । |जय श्री राम ,,,,,,,,,,,,,,,,|


09:26 शास्त्र कहते है कि मूर्ख ह्रदय न चेत यद्यपि मिलाई गुरु विरंची सम | 

 

मूर्ख दिल जो है, वह फ़क़ीर कहता है, वह चेतसा नही है,ब्रह्माजी जैसा गुरु मिल जाये फिर भी भेस के आगे भागवत जेसी बात है । यह भागवत का श्लोक है, भगवान कृष्ण कहते हैं, भागवत का 11 स्कंद है अध्याय 28 वा श्लोक नंबर 25 वा ,,,,,,,,,,,,,, 09:50 जिसका चित समाजित हो गया, जिसने धारणा ध्यान द्वारा मेरे स्वरूप को पहचान लिया ,उसको कोई कर्तव्य नहीं है ,उसको कोई प्राप्तव्य  नही है,उसको कुछ खोना नहीं है उसको कुछ पाना नहीं फिर भी गठरी उठाये जा रहा है | उस फकीर को गठरी उठाकर संसार में घूमने से कुछ लाभ लेना नहीं था ,गठरी उठाने से उसका ज्ञान जा भी नहीं रहा था बाजार में घूमने से उसकी शांति भग भी नहीं हो रही थी ,गठरी उठाने से उसकी शांति भग भी नहीं हो रही थी | कंकड़ और पत्थर इकट्ठा करने से उसका मोह बढ़ भी नहीं रहा था, और कंकर पत्थर फेंकने से उसका मोह घटे, ऐसे अवस्था भी नही थी।

वह एक ऐसी जगह पर था की उसके लिए सारा का सारा व्यवस्था सब फेल हो गई । जिससे मेरे स्वरूप का भली भांति ज्ञान हो गया है उसकी वृति और इंद्रियां यदि समाहित रहती है तो, ऐसा बुद्ध पुरुष यदि एकांत में समाधि में बैठता है तो, और व्यवहार में आता है तो, उससे कोई लाभ और हानी नहीं होती क्योंकि उसने जान लिया। ओर अब आपने जान लिया 11:02 मैं कहता हूं तो मान लो यह गुलाब है मानोगे की नहीं ? मान लिया की यह गुलाब है, लेकिन तुमने यह जानकर माना है ।

लेकिन यह मान लो कि यह गुलाब है आप नहीं मानोगे क्योंकि आपकी जानकारी होती है गेंदा है, यह गुलाब है।

जानकर जो माना जाता है उसमें फिर भ्रांति नहीं होती है। केवल जैसे माना जाता है अंजान में जो माना जाता है वह बदल जाता है जान कर जो माना जाता है वह नही बदलता।

Sindhi line  आँख डीसी कन बुद्धि कड़े न विचार श्री राम,,,,

11:41 गांधी जी बोलते थे किसी सज्जन आदमी ,  दुष्ट आदमी को तुम अच्छा आदमी कहो तो तुम्हें पाप नहीं लगेगा, लेकिन किसी सज्जन आदमी को तुमने बुरा आदमी सोच लिया तो तुम्हारे ऊपर कर्मों का असर होगा | श्री राम ,,,,,,,,,,,

12:01 जानकर मानोगे तो बदलेगा नहीं लेकिन सुनकर मानोगे तो आपके विचार बदलेंगे । मान लो, मान लो यह दुनिया है, लेकिन ठीक से तुम यदि जानोगे फकीर को तो फिर तुम्हारे चित में परिवर्तन नहीं होगा। तुमने यदि किसी को गुरु मान लिया है ,तुमने यदि किसी को भगवान मान लिया है, तुमने यदि किसी को अच्छा मान लिया है, तो तुम्हारी वो मान्यता बदलती रहती है, क्योंकि मान्यता मन की होती है | मान्यता कल्पना सापेक्ष होती है ,जानकारी वस्तु सापेक्ष होती मान्यता कल्पना सापेक्ष होती है।

तुम्हारी कल्पना है, तुम  मानते थे s sc पास हो जाऊं सुखी हो जाऊंगा, तुम मानते थे कि बस यह एग्जाम निपट जाए तो आराम से जियूँगा, लेकिंन वो आराम नही रहा क्योंकि तुम्हारी मान्यता थी तुमने जाना नही था माना था। तुम मानते थे कि बस नोकरी मिल जाए आराम मिल जाये आराम , धंधा हो जाए बस शांति , बस शादी हो जाए मजे की जिंदगी शुरू हो जाएगी , बच्चा आ जाए मजे  की जिंदगी शुरू हो जाएगी, तुमने माना था जाना ना था । ये सारी मान्यताएं तुम्हारी बदलती गई वह मान्यता है तुम्हारे लिए धोखा हो गई, तुम जब सातवी में कक्षा में थे पढ़ते थे तब तुम्हारा मान्यता थी कि बस फिर फाइनल हो जाए फिर आराम, ये जरा कठिन पेपर है मास्टर जी जरा ऐसा है इसमें से गुजर जाऊं बस , तुम जब s s c में थे तब भी तुम्हारी मान्यता रही होगी बस इतना कोर्स पूरा हो जाए ये पेपर अच्छा जाए फिर तो बस आ हा,,,,6 तो अच्छे गए सातवाँ जरा कुछ हो जाए ठीक हो जाए आ हा,,,,,,पूरा बोझ था पूरा जीवन उसी ढाल में ढल गया था,  मान्यता थी।


13:43 एसएससी पढे, BAपढ़े , B.Sc पढ़े जो कुछ पढ़े, उस समय जो तुम्हारी मान्यता थी कि इतना हो जाए तो शांति इतना हो जाए तो निराद, शादी हो जाए तो निराद, मकान हो जाए तो निराद, एलएलबी हो जाए तो निराद। ये सारे तुम्हारी मान्यताएं तुम अभी मन के चक्रराव में जी रहे हो जैसे और लोग मन के चक्कर में जीते हैं समाज के लोग, ऐसे हम लोग भी जी रहे हैं । वो बुद्ध पुरुष उस चक्रराव से पार हो जाते है | जो मानता है वह मरता है और जो जानता है वो तरता है । जो मानता है वो मरता है तो जानता है वह तरता है ।

14:33 मान लिया के सुख इसमें है, मान लिया की सुख उसमे है में है और सुख के पीछे दौड़ लगाए जा रहे हैं जीवन भर सुख को पकडते ओर हाथ में सुख आता ही नहीं । छुआ नहीं की गया नहीं ,,,,छुआ नहीं ,की गया नहीं उस सुख के साधनों के लिए प्रयास तो पूरा करते हैं और आ भी जाता है, थोड़ी देर के लिए सेल्फ हिप्नोटाइज हो जाते और हा हा हा हा   मैं बहुत सुखी हूं | उतना एहसास लेते-लेते वह सुख चिंता में,भय में ,शोक में ,अथवा वियोग में बदल जाता है ।मैं कई बार कहां करता हूं 

ईश्वर के सिवाय कहीं भी मन लगाया तो अंत में तुम्हें रोना ही पड़ेगा।

15:24 भागवद में 12वे सकन्द में आता हैकि जो आदमी अद्वेत के विचार छोड़कर, है उद्धव द्वेत के विचार में बहेगा, जो किसकी निंदा या किसी की स्तुति का ख्याल करेगा, वह परमार्थ से तुरंत गिर जाएगा। किसी की अच्छाई या बुराई तोलने लगेगा, वह सत्य का घाट करके असत्य में गिरेगा। बुद्ध पुरुष जो है किसी की अच्छाई और बुराई तोलते नहीं लेकिन किसी की अच्छाई और बुराई मन की कल्पना समझकर उनके मन को मोडने के लिए नाटक किया करते है, अभिनव किया करते हैं | इसी प्रकार का अभिनव वह फ़क़ीर किया करते | मिल गया कोई टुकड़ाकागज का लाल रंगीन कोई जिलेटीन मिल गई, डाल दिया, मिल गया कोई पत्थर डाल दिया, लोग बोलते क्या करते हैं बोले महल बनाऊँगा, बगला बनाऊँगा उस पर मेरा झंडा लगाऊँगा, शादी करुगा,लाड़ी लाऊँगा बच्चो को जन्म दूँगा , बच्चे की शादी कराऊँगा , बच्चे का गोट पी थीडसफिर बहु आएगी मेरे बुढापे में सेवा करेगी, मेरे को खाँसी होगी तो वह मालपूए तल के दूध में डालकर मुझे चांदी के बर्तन में खिलाएगी। मैं थकुगा तो मेरा बेटा मेरे पैर दबाएगा, मुझे भूख लगेगी तो बहु मुझे खाना देगी , मेरे जीवन का अंतिम समय सुख से बीते इसलिए मैं यह सब महल की तैयारी कर रहा हूं , इस धन को इकट्ठा किये जा रहा हु, लोग बोलते थे महाराज तुम्हारी खिसक गई है, ….. उनको पता नहीं चलता की हमारी खिसकी हुई है हमें पता नहीं, और इनकी खिसकी नहीं तो इनकी खिसकी हुई हमें दिखती ।

17:07 फकीर हंस  लेता, लोगों को पक्का हो जाता कि बिल्कुल खिसकी हुई है। फ़क़ीर चल लेता गठरी उठाकर, गठरी वोही जिसके चारो तरफ लिखा हुआ होता क्या लिखा हुआ होता,,,,,मेरा सर्वस्व, मेरी माया, मेरा संसार ,दुनिया क्या जाने । हर आदमी जीता है अपने को श्रेष्ठ मानता है अपने को कुशल मानता है दूसरे को समझता की क्या जाने ,,,,हिनके केडी खबरसिन्धी लाइन दुनिया क्या जाने, यह क्या जाने, यह क्या जाने किसी लड़के को शादी की तैयारी हो रही थी, तैयारी में बड़ा उत्सुक था, ,,,,,शिवलाल का परिचित था ,खूब दौड़ भाग की बड़े उत्साह से कमाया हुआ धन खर्च करने को राजी था ,शिवलाल ने धीरे से कहा कि देख भाई बहुत उत्साह से तो शादी करता है, लेकिन इसमें कोई सार नहीं सार बेटे में नही मैंने पैदा किया इसमे सार नही, मुजे पता है , सार भजन में लगे , बोले काका तमे की खबर वह छोकरा बोलता है काका तमे छू ख़बर काका अर्ध कलाक समझाता है की कोई सार नही अभी जो इतना उत्साह लेता है शादी शादी कोई सार नही है हमारा अनुभव है बोलता है काका तमे की खबर,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,गुजराती लाईन है यहां



१८.३३ young person says life is full of joy  but wise person says life is full of sorrow   18:36 जवान बोलते हैं जिंदगी मजा लेने के लिए लेकिन बूढ़े समझते जिंदगी में कोई सार नहीं | कोई सार नहीं कहे जा रहे हैं, फिर भी वही पोटका बढ़ाये भी तो जा रहे हैं|   वही परिचय इसने क्या करा,  उसने क्या करा , उसने क्या दिया, उसने क्या दिया ,उसने क्या खाया ,उसने क्या छोड़ा।

१८.५८ भागवत में आता है यदि तुमने लोगों की कृति देखी, यह अपनी स्तुति सुनी, यदि अपनी निंदा को सच्चा माना यदि अपने को देह माना ,यदि संसार को सच्चा माना, तो तुम्हारा खैर नहीं। संसार को यदि सच्चा मानोगे परमार्थ से गिर जाओगे, संसार सापेक्ष है, काल्पनिक है | जैसे जिसकी दृष्टि होती है जैसी श्रद्धा होती है, तो पत्थर में भी भगवान दिखता है और जब शराब और कबाब से बुद्धि मंद हो जाती है, तो भगवान जिनके हृदय में नाचता ऐसे संत भी तुमको ढोगी दिखेगे,बेवकूफ दिखेगे पागल दिखेगे।


19:35 संत कैसा है उस बात का ज्यादा विचार नहीं, भगवान की मूर्ति कैसी है उसे बात का ज्यादा विचार नहीं, पूजा करने वाला कैसा है, वही मूर्तियां थी जिसके आगे हज़ारो हजारों लोगों ने सिर झुकाया होगा, लेकिन मूर्ति बोली नही हसी नही ,लेकि गोरांग ने जब सर झुकाया तो मूर्ति खिलखिलाने लगी,वही मूर्ति होगी जो मीरा के आगे मुस्कराने लगी ,और भी तो लोग गए होंगे । मूर्ति तो वही की वही ,मीरा के पास जो मूर्ति थी कइयो  ने देखी, होगी दुसरो को पत्थर की मूर्ति दिखी, मीरा को साक्षात कृष्ण दिखे , दुसरो को पत्थर की मूर्ति दिखी थी  और गौरांग को साक्षात ठाकूर जी दिखे | 20:15  ऐसे बुद्ध पुरुष को दूसरा बुद्ध पुरुष दिख जाएगा ,मुर्खो को ज्ञानी भी आने जैसा अज्ञानी दिखेगा ,उसको ऐसा करना चाहिए, ऐसा नहीं करना चाहिए ,ऐसा है, ऐसा है,  उन मुर्खो को समझाने के लिए संतो को महामूर्ख का पार्ट अदा करना पड़ता है । पार्ट अदा करना जैसे आप सम्राट बन गए रंगमंच पर ,आपको अहंकार नहीं आएगा ,सम्राट बनेगा का। आप दरिद्र बन गए तो आपको विशाद नही होगा, आप थोड़ी देर में स्त्री का पार्ट अदा करते हैं थोड़ी देर में पुरुष का पार्ट अदा करते फिर भी आप अपने को जानते हैं。20:53 ऐसी कोनसी क्षण है की आप चले गए ? आप स्त्री बने - तभी भी आप थे, पुरुष बने - तभी भी आप थे , रंक बने तब भी आप थे, आप राय बने तब भी आप थे, पटावाला बने तब भी आप थे और कारटून बने तभी भी थे। ऐसे ज्ञानी समझता है की अनेक रूपरुरुपाय, ॐ ॐ श्री राम,,,,,


ज्ञानी सबका कारना,निर्लेपी  निजधाम,

  अपने भीतर बालका रहता सदा अकाम।


21.32 वह ऐसा अकाम पुरुष था, अपने भीतर बालक था, जैसे बालक स्वाभाविक हंस लेता है ,स्वाभाविक गुनगुना लेता है ,ऐसे ही उस ज्ञानी की स्वभाविक चेष्टा है लेकिन लोगों की नजरों में कोई कुछ समाझता है,कोई कुछ समझता है, कोई कुछ समझता है।


22:00 जब ज्ञानी को ज्ञानी ने निहारा तब वह ज्ञानी अपना स्वभाव खोलकर कहता है कि इनको मत समझाओ, हद हो गई पूरी हो गई,अब हम न कहेगे कुछ हम न समझायेंगे। न रोष करेंगे ना ममता देंगे ना कुछ करेंगे बस तुम्हारे कर्म अब तुम्हारे पर है, हमने समझाना था समझा दिया, कहना था कह दिया, सुनाना था सुना दिया, रोकना था रोक दिया, छोडना था छोड़ दिया , जो कुछ करना था हमने प्रयास अपना कर दिया अब तुम्हारे कर्म तुम्हारे जवाबदारी पर है ,  श्री राम,,,,,,, अब तुम स्वत्रत हो,तुम चाहे गठरी अपनी बढ़ाओ, चाहे घटाओ , चाहे नई गठरी ले आओ, मर्जी तुम्हारी है,तुम पूरे स्वतंत्र हो हमने अब छेड़ा अपना छोड़ दिया ,बचाने का, रखने का ,संभालने का, उठाने का ,जय  श्री राम….

सिंधी लाइन्स,,,,,,,,,,,,,,,  

22.४९ अब हम इनको कुछ न कहेगे, क्योंकि हमने अपनी गठरी इकट्ठा करके दिखाया इनको , लेकिन इन्होंने तो हमारे को बेवकूफ समझा , अपनी बेवकूफी की तरफ कभी निहारा ही नही | श्री राम । इनको पता ही नहीं चला की हम क्या ले रहे हैं, हम किस रास्ते जाते हैं, किस ढ़ग से फ़क़ीर की तरफ निहारते है, हमको क्या उनसे लेना है , उनके पास क्या-क्या खजाना है, वह मेरे पास से जो खजाना था वह तो उन्होंने लिया नहीं लेकिन मैंने जो कूड़ा करकट इकट्ठा किया था इनको समझाने के लिए उसको इन्होंने मेरा देखा उसी का चिंतन किया।

२३.24 बुद्ध के पास तो आदमी गए, दोनी मित्र थे, लगोटिया यार । मित्र ने कहा की महाराज तुम्हारे पास हम दो मित्र आए हैं, एक दूसरे की फरियाद ले आए है, मुझे यह महसूस होता है की मेरा मित्र कहीं बिल्ली न बन जाए, क्योंकि सारा दिन बिल्ली को साथ रखता है , बिस्तर में भी बिल्ली , भोजन करे तब भी बिल्ली, दुकान जाए तब भी बिल्ली साथ मे , मिनी, मिनी, मिनी कार में बैठे तो भी मिनी रथ में बैठे तो भी मिनी मिनी साथ में, तो दूसरे जन्म में मिनी होगा की नहीं।

दूसरे मित्र ने कहा की महाराज मेरी भी सुन लीजिए , क्योंकि मेरी फरियाद करने जो आया है वह साथ मे कुत्ता रखता है, ओर सारा दिन मोती , मोती,मोती करके उसको पुचकारता रहता है सारा दिन मोती का चिंतन करता है । सारा दिन कुत्ते का चिंतन करता है, पलँग में भी कुत्ता सो जाता है इसके, भोजन के समय भी होता है और रथ में भी कुत्ते को ले जाता हैं , ये कुत्ता होगा कि नही?


24.24 अब बुद्ध ने कहा कि नही ये कुत्ता नही होगा, ये कुत्ते का चिंतन करता है, कुत्ते का चिंतन करता है, ऐसा चिंतन तू कर रहा है, तेरे मस्तिष्क में कुत्ता है और उसके मस्तिष्क में बिल्ली है तो वह बिल्ली होगा और तू कुत्ता होगा।


24.४४ ऐसे गुरु के मस्तिष्क में तो परमानंद है, ब्रह्म है | लेकिन हमारे मस्तिष्क में गुरु की कृति है , हम गुरु की कृति है तो तुम्हारे जीवन में विकृति होगी और गुरु की निष्ठा यदि तुम्हारे अंदर निष्ठा आ जाएंगीतो मेरा बेड़ा पार हो जाएगा। फ़क़ीर की कृति को देख रहे हैं, फकीर की वृत्ति को नहीं देख रहे हैं। ज्ञानी बालवत  होता है, ज्ञानी का जीवन सहज होता है। हम लोगों का जीवन बोझिला होता है , हम लोग कृति में जीतें है और ज्ञानी वृति में जीते है।

25.21 कहते है मेरे स्वरूप का भली भांति ज्ञान हो गया है, उसकी वृत्तियां और इंद्रियां यदि समाहित है, यदि ध्यानस्त है, समाधी में है तो उसे उनसे लाभ क्या है और यदि वे विकसित रहती है तो उनसे हानी भी क्या है। आकाश में बादलों के छा जाने से अथवा बिखर जाने से सूर्य का क्या बनता या बिगड़ता है ? 25:54 यह श्लोक इसी प्रकार का श्लोक पंचदशी में आता है - 

माया मेघो जगत निरम बर्शेते यथा तथा

महाकाशेती का हानि लाभमपी विद्यते |  

 `

  माया रूपी मेघ कैसे भी बरसो बादल बने तो सूर्य का क्या हुआ,बादल बिखरे तो सूर्य का क्या घाटा। बादल खूब बरसे तो आकाश में थोड़े कीचड़ होगी और बदल बरसे बिना बिखर गए तो भी आकाश में कोई विशेष प्रतिक्रिया नहीं होगी। जो शुध्द आकाश है वह ऐसे का ऐसा है। ऐसे ही जिसने माना नही जिसने जाना है, जिसने जानकर अपने स्वरूप में संसार की मिथ्यात्व को जान लिया है, अपनी चेतना को जान लिया है, वो बुद्ध पुरुष कभी तो सर पर गठरी ले के कर चले तो क्या ,राज करें तो क्या, नृत्य करें तो क्या , समाधि करें तो क्या, क्योंकि उसने एक बात हकीकत जान ली है कि सारा विनोद है , सारा खेल है, खेल में तुम सम्राट बने तो अहंकार नहीं आएगा तुम भिखारी बने तो संसार नहीं आएगा क्योंकि तुम्हारी वहां कृति नहीं है केवल वृति है। वहाँ तुम कृत्य को सत्य नही मानते हों। अभिनव करते हो तो कभी कृत्य को सत्य मानते हो ?  कृति में और वृति में फेर है ,तुम्हारा जन्म तुम्हारे हाथ में नहीं है | ,तुम्हारा जन्म तुम्हारे करने से नहीं होता है , और मौत भी तुम नहीं करते हो , वह हो जाती हूं तो तुम्हारा आदि भी तुम्हारे हाथ में नहीं ,तुम्हारा अंत भी तुम्हारे हाथ में नहीं ,तो तुम्हारा मध्य तुम्हारे हाथ मे केसे।

क्या साँस तुम ले रहे हो तुम्हारी कोशिश से जी रहे हो तुम ??? नही तुम्हारे कोशिश की तो एक साँस ज्यादा लेकर दिखाना मौत के समय, नहीं होगा। तुम्हारी कोशिश से खून बह रहा है ? नही |  तुम्हारी कोशिश से प्रयास से बाल बढ़ रहे है, नही तुम्हारे प्रयास से साँस चल रहे है नही, जी आदि भी है, अंत का मालिक है तो मध्य  का मालिक भी वही तो हैं।






शनिवार, 5 सितंबर 2026

महासत्संग (लापरवाही) 06-03-2026

 



        नारायण नारायण नारायण ओम। जो बात करते हैं उनका कान पकड़ के बाहर ले जाओ सिक्योरिटी वाले कमांडो जाओ जल्दी। सुबह सुबह शोर करते हैं आश्रम में रहने के लायक नहीं है। जो भी आवाज करे कान पकड़ के एकदम बाहर आश्रम के इधर नहीं वहां इधर थोड़ी कर रहे हैं। चाहे माई हो चाहे माई का बाप हो बेशरम लोग सुबह सुबह इधर शोर मचाने आए। वही खड़ा रहो पीछे जहां भी चिल्लाए कान पकड़ के तुरंत बाहर आश्रम के गेट के बाहर।

        चलते चलते बोलने से भी ऊर्जा बहुत नाश होती है। दिमाग कमजोर होता है।

        अभी आरती करने का समय नहीं हुआ। सब लोग आरती जलाए तब करो। मेरे को एक की एक बात कई बार कहनी पड़ती क्योंकि मूर्खों की तादाद ज्यादा है।

        राजा का संदेश वाहक फौजी उसके घोड़े की नाल की कील निकल गई थी। तो पुराने फौजी ने कहा तू संदेश वाहक है कील निकल गई कील लगवा दे। बोले हां लगा दो। दो पांच दिन बीते पूछा कील लगवा दी? बोले एक पाई की कील है। एक पैसे  होती थी। लगवा दो। फिर पांच सात दिन बीते पूछा लगवाई? अबे एक दो पाई के लिए कील लगाने में क्या आप इतना रोज रोज चिंता करते मैं लगवा दूंगा।

        कुछ दिन बीते राज्य को पड़ोसी दो राज्यों ने घेर लिया। राजा तक खबर पहुंची राजा ने सेनापतियों को व्यूह रचना का आदेश दिया और जो भी जरूरी बातें थी वो लिख कर संदेश वाहक को चिट्ठी दी बोले जा घोड़े को उड़ा। वो गया घोड़े को उड़ा उड़ा आया।

        घोड़ा दौड़ा तो कील जो एक निकली थी तो दूसरी ऐसे करते नाल निकल गई और घोड़ा धड़ाक से गिरा। सैनिक सिर के बल से गिरा चिट्ठी हाथ में पड़ी रही जिन्होंने घेरा था वो देखा कि राजा भाग गया क्या हुआ इनको तो संदेशा ही नहीं आता तो चलो आगे बढ़े और राजा के महल को घेर लिया जब राजा बंदी बन गया तो सेनापति क्या करेगा?

        कहावत हुई

    कील ना ठोका है घोड़ा गिरा, सैनिक लापरवाह नीच मरा, देश हारा,

        संदेश - लापरवाह आदमी नीचों का शिरोमणि है। नीचों को गिनते जाओ तो लापरवाह से बड़ा कोई नीच होता ही नहीं है।

        कील ना ठोकाई घोड़ा गिरा लापरवाह अभागा सैनिक मरा देश हारा

        आजकल लापरवाही सबके जीवन में घुस गई।अब ये व्हीलचेयर थी कल इसकी बैटरी डाउन हो गई। उसको बैटरी रिचार्ज करना था भूल गया लापरवाही तुम्हारे सामने उठ बैठ कर आई।

    आपने देखा? कहावत पक्की है जीभ तालू में लगाओ बहुत कुछ तुम्हारा व्यवहार बिगड़ता है लापरवाही से जीभ तालू में लगाओ मैं बोलता हूं उसको मन में रटो और अपने परिवार को लापरवाही की नीचता से ऊपर उठाओ।

        कील ना ठोकाई घोड़ा गिरा सैनिक मरा देश हरा ये बहुत पुरानी कहावत है। घोड़े के पैर में नाल में कील ना ठोकाई घोड़ा गिरा सैनिक मरा देश हारा

        मैं तो भूल गई मैं तो भूल गया मतलब ये लापरवाह नीच लोगों की बात है।

        इसीलिए उसको मैंने उठ बैठ कर आई तुम्हारे सामने उसकी कुछ और भी नालायकी थी तो मैंने निकाल दिया था। 

        भगवान राम के गुरुदेव बोलते थे वशिष्ठ मुनि हे विधाता मेरे ऐसे दिन कब आएंगे? उठूं तो सामने गाय दिखे पीछे देखूं तो गाय दिखे दाहे बाए देखूं तो गाय दिखे | ऐसी गौशाला में भी उसको मजा नहीं आया। माफीनामा भेजा ये वो फिर उसको बुलाया तो फिर वही अपनी दिखाई टोकेलेमें बोलना उसको असर नहीं करेगा यहां उसको अनुभव कराया नालायक को जाहिर करना पड़ता है कि सेवा में नालायक है।

        ऐसे ही एंपलीफायर का आवाज गाने वाले आवाज लापरवाही से रखते हैं तो उनको अभी खुलने में मैं टोकता हूं बोल बोल के तो थक गया। कुछ सुधार तो हो ही रहा है। सुन रहे हैं म्यूजिशियन वाले सुन रहे हैं लापरवाह

        मैंने रास्ता खोज लिया है जो लापरवाही किया और दो चार दिन में एक दो बार पकड़ा गया उसको घर भेज दूंगा। बड़े में बड़ी सजा है क्योंकि इधर ऐसे माहौल में रहे हुए हैं घर में तो आधा पौना किलो सब्जी में पूरा परिवार खाता है। यहां सब्जी खाते जो रहने वाले आधा किलो 400 ग्राम 500 ग्राम घर वाले तो एक दिन भी नहीं दे सकते बेचारे तो उनको घर भेजे तो एक ही कमरे में दो पांच रहते हैं कई जगह..यहां तो खुले में बड़ा हॉल है कोई कहीं कोई कहीं बड़े कमरे हैं दो दिन भी घर भेजो ना तो उनको पता चल जाता है क्या आश्रम की जिंदगी तो आश्रम की है। 15 दिन घर रहो सजा..एक महीना जाओ घर रहो उससे सुधार हुआ है.

        तो मेरी दयालुता का दुरुपयोग हुआ और अव्यवस्था..वर्षों तक एंपलीफायर संभालते हैं म्यूजिशियन संभालते हैं अभी भी मेरे को कहना पड़ता है तो मेरा कितना दुर्भाग्य है।

        अब मैंने अपना रुख बदला है। बोलते हैं दया धर्म का मूल है ये मैं जानता हूं। लेकिन दया डाकिन है ये भी मेरे को पता चलवा दिया लापरवाह कमीनों ने अनाधिकारी पर दया करना वो डाकिन है |

        कील ना ठोकाई तो देश कैसे हारा, लापरवाह नीच से अपने परिवार वालों को ये कथा सुनाना, लापरवाही छोड़ दे, चाहे खाना बनाने की लापरवाही हो चाहे झाड़ू की..राम कृष्ण परमहंस इतने भगवत ध्यान में मां के भाव में मस्त रहते कोई सोने की गिनिया भी रखता तो क्या करूं मैं, गंगा जी में फेंक देते |

        ध्यान समाधि से उठे आश्रम वासी सब्जी ले आया था क्या लाया है बोले बैंगन लाया हूं क्या भाव लाया बोले दो आने से हैं? डेढ़ आने से मिलता है तू दो आने कैसे लाया अच्छी तरह से उसको डांटा..झाड़ू लगाते लगाते कहीं कचरा रह गया अच्छी तरह डांट देते थे..

        लापरवाही जैसा दुर्गुण और कोई हो तो बताओ कील ना ठोकाई नालत है ऐसे लापरवाहों को सूरत आश्रम का सब्जी खरीदने में कोई गया हरी मिर्ची हम ₹2 ₹3 में खरीद लेते वो ₹50 में ₹70 में और ₹80 में खरीद के आया  आज सुबह उनसे पूछा सब उसको मैंने कहा आश्रम में रहने के लायक नहीं हो अपने घर चले जाओ आज सुबह की बात है 5:00 बजे की 5:30 की अच्छे पद वाला आदमी था मैंने कहा नहीं तुम जहां से आए वही जाओ दो चार पाच रपए में जो चीज मिलती है वो ₹50 ₹70 ₹80 खरीदे हरी मिर्ची ₹80 होती है क्या? ₹50 हरी मिर्ची होती है क्या?

        ₹2 ₹3 बहुत हो गया बोले फाफड़ा मिर्ची है र डेढ़ मिलते है, तो फाफड़ा मतलब फीकी फीकी मोटी मोटी 50 वाली बोले फाफड़ा मिर्ची है, तेरा मुंह काला, अभी उसका दिमाग चकरा रहा है। युवक नहीं है छोटा लड़का नहीं है तीन बच्चों का बाप है, वो भी इतना गलती करे तो आश्रम में कैसे रहेगा, कौन सा पद दे क्यों दे, धर्म की चीज का बिगाड़ करना, मेरी बिगाड़ हो तो मेरी जिम्मेदारी होती है। नारायण नारायण 

        अपना अपना जो पद है उसका अगर सही उपयोग नहीं किया तो आप उस पद के नालायक हो उस पद से हटाए जाओगे। ये कुदरत का नियम है। अगर मैं आध्यात्मिक रास्ते जाता हूं तो और मेरा पद चमकता है अगर मैं उस रास्ते के बहाने दूसरे रास्ते चलता हूं तो मेरे को खुद को भी संतुष्ट नहीं रहेगा लोगों को भी लोग आना ही बंद कर देंगे लोगों को फायदा नहीं होगा तो कैसे आएंगे?

        आज से 65 साल पहले 65 - 60 मैं डिसा में रहता था एकांत में ही रहता था साधना में लेकिन गुरु जी को लोगों ने प्रार्थना किया तो गुरु जी ने कहा थोड़ा बहुत सत्संग किया करो।

        डिसा के पास में किसी जगह पर मेरा सत्संग आयोजित हुआ जो भी वहां मैदान था वो भर गया उसमें एक साधु बैठा था आगे..मैं सत्संग करूं उसके आगे बड़ी उम्र का था वो इंतजार कर रहा था कि कब पूरा हो तो बाबा से मिलूं मेरे से आया अकेले में मिला

        मैं उस समय 23 -24 साल की उम्र का था वो होगा 70- 80 का 80 तो नहीं 65 से 75 के बीच का..रो पड़ा मैं क्या क्या बात है महाराज जी साधु वेश था बोले मैं आया तो लोग मानते थे बड़ा दुखड़ा रोया कभी कोई पूछता ही नहीं पूछता ही नहीं शब्द उसका नहीं है मेरे को बोलने में कोई शब्द अदल बदल हो जाता है। तो मैं सावधान तो रहता हूं लेकिन बोलने में होता है।

        मैंने उसके सामने देखा और उसका इतिहास उसको बता दिया। मैंने कहा तुम साधना करते थे एकाग्रता की साधना करते थे बोले हां..तो त्राटक से जो शक्ति पैदा हुई पानी को देख के देते थे लोगों को फायदा होता बहुत.. अभी नहीं होता है। मैंने कहा वो शक्ति खत्म हो गई। लोगों का काम नहीं होता। तो लोग क्यों आएंगे, क्यों पूछेंगे?

        उतना उसको नहीं बताया जो तुमको समझा रहा हूं। तो आप जिस ढंग से जिस पद का उपयोग करते हो पद तुम्हारे ही है। वही कीमत रखेगा। आपकी योग्यता नहीं है तो पद आपको पटक देगा। अभी मेरा कोई कार्यक्रम नहीं था। लेकिन आए होंगे और बिना मेरी उपस्थिति के थोड़े इधर थोड़े उधर गुड़गुड़ गुड़ करके प्रभात खराब कर रहे हैं।

        इसलिए मैं कहा हम जाए तो दुर्वचन कह दे बाद में मेरे को अपना नियम भी करना है आज जाना भी है। है ना खुशखबरी तालियां नहीं बजाते। बजा रहे हैं। जा रहा हूं तो तालियां बजा रहे हैं। खुशखबरी है। जान छूटी तुम्हारी। समझदारी है कि लापरवाही है?

                मूर्खों में हो कि अकल वालों में हो?

        कर ली तुम्हारी परीक्षा। मिल गया प्रमाण पत्र। आज जा रहा हूं खुशखबरी है ताली बजाओ खुशखबरी है। आज मैं जा रहा हूं ये खुशखबरी मान के ताली बजा दी। है कोई समझदारी से कोई है रिश्ता नाता? अकल से कोई है परिचय?

        अकल क्या होती है पता भी नहीं चल रहा है। ताली ठोकने वाले लगभग ऐसे ही होते हैं। बैठते भक्तों में साधकों के बीच में। पता ही नहीं ताली ठोकने से और कितना छूट जाता है कितना बिगड़ जाता है।

        work while you work play while you play , That is the way, to be happy

        वो रटे रटाए तो हो तुम लोग लेकिन अमल कौन करता है? अमल करे उसकी बलिहारी।

        चलो। नारायण हरि हरि ओम हरि। 19- 20- 21- 22 मोटेरा में शिविर भी दे दिया आज। अब ताली बजाने की है क्या जरूरत? मूर्ख लोग हैं खड़ा कर दो उनको बाहर भेज दो। ये तीन माईया,अभी-अभी तालियां बजाई। इनको बाहर भेजदो..

        बाहर अकल की दुश्मन बिन जरूरी ताली ठोकना जा के घर पे ठोको। अकल नाश करके इधर सर खपाने आती है। अब आपको भी ऐसे ही होगा। बिन जरूरी ताली ठोकी तो माइयो को हुआ ऐसा आपको होगा।

        मेरा स्वभाव इतना कड़क नहीं है। लेकिन आप लोग कृपा करके मजबूर कर देते हो। आई बात समझ में?

        किसके आगे परमात्मा की बात बोलूं? किसके आगे ध्यान भजन की बात करूं? इतनी अकल नहीं ताली नहीं ठोकना है तो ठोक रहे। किसके आगे बोलूं?

        मेरा समय बहुत कीमती है। मैं अकेले में बहुत काम कर लेता हूं। साक्षात्कार पार पुरुष बोलता है तो सामने होते उतने लोगों को ही फायदा होता है। वो भी ऐसों को नहीं जिनको निकाला ऐसे लोगों को फायदा नहीं होता। जो तत्परता से सुनते हैं उनको होता है। अकेले में बैठते तो ब्रह्म लोक तक के सत पात्रों को मदद मिलती है। क्या आप क्या समझते हो?

        कुछ बात समझ में आ रही है? आत्म साक्षात्कार पुरुष का समय कितना कीमती होता है कुछ दिमाग में आ रहा है?

        वो बोलते उतने लोगों को जो ग्रहण करता है फायदा होता है। उनकी दृष्टि पड़ती उनका फायदा होता है उनको। लेकिन एकांत में बैठते अपनी व्यापकता में ध्यानस्थ ये वो होते हैं। वो ध्यानस्थ में आंखें बंद ही करें वो कोई जरूरी नहीं।अविकंप योग होता है।

        आंखें बंद करके ध्यान समाधि लगी वो ध्यान योग है।

        खुल्ली आंख युद्ध में भी समाधि की मस्ती बंसी बज रही है,, उपदेश हो रहा है, और कृष्ण का समाधि है। इसको बोलते हैं अविकंप योग।उसका वर्णन भी है गीता में। तो हमारा रास्ता अविकंप योग का है। आई बात समझ में?

        आज डांट और गलतियां निकालना ये भी सत्संग है महा सत्संग है। मूर्खता निकालना भी महा सत्संग है। मूर्खता गई तो बुद्धिमत्ता है। लापरवाही गई तो समझदारी आई। हो गया ना सत्संग?

    अच्छा लगा कि ये जो डांटने वाला अच्छा नहीं लगा? बड़ा हितेषी है। खिल न ठुकाई..हां..

        आप बीमारी छोड़ दो तो स्वास्थ्य अपने आप हो जाता है। आप गलती छोड़ दो तो सही अपने आप हो जाएगा। हां अज्ञान छोड़ दो तो ज्ञान अपने आप होगा। अज्ञान छोड़ दिया तो क्या रहेगा?

        हे भगवान हमको मिलो ये करो वो करो। जल्दी हमारा कल्याण हो बापूजी ये कर दो। बापूजी जो बोल रहे वो करना नहीं है ऐसे ही सिर खपाते तो उनको मैं बस उनको सुना अनसुना करता हूं। वो मेरे नजर में ज्यादा वैल्यू वाले लोग नहीं होते। समझ गए? तभी काम चल रहा है।

        सभी की बात को ध्यान में सुनूं तो तुम्हारे लिए समय नहीं बचे। कई मूर्ख होते उनके भविष्य को तबाह होता हुआ देखता हूं तो उनको बोलता हूं फिर वो अपनी सफाई मारते में चुप हो जाता हूं। अच्छा अच्छा ठीक है जैसे तुमको ठीक लगे ऐसा करो।

        एक बार लक्ष्मण जी झाड़ियों में बड़े दुखद आवाज से रो रहे थे। सीता जी के कान पड़ी बात दौड़ के गई झाड़ियों में छुपे हुए देवर जी ऐसा रुदन..खूब प्रयत्न करके उनसे पूछ ही लिया इतना इतना क्या दुख हुआ? इतना क्या क्या पता क्या हुआ?

        बहुत मेहनत करके रोते रोते आवाज में लक्ष्मण ने कहा कि मैं अनाथ हो गया। कैसे? अनाथ कैसे? बोले मुझे मेरे स्वामी ने त्याग दिया। सीता समझ गई स्वामी तो इनके मेरे पति देव है। दौड़ी राम जी जहां थे लखन भैया बड़ा पीड़ित होकर आक्रांत कर रहे हैं। बहुत प्रयत्न किए बहुत बहुत मेरे को मश्कत करनी पड़ी तब बोले मैं अनाथ हो गया मेरे स्वामी ने मेरा त्याग कर दिया। राम जी को आश्चर्य हुआ।

        सीता को बोले हट दिखा मेरे को दीखा । पहुंच गए अनुज अमित बड़ा छोटा भैया राम का आवाज सुनकर छोटे भैया को शांत होना ही पड़ा।

        तुम्हारा मैंने त्याग कर दिया? मुझे तो स्मरण नहीं है। कब त्याग किया मेरे को स्मरण नहीं.. राम जी भी द्रवित हो गए। और ये बात करते मैं भी द्रवित हो रहा हूं। बात ही ऐसी है। लखन जैसा बहादुर रोए और व्याख्या सत्संग करना कोई मजाक की बात नहीं। कथाकार भले ठोकम् ठोक कर दे लेकिन सच्चे हृदय से करेंगे तो अपना चित्त द्रवित तो हो ही जाएगा।

        प्रभु मैंने पूछा कुटिया कहां बनाए? आपने कहा तेरे को ठीक लगे। मेरे को मन के हवाले छोड़ दिया मैं अनाथ हो गया। राम जी बोले लखन मेरी गलती है। गलती है अच्छा अच्छा बताता हूं। उसके बाद राम जी ने शायद कभी नहीं कहा होगा कि तेरे को ठीक लगे.

        कैसे सूझबूझ के धनी हो गए अपने देश में लखन की बुद्धि कितनी बढ़िया थी। और राम जी का कौशल्य कितना बढ़िया था। आज तो मां कोई हित का को बोलती है तो थोबड़ा चढ़ जाता है। कोई हितेषी हित की बात बोलती है तो मूड बदल जाता है। कहीं घसीट के तो उनके साथ तबाही के रास्ते चल पड़ते हैं। पार्टनरशिप करते हैं फलाना करते हैं तबाह हो गया फिर तो। है ना एक से एक बार अनुभव

        तो क्या कर होती है? तू लखन है क्या बापू है?

        जप करो ध्यान करो चुप बैठो शोर नहीं करो बस।

        कील न  ठुकाई अच्छा लगा कि ये जो डांटने वाला अच्छा नहीं लगा? 







अपनी महिमा में जागो p1

 






        थोड़ी सूक्ष्म बात समझ लेना। शरीर को सुखाकर पिंजर कर दे कोई। दिन रात तप करें। दिन रात उपवास करे। दिन रात संसार की खटपट में लगा रहे हो। फिर भी सब दुखों का अंत कभी नहीं होता। जब तक आत्मज्ञान आत्म तत्व को नहीं चिन्ह ।

जा लगी आत्म तत्व चीन्यो नहीं त्या लगी साधना सर्व झूठी।


        ०.41 कितनी संसार की मजदूरी करो, कितना ही तप करो। आत्मज्ञान के बिना तन सुखाए पिंजर कियो धरे रहन दिन ध्यान। तुलसी मिटे न वासना बिनाचारे ज्ञान उस ज्ञान का विचार करें और उसी ज्ञान का बार-बार ध्यान के द्वारा अनुभव करने का प्रयास करें तो आदमी जल्दी तर जाता है। जल्दी उस परमेश्वर का अनुभव करके मुक्त आत्मा हो जाता है। तृप्त आत्मा हो जाता है।

भगवत गीता के सातवें अध्याय में भगवान कहते हैं

भूमिरापो अनलो वायु कम मनो बुद्धिरेव च

अहंकार देवम में भिन्न प्रकृति अष्टधा

        ये अष्टधा प्रकृति से मैं भिन्न हूं | पांच भूत भूमि, आपो माना जल वायु, अनल माना अग्नि, खम माना आकाश, ये पांच भूत मन और बुद्धि, ये सूक्ष्म शरीर अहम, कारण शरीर स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर से मैं भिन्न हूं | जैसे फ्रिज से, पंखे से, हीटर से, पावर हाउस भिन्न है, विद्युत भिन्न है और इनमें विद्युत व्याप्त है। ऐसे ही अष्टधा प्रकृति में परमात्मा चेतना व्याप्त है। परमात्मा व्याप्त है फिर भी इनसे भिन्न है। जैसे पेड़ पौधों और जीव सृष्टि में सूर्य की सत्ता व्याप्त है। फिर भी सूर्य इनसे भिन्न है। जीवों के मरने से सूर्य मरता नहीं। अगर सूर्य इनसे अभिन्न होता तो जीव मरते तो सूर्य मरता। अगर यह भिन्न होते तो जी नहीं सकते। सूर्य से आप अगर अलग रहते तो आप जी नहीं सकते। आप सूर्य से जुड़े हैं। जय राम जी की।

        3.06 ऐसे ही यह पावर हाउस से पंखे और आपके इंस्ट्रूमेंट जुड़े हैं। फिर भी पावर हाउस की सत्ता इनसे इनको दे सत्ता मिलती है। इनके मरने मिटने से पावर हाउस का कुछ बनता बिगड़ता नहीं। ऐसे ये पांच भूत और भौतिक वस्तुएं बनने बिगड़ने से भी तुम्हारे चैतन्य आत्मा का कुछ बनता बिगड़ता नहीं।

भगवान की दो प्रकार की प्रकृति

अपर नित्यम अन्य प्रकृति विधि में परम जीव भूता महाभाव धारते जगत

        पृथ्वी जल तेज वायु आकाश ये पंच महाभूत और मन बुद्धि तथा अहंकार ये आठ प्रकार के भेदों वाली मेरी अपरा प्रकृति है। हे महाबाहु इस अपरा प्रकृति से भिन्न मेरी जीव रूपा परा प्रकृति भी है | जिसके द्वारा यह जगत धारण किया जाता है। आकृति को लेकर रचना आदि ये जीव भूता प्रकृति परा प्रकृति, और अपरा प्रकृति ये अपरा प्रकृति है। आकृति को लेकर रचना तक काम करने वाली अपरा प्रकृति है और अपना जीव अंश यह परा प्रकृति है। निकृष्ट और जड़ परिवर्तनशील परा प्रकृति और श्रेष्ठ चेतन और अपरिवर्तनशील अपरा प्रकृति है।

        ध्यान देना तात्विक बात है। जिसको परमात्मा से भिन्न नहीं परमात्मा स्वरूप में एक स्वरूप है। वह परा प्रकृति है। और जो बदलती है परमात्मा की प्रकृति वो अपरा प्रकृति है। तो यह शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार यह अपरा प्रकृति है। और जीवात्मा का अनुभव कराने वाली भगवान की परा प्रकृति है | और भगवान भी आपके साथ आपका आत्मा होकर बैठा है। खूब ध्यान देना बहुत सुखदाई बहुत कल्याणकारी ये बात है भगवान की।०५.43

भूमि रापो अनलो वायु खम मनो बुद्धि रेवच

अहंकार इव में भिन्ना प्रकृति अष्टधा

        5.५५ ये मेरे से अष्टधा प्रकृति भिन्न है। जैसे भगवान से अष्टधा प्रकृति भिन्न है और फिर भी भगवान की सत्ता से चल रही है। पावर हाउस से तुम्हारे इंस्ट्रूमेंट पंखा, फ्रिज, कूलर, गीजर भिन्न है। फिर भी उससे जुड़े हैं। इन इंस्ट्रूमेंटों के मरने मिटने से पावर हाउस का कुछ बनता बिगड़ता नहीं। ऐसे तुम्हारा पंच भौतिक शरीर मन बुद्धि और अहंकार के बदलने से मरने मिटने से तुम्हारे आत्मा का तुम्हारा स्व का कुछ बनता बिगड़ता नहीं है। फिर भी जरा सा शरीर में कुछ होता है तो हाय रे मैं मर गया। कुछ मिला तो हाय मेरी जिंदगी खुशहाल हो गई। यह भ्रांति क्यों होती? कि उस चैतन्य को जीव भाव में लाने वाली जो भगवान की परा प्रकृति, है तो चैतन्य शुद्ध बुद्ध असंग आत्मा उनको इन शरीर मन बुद्धि के साथ संगी बना देती है | वो भगवान की जीव भूता प्रकृति परा प्रकृति अब वो परा प्रकृति है तो श्रेष्ठ स्वभाव अपना चैतन्य आत्मा लेकिन वह चैतन्य आत्मा को लीला करके प्रकृति, प्रकृति और पुरुष आपस में अभिन्न है | जैसे पुरुष और पुरुष की शक्ति अभिन्न है। दूध और दूध की सफेदी अभिन्न है। जैसे तेल और उसकी चिकनाहट अभिन्न है। ऐसे पुरुष और पुरुष की प्रकृति परमात्मा और परमात्मा की प्रकृति अभिन्न है। जैसे सूर्य और सूर्य के किरण अभिन्न होते हुए भी किरण मर जाते हैं। बदल जाते हैं सूर्य अपनी महिमा में। ऐसे ही भगवान की प्रकृति बदलती है। खेल दिखाती है लेकिन भगवान की सत्ता के बिना नहीं दिखा सकती और प्रकृति के बिना भगवान की सत्ता का खेल दिख नहीं सकता। लकड़ी में आग छुपी है। फिर भी वह ठंडक नहीं हटा सकती। अंधेरा नहीं मिटा सकती। लकड़ी की छुपी हुई आग को जगाना पड़ता है। ऐसे भगवान की सत्ता को दिखाने के लिए भगवान की प्रकृति है। पावर हाउस से आने वाली वायरों में विद्युत होती है। दिखती नहीं है। बल्ब आदि से वह दिखती है। और काम में आती है। ऐसे ही भगवान की सत्ता ओतप्रोत है। तो जो जीव भूता प्रकृति है अपरा तो निष्कृष्ट है लेकिन परा प्रकृति श्रेष्ठ है। चेतन जो अपरिवर्तनशील आत्मा है वह परा प्रकृति है।

        तो तुम देखो शरीर बदल गया, बचपन बदल गया। किशोरावस्था बदल गई, जवानी बदल गई, बुढ़ापा बदल गया, मौत आई। ऐसे कई बार यह प्रकृति के शरीर बदले, मन बदला, बुद्धि बदली, चित्त बदला, अहंता बदली, फिर भी कोई अबद बैठा है। जो अदल बैठा है वो जीवात्मा होकर बैठा है। उसका असली स्वरूप परमात्मा से अभिन्न है। लेकिन अज्ञानवश वो इस शरीर को मैं मेरा मानता है इसलिए जन्म मरण के चक्कर में जाता है। अपने को कर्ता मानेगा तो विहित कर्म करना चाहिए जिससे सुख मिले। अपने को कर्ता माने तो अच्छे कर्म करना चाहिए ताकि फल अच्छा मिले। लेकिन अपने को भगवान का माने तो जिज्ञासा होगी। भगवान कौन है? मैं कौन हूं? भगवान कहां है? और मैं कैसे उसको मिलूं? इस प्रकार की जिज्ञासा की पूर्ति करने में भगवान की परा प्रकृति मदद करती है। अच्छे विचार और बुरे विचार। ऐसे अपरा प्रकृति और परा प्रकृति। आप जब इस भोग को चाहते हो संसार का ऐश आराम और मजा चाहते हो तो अपरा प्रकृति में उलझ जाता है आदमी लेकिन जब आप संसार के ऐश आराम मजे नश्वर समझकर सच्चा सुख चाहते हो तो परा प्रकृति आपको मदद करती है। जब परा प्रकृति मदद करती है तो परमेश्वर का सुख मिलता है। परमेश्वर का ज्ञान मिलता है। परमेश्वर का अनुभव हो जाता है। फिर यह जीवात्मा समझता है कि मैं परमेश्वर से जुदा नहीं था। परमेश्वर मेरे से जुदा नहीं था। आज तक जिसको खोजता फिरता था वही मेरा आत्मा था। ११.20

बंदगी का था कसूर बंदा मुझे बना दिया। मैं खुद से था बेखबर तभी तो सिर झुका दिया।

वो थे ना मुझसे दूर ना मैं उनसे दूर था। आता ना था नजर तो नजर का कसूर था।




        ११.३५ नजर बदली तो नहीं जा रहे बदल गए। वो नजर थी जो अपरा प्रकृति की चीजों में उलझ रहे थे तो लगता था यह मिले तो सुखी हो जाऊं ये भोगू तो सुखी हो जा ये करूं तो ऐसे करते करते सुख के पीछे मर मिटे | मामा घर के दी बड़े इटले मामा घर के द बड़े इटले अब इतना हो जाए तो प्रॉब्लम सॉल्व इतना हो जाए तो प्रॉब्लम सॉल्व और प्रॉब्लम सॉल्व सॉल्व सॉल्व होते ही लाइफ सॉल्व हो गई | प्रॉब्लम तो बने रहे | तो अपरा प्रकृति में रहकर कोई पूरा सुखी हो जाए या पूरे प्रॉब्लम उसके सॉल्व हो जाए यह संभव ही नहीं है। परा प्रकृति में आ जाए |

        12.22 एक अविद्या है। दूसरी विद्या | अविद्या अविद्यमान वस्तुओं में सतबुद्धि करके जीव को भटकाती है। खिलौनों के जैसे खिलौनों के आम, खिलौनों के चॉकलेट, मिट्टी के खिलौने, मिट्टी का सीताफल, मिट्टी का लॉलीपॉप वो चाटने से बालक को वो रस नहीं आता। असली चाटने से रस आता है तो एक नकली खिलौने और नकली फल फ्रूट होता है। हम एक जगह पर गए बहुत आग्रह किया उन्होंने बापूजी भोजन यहीं करोगे। हमने उनको कह दिया कि तुम्हारे यहां हम आएंगे और थोड़ा सा फल और दूध ले लेंगे। उन्होंने व्यवस्था किया अबेजमेंट में हमारा एक हॉल था नीचे मैंने कहा अभी ये कब लाएंगे ये सामने फ्रूट पड़ा है उसमें से एक सेब ले लेता हूं और एक केला ले लेता हूं, और दूध लाएंगे तब पी लेंगे ये कब तक लाएंगे कब तक सुधारेंगे सवारेंगे वो दूर से लग रहा था कि ये टोकरे में जो पड़े हैं फल बिल्कुल ताजे और इतने बढ़िया है नजदीक गया तो देखा है तेरे ये तो आर्टिफिशियल है |

        13.38 तो आर्टिफिशियल असली से भी कभी-कभी अच्छे लगते हैं। ऐसे ही एक असली सुख है अंतरात्मा में और बाहर ये सब आर्टिफिशियल और आर्टिफिशियल असली से तब तक अच्छा लगता है जब तक आर्टिफिशियल को आर्टिफिशियल नहीं जाना। नकली को नकली नहीं जाना तब तक नकली अच्छा लगता है। ऐसे तो नकली को नकली तब जानेंगे जब असली का स्वाद कोई चखा दे संत फकीर कोई चखा दे भगवान की रहमत

        14.०९ जब असली स्वाद जरा आता है। परा प्रकृति की कृपा प्रसादी जब मिलती है अंतरात्मा का अपने स्वाभाविक सहज स्वभाव सुख

शंकर सहज स्वरूप संभारा लागी समाधि अखंड अपारा


            14.22 अपना सहज स्वाभाविक आत्म स्वरूप की जब स्मृति आ जाए उसी में विश्रांति मिले तो ये बाहर की तू तू मैं मैं ये करना ये भोगना ये पाना ये सब फीका हो जाता है। असली को ठीक से जानो तो नकली के आकर्षण से पिंड छूट जाता है। ऐसे असली सुख को थोड़ा सा ले ले तो फिर नकली विकारों का सुख का प्रभाव टूट जाता है। फिर विकारी सुखों में जीवात्मा रहता हुआ दिखता है। जनक राज्य करते हुए दिखते हैं। वशिष्ठ महाराज आश्रम चलाते हुए दिखते हैं। सब व्यवस्थित काम करते हुए दिखते हैं। लेकिन अपने आप में बैठे हैं।

उठत बैठत ओई उठाने कहत कबीरम उसी ठिकाने

        १५.06 और ऐसे महापुरुष गजब की चाल चलते है। किस पामर व्यक्ति को किस ढंग से उठाया जाए, वह महापुरुषों की असली सुख के अनुभूति में ऐसी विलक्षण बुद्धि काम करती है। असली सुख लेने से बुद्धि भी असली ढंग से व्यवहार करने लग जाती है।

        १५.32 कबीर जी के आय का कोई पक्का स्रोत नहीं था। खाना बुनते कपड़ा बनाते कभी सत्संग में समय चला जाता। कम बनता कपड़ा नहीं बनता। कभी रोजी रोटी तक का बन जाता। जो आए वह भोजन करके जाए। परा प्रकृति में रुचि हो जाती है और अपने परा स्वभाव को जान लेते हैं। वो सबके हित में ही आनंद का अनुभव करते हैं। आपका महापुरुषत्व कब से जगा? आप महान आत्मा या श्रेष्ठ पुरुष कब बने? कि जब दूसरों का दुख आपको अपना लगे। दूसरों का दुख मिटाकर आपको आनंद आने लग जाए। तो समझो आप महानता के तरफ परा प्रकृति के तरफ आए | दूसरों की खुशियों में और उन्नति में आपको आनंद आए तो समझ लो कि आप परा प्रकृति के राज्य में प्रवेश कर चुके आप कब जगे

जाने जीव तब जागा हरि पद रुचि

उस परा प्रकृति के स्वभाव में रुचि

विषय विलास विरागा

        तुच्छ प्रकृति से बचा और असली प्रकृति में रुचि हुई कबीर जी ऐसे महापुरुष थे | तो जो आए सत्संगी गए भैया जरा भोजन करके जाइए | तो आटा दाल तो समाप्त रहता था, घर में कुछ आ गए भगत हो गए कोई साधु संत जाकर धीरे से लोई को कहा कि रोटी बनाना है साधु लोग आए, कुछ भगत भी हैं | मुझे पता है घर में आटा नहीं है, दाल नहीं है, कुछ भी नहीं है। मुझे पता है। और उधार मांग मांग कर सारे बाजार के लोगों को हम लोगों ने इमली खाता हुआ कर दिया है। तो हम जाएंगे और मिलेगा नहीं उधार , यह भी मैं जानता हूं। फिर भी तू जा। शायद मुझे नहीं मिलता तो तुझे मिल सकता हूं। किसी न किसी दुकानदार को उधार देने के लिए राजी करके आना , ले आना सामान | लोई गई दुकानदारों ने तो मुंह सुकड़ लिया, लेकिन लोई जाकर खड़ी दुकानदार ने कहा एक शर्त है तुम्हें आटा दाल जितना चाहिए उतना तो मैं दे दूंगा | लेकिन शर्त एक है कि रात को मेरे बिस्तर पर आकर सोने का आप वचन देगी तब, लोई माता जानती थी कबीर की महिमा महिमा | उसने वचन दे दिया अच्छी बात है आ जाऊंगी तेरे बिस्तर पर भैया अभी तो दे दे | भैया तो मैं गलती से बोला उन्होंने कैसे भी बोला होगा भगवान जाने | तो माताजी थी भैया बोले चाहे ना बोले उसकी नजर में तो सब …| शब्द वहां काम नहीं करते |

        आटा दाल ले आए भक्तों को और संतों को भोजन बनाकर खिला दिया। शाम को कबीर जी को कहा कि आपने कहा था कि कैसे भी करके आटा दाल ले आओ। कोई दे नहीं रहे थे। एक दुकानदार राजी हो गया। उसने दे दिया। इस बात पर राजी हुआ कि रात को तुम मेरे बिस्तर पर रहोगी और मैं हां बोल के आई हूँ। अब आप ही बताओ क्या किया जाए कबीर जी ने कहा बस वचन दिया तो पूरा करना चाहिए | चलो ! मैं तुम्हें लिए चलता हूं | कैसे गजब के महापुरुष बरसात है तूफान चल रहा है | बोले कोई बात नहीं वचन दिया है | सुबह तक बरसात चलेगी तो कंबल ओढ़ ले हल्की सी बूंदा बांधिए कीचड़ में पैर खराब हो जाएंगे, मेरे कंधे पर ही बैठ | कबीर जी उनको कंधे पर बिठाकर….| वो दुकानदार बड़ा खुश हुआ कि ऐसे बरसात में भी तुमने वचन पूरा किया, शाबाश है | लेकिन तुम भीगी नहीं और तुम्हारे पैर कोई खरोच भी नहीं, कीचड़ की बरसात के पानी की ये कैसे लोई ने | बताया कि मैंने आपको वचन दिया था और मेरे पति पतिदेव को मैंने बताया कि समय हो गया वचन दिया तो मुझे कंधे पर उठा के ले आए | इसलिए पैर नहीं भीगे कंबल ओढ़ाए इसलिए शरीर नहीं भीगा | वचन दिया था आपको | लेकिन मुंह पर जो शांति और निर्दोषता थी प्रकृति का तेज था अपरा नहीं परा प्रकृति का तेज था, उस तेज ने विकारी दुकानदार के चित्त जो अपरा आकर्षण निष्कृष्ट प्रकृति का था उस पर अच्छी प्रकृति का प्रभाव पड़ा। तो वो कबीर जी तुम्हें छोड़ के चले गए? बोले नहीं अंधेरी रात है। बरसात का मौसम है। मेरे को छोड़कर दरवाजे के नजदीक आप बाहर खड़े हैं। मेरे इंतजार में मैंने आपको वचन दिया था। श्रेष्ठ प्रकृति का प्रभाव निष्कृष्ट प्रकृति पर पड़ा। दुकानदार के चित्त में भीतर ही भीतर श्रेष्ठ प्रकृति ने नहाल बरसाई। कबीर जी आपको उठाकर लाए। मैं कैसा पापी, मैं कैसा अभागा के तुम्हारे जैसे पवित्र आत्माओं के प्रति भी। मैंने यह दुष्ट मांग रखी और आप वचन निभाने के लिए चले आए और कबीर जी आपको उठा लिया। हद हो गई मैं कौन से नरक में भुगतंगा? मेरे कर्म कैसे कटेंगे? चरणों पर सिर धर दिया। मां मुझे माफ करो। निष्कृत प्रकृति पर श्रेष्ठ प्रकृति का प्रभाव पड़ा।व माँ चलो कबीर जी के चरणों में प्रणाम किया, फूट फूट कर रोया आगे चलके वो कबीर के श्रेष्ठ भक्तों में से एक बन गया | महापुरुषों की गजब की महिमा गजब की लीला गजब की चाल होती है |

        22.०५ निष्कृष्ट प्रकृति में जीने वाले जंतु जैसे स्वभाव के लोगों को श्रेष्ठ परमात्मा स्वभाव में जगाने की उनकी अपनी अलौकिक चाल …| गुरु अर्जुन देव के पास रागी आते हैं। म्यूजिक पार्टी अपन कहते हैं म्यूजिक बजाने वाले | और म्यूजिक बजाने वालों के नाम उन दिनों में लोग कहते थे। मिरासी आप म्यूजिक म्यूजिक बजाने वाले को अपन आर्टिस्ट बोल देते | मीरासी, मीरासि दो व्यक्ति थे उनके घर में कोई शादी थी एक का नाम था सत्ता दूसरे का नाम था बलबड़ा उन्होंने गुरु अर्जुन देव को कहा कि हां मेरे रुपयों की जरूरत है | हमारे घर शादी है | गुरु जी ने उस जमाने में दो तीनसो तिनसो रूपए दिलाने का आश्वासन दे दिया बोले | आपके इतने सारे सेवक हैं एक एक टक्का भी एक एक शिष्य से मिल जाएगा तो हमारे हजारों रुपए हो जाएंगे | ये दो तिनसो आपके नहीं चाहिए आपके शिष्यों के पास से एक एक टक्का मिल जाए टक्का माना आज के तीन पैसे लेकिन वो जमाने में टक्का बड़ा महत्व रखता था। टक्के में जो चीज मिलती थी वो अभी 200 पैसे में भी नहीं मिलेगी। 500 पैसे में भी नहीं मिलेगी। आज से करीब पौने पांच सो वर्ष पहले टक्का भी बड़ा मान मूल्यवान है। एक पैसे में तो भरपेट रोटी खा लेते लोग । धोखा ले लेंगे। एक एक टक्का आपके सेवक से दिला दो। अर्जुन देव ने कहा ठीक है। आते गए, राग गाते गए, अर्जुन देव के सामने रोज खड़े हो जा के गुरु जी सब सेवकों से आपके तो मुल्तान तक के फैले हुए हैं सेवक टक्का टक्का दिलाने की व्यवस्था करो , शिष्यों से ही लेंगे दूसरों से नहीं लेंगे | गुरु ने साधे चार टक्के धर दिए उनके हथेली पर, बोले इतना ही मिल पाएगा। ये कैसे? बोले एक तो शिष्य हैं। सच्चे शिष्य उस परमेश्वर के अकाल पुरुष के नानक देव दूसरे अंगद। अमरदास तीसरे और रामदास चौथे और मैं आधा शिष्य हूं तो आधा टक्का मेरा रहा। आधा ही उस ब्रह्म को समर्पित हुआ हूं। वे तो पूरे के पूरे शिष्य थे। पूरे के पूरे अपने जीव भाव को ब्रह्म में मिला चुके थे। वो पूरे शिष्य थे। पूरा प्रभु आराध्या पूरा जहां का नाम पूरा पाई पूरे के गुणगान अपने पूर्ण महिमा में। जैसे बिंदु पूरा का पूरा मिल गया सिंधु में। तो ये तो चार पूरे के पूरे थे। मैं हूं आधा। तो वो चार शिष्य और आधा में साढ़े चार टक्के ले जाओ। वो साढ़े चार टक्के धर के वहां और चल दिए। बोले अब देखो क्या होता है। जय राम जी के।



        जो निकट के होते हैं, क्लोज होते हैं, वे भी कभी-कभी ऐसे खतरनाक गद्दार होते हैं कि उससे दूर वाले अच्छे। उन्होंने निंदा करना चालू कर दिया। अर्जुन देव ने संदेशा भेजा कि आप आओ, कीर्तन करो, भजन करो, संगत को उल्सित आनंदित करो, नहीं आएंगे | दूसरी बार आदमी भेजा बोले हम नहीं आएंगे | तीसरी बार भेजा बोले क्या रोज रोज आदमी भेजते हमारे बिना तुम्हारा आश्रम कैसे चलता है वो अब देखेंगे | ये तो तुम्हारे गुरु नानक को भी हमारी कौम का हमारे आदमी बाला मर्दाना ने चमकाया था नहीं तो तुम्हारे गुरुओं की कौन चिकनी लेता है बाबा कौन पूछ तो हमें वारी प्रशंसा करी इट तुमने रोटला मोटा आया हां ये निष्कृष्ट प्रकृति का स्वभाव | हमारे कारण ही तो तुम गुरु हो के पूजे जा रहे हो, अब देखो क्या होता है सरल स्वभाव अर्जुन देव खुद चले गए कि भाई जो हुआ सो हुआ तुमने तो कहा था शिष्यों से टक्का दिलाओ | तो शिष्य तो हो महापुरुष चार शिष्य पूरे थे और मैं आधा साढ़े चार टक्के दिए तुमको | चिंता नहीं करो तुम्हें पैसे मिल जाएंगे बेटी की शादी हो जाएगी, फर्क क्या पड़ता है, आपकी बेटी हमारी, बोले अब ये मीठी मीठी बातें से नहीं चलता, जब तुम्हारा काम रुका है तब हमारे पास आए, हम आने वाले नहीं है | तुम तो ऐसे हो तुम्हारे अंगद देव भी ऐसे थे, अर्जुन देव, तुम क्या समझते हो तुम्हारे गुरुओं की गादी गुरु ये वो सब ऐसा करके गुरु नानक तक के गुरुओं की निंदा करना चालू कर दिया | अर्जुन देव ने कहा देखो मेरी जब तक निंदा कर रहे थे तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था | कि निष्कृष्ट प्रकृति की निंदा हो रही है, मैं मान लेता | लेकिन वे पूर्ण स्वरूप में लीन हुए मेरे ब्रह्मवेत्ता गुरुओं की तुम निंदा करते हो। यह मेरे से नहीं स जाता है। बोले नहीं साता तो क्या कर लोगे? हम तो करेंगे। फिर बकने लग गए। बकने लगे तो उस महापुरुष ने अपना वाक का तीर छोड़ा। श्राप दिया। अब हम तुम्हारा त्याग करते हैं जाओ तुम्हारा सत्यानाश। ......(contd to part 2)











ज्ञानी का स्वभाव - part 1

          16 5 1982 सत्संग           परमात्मा का चिंतन करते करते तन के  विकार कम होते हैँ, रजो तमो गुण घटते जाते हैं, रजो और तमो गुण मे द्वे...