नारायण नारायण नारायण ओम। जो बात करते हैं उनका कान पकड़ के बाहर ले जाओ सिक्योरिटी वाले कमांडो जाओ जल्दी। सुबह सुबह शोर करते हैं आश्रम में रहने के लायक नहीं है। जो भी आवाज करे कान पकड़ के एकदम बाहर आश्रम के इधर नहीं वहां इधर थोड़ी कर रहे हैं। चाहे माई हो चाहे माई का बाप हो बेशरम लोग सुबह सुबह इधर शोर मचाने आए। वही खड़ा रहो पीछे जहां भी चिल्लाए कान पकड़ के तुरंत बाहर आश्रम के गेट के बाहर।
चलते चलते बोलने से भी ऊर्जा बहुत नाश होती है। दिमाग कमजोर होता है।
अभी आरती करने का समय नहीं हुआ। सब लोग आरती जलाए तब करो। मेरे को एक की एक बात कई बार कहनी पड़ती क्योंकि मूर्खों की तादाद ज्यादा है।
राजा का संदेश वाहक फौजी उसके घोड़े की नाल की कील निकल गई थी। तो पुराने फौजी ने कहा तू संदेश वाहक है कील निकल गई कील लगवा दे। बोले हां लगा दो। दो पांच दिन बीते पूछा कील लगवा दी? बोले एक पाई की कील है। एक पैसे होती थी। लगवा दो। फिर पांच सात दिन बीते पूछा लगवाई? अबे एक दो पाई के लिए कील लगाने में क्या आप इतना रोज रोज चिंता करते मैं लगवा दूंगा।
कुछ दिन बीते राज्य को पड़ोसी दो राज्यों ने घेर लिया। राजा तक खबर पहुंची राजा ने सेनापतियों को व्यूह रचना का आदेश दिया और जो भी जरूरी बातें थी वो लिख कर संदेश वाहक को चिट्ठी दी बोले जा घोड़े को उड़ा। वो गया घोड़े को उड़ा उड़ा आया।
घोड़ा दौड़ा तो कील जो एक निकली थी तो दूसरी ऐसे करते नाल निकल गई और घोड़ा धड़ाक से गिरा। सैनिक सिर के बल से गिरा चिट्ठी हाथ में पड़ी रही जिन्होंने घेरा था वो देखा कि राजा भाग गया क्या हुआ इनको तो संदेशा ही नहीं आता तो चलो आगे बढ़े और राजा के महल को घेर लिया जब राजा बंदी बन गया तो सेनापति क्या करेगा?
कहावत हुई
कील ना ठोका है घोड़ा गिरा, सैनिक लापरवाह नीच मरा, देश हारा,
संदेश - लापरवाह आदमी नीचों का शिरोमणि है। नीचों को गिनते जाओ तो लापरवाह से बड़ा कोई नीच होता ही नहीं है।
कील ना ठोकाई घोड़ा गिरा लापरवाह अभागा सैनिक मरा देश हारा
आजकल लापरवाही सबके जीवन में घुस गई।अब ये व्हीलचेयर थी कल इसकी बैटरी डाउन हो गई। उसको बैटरी रिचार्ज करना था भूल गया लापरवाही तुम्हारे सामने उठ बैठ कर आई।
आपने देखा? कहावत पक्की है जीभ तालू में लगाओ बहुत कुछ तुम्हारा व्यवहार बिगड़ता है लापरवाही से जीभ तालू में लगाओ मैं बोलता हूं उसको मन में रटो और अपने परिवार को लापरवाही की नीचता से ऊपर उठाओ।
कील ना ठोकाई घोड़ा गिरा सैनिक मरा देश हरा ये बहुत पुरानी कहावत है। घोड़े के पैर में नाल में कील ना ठोकाई घोड़ा गिरा सैनिक मरा देश हारा
मैं तो भूल गई मैं तो भूल गया मतलब ये लापरवाह नीच लोगों की बात है।
इसीलिए उसको मैंने उठ बैठ कर आई तुम्हारे सामने उसकी कुछ और भी नालायकी थी तो मैंने निकाल दिया था।
भगवान राम के गुरुदेव बोलते थे वशिष्ठ मुनि हे विधाता मेरे ऐसे दिन कब आएंगे? उठूं तो सामने गाय दिखे पीछे देखूं तो गाय दिखे दाहे बाए देखूं तो गाय दिखे | ऐसी गौशाला में भी उसको मजा नहीं आया। माफीनामा भेजा ये वो फिर उसको बुलाया तो फिर वही अपनी दिखाई टोकेलेमें बोलना उसको असर नहीं करेगा यहां उसको अनुभव कराया नालायक को जाहिर करना पड़ता है कि सेवा में नालायक है।
ऐसे ही एंपलीफायर का आवाज गाने वाले आवाज लापरवाही से रखते हैं तो उनको अभी खुलने में मैं टोकता हूं बोल बोल के तो थक गया। कुछ सुधार तो हो ही रहा है। सुन रहे हैं म्यूजिशियन वाले सुन रहे हैं लापरवाह
मैंने रास्ता खोज लिया है जो लापरवाही किया और दो चार दिन में एक दो बार पकड़ा गया उसको घर भेज दूंगा। बड़े में बड़ी सजा है क्योंकि इधर ऐसे माहौल में रहे हुए हैं घर में तो आधा पौना किलो सब्जी में पूरा परिवार खाता है। यहां सब्जी खाते जो रहने वाले आधा किलो 400 ग्राम 500 ग्राम घर वाले तो एक दिन भी नहीं दे सकते बेचारे तो उनको घर भेजे तो एक ही कमरे में दो पांच रहते हैं कई जगह..यहां तो खुले में बड़ा हॉल है कोई कहीं कोई कहीं बड़े कमरे हैं दो दिन भी घर भेजो ना तो उनको पता चल जाता है क्या आश्रम की जिंदगी तो आश्रम की है। 15 दिन घर रहो सजा..एक महीना जाओ घर रहो उससे सुधार हुआ है.
तो मेरी दयालुता का दुरुपयोग हुआ और अव्यवस्था..वर्षों तक एंपलीफायर संभालते हैं म्यूजिशियन संभालते हैं अभी भी मेरे को कहना पड़ता है तो मेरा कितना दुर्भाग्य है।
अब मैंने अपना रुख बदला है। बोलते हैं दया धर्म का मूल है ये मैं जानता हूं। लेकिन दया डाकिन है ये भी मेरे को पता चलवा दिया लापरवाह कमीनों ने अनाधिकारी पर दया करना वो डाकिन है |
कील ना ठोकाई तो देश कैसे हारा, लापरवाह नीच से अपने परिवार वालों को ये कथा सुनाना, लापरवाही छोड़ दे, चाहे खाना बनाने की लापरवाही हो चाहे झाड़ू की..राम कृष्ण परमहंस इतने भगवत ध्यान में मां के भाव में मस्त रहते कोई सोने की गिनिया भी रखता तो क्या करूं मैं, गंगा जी में फेंक देते |
ध्यान समाधि से उठे आश्रम वासी सब्जी ले आया था क्या लाया है बोले बैंगन लाया हूं क्या भाव लाया बोले दो आने से हैं? डेढ़ आने से मिलता है तू दो आने कैसे लाया अच्छी तरह से उसको डांटा..झाड़ू लगाते लगाते कहीं कचरा रह गया अच्छी तरह डांट देते थे..
लापरवाही जैसा दुर्गुण और कोई हो तो बताओ कील ना ठोकाई नालत है ऐसे लापरवाहों को सूरत आश्रम का सब्जी खरीदने में कोई गया हरी मिर्ची हम ₹2 ₹3 में खरीद लेते वो ₹50 में ₹70 में और ₹80 में खरीद के आया आज सुबह उनसे पूछा सब उसको मैंने कहा आश्रम में रहने के लायक नहीं हो अपने घर चले जाओ आज सुबह की बात है 5:00 बजे की 5:30 की अच्छे पद वाला आदमी था मैंने कहा नहीं तुम जहां से आए वही जाओ दो चार पाच रपए में जो चीज मिलती है वो ₹50 ₹70 ₹80 खरीदे हरी मिर्ची ₹80 होती है क्या? ₹50 हरी मिर्ची होती है क्या?
₹2 ₹3 बहुत हो गया बोले फाफड़ा मिर्ची है र डेढ़ मिलते है, तो फाफड़ा मतलब फीकी फीकी मोटी मोटी 50 वाली बोले फाफड़ा मिर्ची है, तेरा मुंह काला, अभी उसका दिमाग चकरा रहा है। युवक नहीं है छोटा लड़का नहीं है तीन बच्चों का बाप है, वो भी इतना गलती करे तो आश्रम में कैसे रहेगा, कौन सा पद दे क्यों दे, धर्म की चीज का बिगाड़ करना, मेरी बिगाड़ हो तो मेरी जिम्मेदारी होती है। नारायण नारायण
अपना अपना जो पद है उसका अगर सही उपयोग नहीं किया तो आप उस पद के नालायक हो उस पद से हटाए जाओगे। ये कुदरत का नियम है। अगर मैं आध्यात्मिक रास्ते जाता हूं तो और मेरा पद चमकता है अगर मैं उस रास्ते के बहाने दूसरे रास्ते चलता हूं तो मेरे को खुद को भी संतुष्ट नहीं रहेगा लोगों को भी लोग आना ही बंद कर देंगे लोगों को फायदा नहीं होगा तो कैसे आएंगे?
आज से 65 साल पहले 65 - 60 मैं डिसा में रहता था एकांत में ही रहता था साधना में लेकिन गुरु जी को लोगों ने प्रार्थना किया तो गुरु जी ने कहा थोड़ा बहुत सत्संग किया करो।
डिसा के पास में किसी जगह पर मेरा सत्संग आयोजित हुआ जो भी वहां मैदान था वो भर गया उसमें एक साधु बैठा था आगे..मैं सत्संग करूं उसके आगे बड़ी उम्र का था वो इंतजार कर रहा था कि कब पूरा हो तो बाबा से मिलूं मेरे से आया अकेले में मिला
मैं उस समय 23 -24 साल की उम्र का था वो होगा 70- 80 का 80 तो नहीं 65 से 75 के बीच का..रो पड़ा मैं क्या क्या बात है महाराज जी साधु वेश था बोले मैं आया तो लोग मानते थे बड़ा दुखड़ा रोया कभी कोई पूछता ही नहीं पूछता ही नहीं शब्द उसका नहीं है मेरे को बोलने में कोई शब्द अदल बदल हो जाता है। तो मैं सावधान तो रहता हूं लेकिन बोलने में होता है।
मैंने उसके सामने देखा और उसका इतिहास उसको बता दिया। मैंने कहा तुम साधना करते थे एकाग्रता की साधना करते थे बोले हां..तो त्राटक से जो शक्ति पैदा हुई पानी को देख के देते थे लोगों को फायदा होता बहुत.. अभी नहीं होता है। मैंने कहा वो शक्ति खत्म हो गई। लोगों का काम नहीं होता। तो लोग क्यों आएंगे, क्यों पूछेंगे?
उतना उसको नहीं बताया जो तुमको समझा रहा हूं। तो आप जिस ढंग से जिस पद का उपयोग करते हो पद तुम्हारे ही है। वही कीमत रखेगा। आपकी योग्यता नहीं है तो पद आपको पटक देगा। अभी मेरा कोई कार्यक्रम नहीं था। लेकिन आए होंगे और बिना मेरी उपस्थिति के थोड़े इधर थोड़े उधर गुड़गुड़ गुड़ करके प्रभात खराब कर रहे हैं।
इसलिए मैं कहा हम जाए तो दुर्वचन कह दे बाद में मेरे को अपना नियम भी करना है आज जाना भी है। है ना खुशखबरी तालियां नहीं बजाते। बजा रहे हैं। जा रहा हूं तो तालियां बजा रहे हैं। खुशखबरी है। जान छूटी तुम्हारी। समझदारी है कि लापरवाही है?
मूर्खों में हो कि अकल वालों में हो?
कर ली तुम्हारी परीक्षा। मिल गया प्रमाण पत्र। आज जा रहा हूं खुशखबरी है ताली बजाओ खुशखबरी है। आज मैं जा रहा हूं ये खुशखबरी मान के ताली बजा दी। है कोई समझदारी से कोई है रिश्ता नाता? अकल से कोई है परिचय?
अकल क्या होती है पता भी नहीं चल रहा है। ताली ठोकने वाले लगभग ऐसे ही होते हैं। बैठते भक्तों में साधकों के बीच में। पता ही नहीं ताली ठोकने से और कितना छूट जाता है कितना बिगड़ जाता है।
work while you work play while you play , That is the way, to be happy
वो रटे रटाए तो हो तुम लोग लेकिन अमल कौन करता है? अमल करे उसकी बलिहारी।
चलो। नारायण हरि हरि ओम हरि। 19- 20- 21- 22 मोटेरा में शिविर भी दे दिया आज। अब ताली बजाने की है क्या जरूरत? मूर्ख लोग हैं खड़ा कर दो उनको बाहर भेज दो। ये तीन माईया,अभी-अभी तालियां बजाई। इनको बाहर भेजदो..
बाहर अकल की दुश्मन बिन जरूरी ताली ठोकना जा के घर पे ठोको। अकल नाश करके इधर सर खपाने आती है। अब आपको भी ऐसे ही होगा। बिन जरूरी ताली ठोकी तो माइयो को हुआ ऐसा आपको होगा।
मेरा स्वभाव इतना कड़क नहीं है। लेकिन आप लोग कृपा करके मजबूर कर देते हो। आई बात समझ में?
किसके आगे परमात्मा की बात बोलूं? किसके आगे ध्यान भजन की बात करूं? इतनी अकल नहीं ताली नहीं ठोकना है तो ठोक रहे। किसके आगे बोलूं?
मेरा समय बहुत कीमती है। मैं अकेले में बहुत काम कर लेता हूं। साक्षात्कार पार पुरुष बोलता है तो सामने होते उतने लोगों को ही फायदा होता है। वो भी ऐसों को नहीं जिनको निकाला ऐसे लोगों को फायदा नहीं होता। जो तत्परता से सुनते हैं उनको होता है। अकेले में बैठते तो ब्रह्म लोक तक के सत पात्रों को मदद मिलती है। क्या आप क्या समझते हो?
कुछ बात समझ में आ रही है? आत्म साक्षात्कार पुरुष का समय कितना कीमती होता है कुछ दिमाग में आ रहा है?
वो बोलते उतने लोगों को जो ग्रहण करता है फायदा होता है। उनकी दृष्टि पड़ती उनका फायदा होता है उनको। लेकिन एकांत में बैठते अपनी व्यापकता में ध्यानस्थ ये वो होते हैं। वो ध्यानस्थ में आंखें बंद ही करें वो कोई जरूरी नहीं।अविकंप योग होता है।
आंखें बंद करके ध्यान समाधि लगी वो ध्यान योग है।
खुल्ली आंख युद्ध में भी समाधि की मस्ती बंसी बज रही है,, उपदेश हो रहा है, और कृष्ण का समाधि है। इसको बोलते हैं अविकंप योग।उसका वर्णन भी है गीता में। तो हमारा रास्ता अविकंप योग का है। आई बात समझ में?
आज डांट और गलतियां निकालना ये भी सत्संग है महा सत्संग है। मूर्खता निकालना भी महा सत्संग है। मूर्खता गई तो बुद्धिमत्ता है। लापरवाही गई तो समझदारी आई। हो गया ना सत्संग?
अच्छा लगा कि ये जो डांटने वाला अच्छा नहीं लगा? बड़ा हितेषी है। खिल न ठुकाई..हां..
आप बीमारी छोड़ दो तो स्वास्थ्य अपने आप हो जाता है। आप गलती छोड़ दो तो सही अपने आप हो जाएगा। हां अज्ञान छोड़ दो तो ज्ञान अपने आप होगा। अज्ञान छोड़ दिया तो क्या रहेगा?
हे भगवान हमको मिलो ये करो वो करो। जल्दी हमारा कल्याण हो बापूजी ये कर दो। बापूजी जो बोल रहे वो करना नहीं है ऐसे ही सिर खपाते तो उनको मैं बस उनको सुना अनसुना करता हूं। वो मेरे नजर में ज्यादा वैल्यू वाले लोग नहीं होते। समझ गए? तभी काम चल रहा है।
सभी की बात को ध्यान में सुनूं तो तुम्हारे लिए समय नहीं बचे। कई मूर्ख होते उनके भविष्य को तबाह होता हुआ देखता हूं तो उनको बोलता हूं फिर वो अपनी सफाई मारते में चुप हो जाता हूं। अच्छा अच्छा ठीक है जैसे तुमको ठीक लगे ऐसा करो।
एक बार लक्ष्मण जी झाड़ियों में बड़े दुखद आवाज से रो रहे थे। सीता जी के कान पड़ी बात दौड़ के गई झाड़ियों में छुपे हुए देवर जी ऐसा रुदन..खूब प्रयत्न करके उनसे पूछ ही लिया इतना इतना क्या दुख हुआ? इतना क्या क्या पता क्या हुआ?
बहुत मेहनत करके रोते रोते आवाज में लक्ष्मण ने कहा कि मैं अनाथ हो गया। कैसे? अनाथ कैसे? बोले मुझे मेरे स्वामी ने त्याग दिया। सीता समझ गई स्वामी तो इनके मेरे पति देव है। दौड़ी राम जी जहां थे लखन भैया बड़ा पीड़ित होकर आक्रांत कर रहे हैं। बहुत प्रयत्न किए बहुत बहुत मेरे को मश्कत करनी पड़ी तब बोले मैं अनाथ हो गया मेरे स्वामी ने मेरा त्याग कर दिया। राम जी को आश्चर्य हुआ।
सीता को बोले हट दिखा मेरे को दीखा । पहुंच गए अनुज अमित बड़ा छोटा भैया राम का आवाज सुनकर छोटे भैया को शांत होना ही पड़ा।
तुम्हारा मैंने त्याग कर दिया? मुझे तो स्मरण नहीं है। कब त्याग किया मेरे को स्मरण नहीं.. राम जी भी द्रवित हो गए। और ये बात करते मैं भी द्रवित हो रहा हूं। बात ही ऐसी है। लखन जैसा बहादुर रोए और व्याख्या सत्संग करना कोई मजाक की बात नहीं। कथाकार भले ठोकम् ठोक कर दे लेकिन सच्चे हृदय से करेंगे तो अपना चित्त द्रवित तो हो ही जाएगा।
प्रभु मैंने पूछा कुटिया कहां बनाए? आपने कहा तेरे को ठीक लगे। मेरे को मन के हवाले छोड़ दिया मैं अनाथ हो गया। राम जी बोले लखन मेरी गलती है। गलती है अच्छा अच्छा बताता हूं। उसके बाद राम जी ने शायद कभी नहीं कहा होगा कि तेरे को ठीक लगे.
कैसे सूझबूझ के धनी हो गए अपने देश में लखन की बुद्धि कितनी बढ़िया थी। और राम जी का कौशल्य कितना बढ़िया था। आज तो मां कोई हित का को बोलती है तो थोबड़ा चढ़ जाता है। कोई हितेषी हित की बात बोलती है तो मूड बदल जाता है। कहीं घसीट के तो उनके साथ तबाही के रास्ते चल पड़ते हैं। पार्टनरशिप करते हैं फलाना करते हैं तबाह हो गया फिर तो। है ना एक से एक बार अनुभव
तो क्या कर होती है? तू लखन है क्या बापू है?
जप करो ध्यान करो चुप बैठो शोर नहीं करो बस।
कील न ठुकाई अच्छा लगा कि ये जो डांटने वाला अच्छा नहीं लगा?

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