सोमवार, 19 अक्टूबर 2026

ज्ञानी का स्वभाव - part 1

      


 16 5 1982 सत्संग

        परमात्मा का चिंतन करते करते तन के  विकार कम होते हैँ, रजो तमो गुण घटते जाते हैं, रजो और तमो गुण मे द्वेष रहता है, रजो और तमो गुण में खिन्नता रहती है। अशंतोश  रहता है, ज्यूँ ज्यूँ परमात्मा का चिंतन बढ़ जाता है, त्यु त्यु जीवन में संतोष बढ़ने लगता है। ज्यूँ ज्यूँ परमात्मा का ध्यान होता है, त्यु त्यु सत्व  गुण बढ़ता  जाता है, ज्यूँ ज्यूँ सत्व  गुण बढ़ता  है, ध्यान मे आनंद आने लगता है।


भगवान भागवत गीता के 12वां अध्याय में कहते हैं - अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।


अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।

निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।13।। 

 


ज्ञानी सब भूतों में द्वेष भाव से रहित,  स्वार्थ रहित,  सबका प्रेम और हेतु रहित दयालु है,  ममता तथा अहंकार से रहित है, सुख दुख में समय है और समाधान है। ज्ञानी क्षमा करने में वीर होता है अर्थात अपराध करने वाले को भी अभय देने वाला है।


भागवत गीता का 12 अध्याय 13 श्लोक है।

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।

 

ज्यूँ परमात्मा का चिंतन बढ़ता है तो तमो और रजो गुण क्षीण होता जाता है, ये प्रारंभिक भक्त के स्वभाव है। रजो तमो गुण होने से मनुष्य देह में पाशवी वृत्तियां बनी रहती है। लेकिन जब प्रभु का चिंतन करता है प्रभु के प्यारों का संग करता है, प्रभु की आज्ञा जो शास्त्र उसका अवलोकन करता है सुनता है, वह सौभाग्यशाली व्यक्ति धीरे-धीरे ज्ञानवान के स्वभाव को प्राप्त होता है। 

अद्वेष्टा किसी में द्वेष न करना,  द्वेष तब होता है जब मन में कामनाएं होती है,  द्वेष तब होता है जब अहंकार होता है, भक्त का अहंकार भगवान में समर्पित होता जाता है। ज्ञानी का अहंकार अद्विता मे लीन होता जाता है।

अद्वेष्टा सर्वभूतानां  

  किसी भी भूत प्राणी से द्वेष नहीं करता, द्वेष नहीं करता तो राग करता होगा?  नहीं राग भी नहीं करता। राग भी नहीं करता है, द्वेष भी नहीं करता है। तो फिर उदासीन होगा? किसी से राग होता है तब प्रवृत्ति होती है, या तो द्वेष होता है तब प्रवृत्ति होती है।

राग से मोह जनित प्रवृत्तियां होती है, और द्वेष से ईर्ष्या जनित प्रवृतियां होती है। लेकिन ज्ञानी को तो राग द्वेष होता नहीं,  अब राग द्वेष नहीं होगा तो प्रवृत्ति कैसे  करते होंगे? बिना राग के हमारे संसारी लोगो मे प्रवृत्ति देखि नहीं जाती। बिना द्वेष के प्रवृत्ति होती नहीं। किसी वस्तु में राग है उसको पाने के लिए प्रयास है,  किसी वस्तु या व्यक्ति से द्वेष है उसको हटाने के लिए प्रयास है,  फिर चाहे वह सचमुच द्वेष करता हो, चाहे वह सचमुच राग करता हो, या न करता हो, वो बात अलग है। 

लेकिन हमारे चित्त मे झूठ मूठ भी आप बैठकर चिंतन करके फलाना व्यक्ति बड़ा दुष्ट है, बड़ा बदमाश है, मेरा शत्रु है, मेरे तरफ घूर के देखेगा, मेरे से एसा करेगा वैसा करेगा, 6:15  ऐसा है वैसा है आप थोड़ा सा उसके लिए सोचने लग जाए, धीरे-धीरे आपको लगेगा की सचमुच वो व्यक्ति हमारे से द्वेष करता है, मन का स्वभाव है जिधर का तुम मनन करते हो उधर का हो भागता है| 

 गर्मी में सोए हैं अचानक नींद टूट पड़ी और याद आ गया के फलाना व्यक्ति बड़ा खराब है न जाने मेरे लिए क्या क्या बोलता होगा। क्योंकि आपने दोहरा रखा उस के लिए। किसी के लिए रागाकार वृत्तियाँ दोहरा राखी है,  तो रागाकार घटनाएं घट सकती है, रागकार वृत्ति भी दौड़ती है लेकिन द्वेषकार घटना भी न घटने पर वृत्ति घटित हो सकती है,  रागाकार घटना ना घटने पर भी वृत्तियाँ घट सकती है|

एका एक स्वपने मे देखा ठुठ, भ्रान्ति हो गयी की ये तो चोर खड़ा है, द्वेष चालू हो गया की, ये तो बड़ा दुष्ट है 

मैंने उसका कुछ बिगड़ा नहीं घूर घूर के देख रहा है,  आप सोए हैं पलंग पर पंखा चल रहा है अंदर द्वेष की वृत्तियाँ चालू हो गई,  आपने डंडा उठाया अथवा घर की ओर भेज मित्रों को इकट्ठा किया इस्लाम खतरे में, धर्म खतरे में, माल मिलकत खतरे में, चोर आया चोर आया। आप तो शांत सुखरूप सोये हुए थे, लेकिन द्वेष की वृत्ति ने आपको परेशान कर दिया। 

आप सुखरूप सोये हुए हैं, और  आपने देखा कोई मित्र आ रहा है,  सपने में आप उठे जल्दी-जल्दी उसको मिलने गए, और रास्ते में टक्कर लग गई, गिर पड़े, पैर से खून बह चला, तो यह सब व्रतियों ने दिखा दिया तुमको, तुम सुखरूप  थे लेकिन राग की वृत्तियों ने भी तुमको वहां से हटा दिया  और द्वेष की वृत्त ने तुमको हटा दिया, लेकिन जो ज्ञानी है वह अपनी जगह से नहीं हटता है, राग की वृत्तियाँ द्वेष की वृत्तियाँ उसके चित्त में नहीं होती, और उसकी तो स्वाभाविक मैत्री होती है। तो मैत्री करने के लिए भी तो आदमी है हट जाता है, जय राम जी की, मैत्री की प्वृत्ति भी करनी पड़ती है,  भगवान कहते हैं - अद्वेष्टा सर्व भूतानाम.।…… ज्ञानी अद्वेष होता है, अद्वेष है तो अराग भी आगया, जहां द्वेष होता है वही राग होता है,  अथवा तो जहाँ राग होता है वही द्वेष होता है, ये आदमी बड़ा रागी है तो कहीं न कहीं द्वेष भी होगा, ये आदमी बड़े गुस्सैबाज है, तो कहीं न कहीं बड़ा प्यार भी करता होगा। एक छोर का कभी कुछ नहीं होता,  जब होती है घटना दो छोर की - every action create a reaction दो तरफ होता है,  राग है तो द्वेष भी है  अथवा द्वेष है तो राग भी है। ज्ञानी में राग भी नहीं होता है द्वेष भी नहीं होता है। 

जिसमे राग द्वेष नहीं होता, भगवान बोलते हैँ वो मेरा प्यारा भक्त है, मेरा आत्मा है, मेरा स्वरुप है। तो राग द्वेष नहीं होता, लेकिन फिर भी कुछ होता है। क्या होता है? - मैत्री होती है, करुणा होती है, निर्ममो होता है, निर अहंकारीता होती है, सामान्य मनुष्य को तो राग द्वेष हुआ - दो ही मुसीबत। और ज्ञानी में निर्मामोता, निरहंकार प्रेम और करुणा, - ज्ञानी को भी प्रवृत्ति करनी पड़ती की ज्ञानी में यह होता नहीं है,  उसको ममता करनी नहीं निर्ममोता करनी नहीं पड़ती है, करुणा करनी नहीं पड़ती है,  उसका स्वभाव होता है, 

जो किया जाता है उसमें गड़बड़ी होती है और जो स्वाभाविक होता है उसमें नहीं होती। जैसे बर्फ को शीतल होना उसके लिए कोई परिश्रम नहीं है। अग्नि को उष्ण होना उसका कोई परिश्रम नहीं है। सरिता का बहाना उसको कोई परिश्रम नहीं सरिता भला है अर्जुन कब सोचती है, की गाय आए तो मैं उसे शीतल पानी पीने दूँ और शेर आए तो जहर बना दूँ, नहीं उसका स्वभाव है करुणा बहाना शीतलता | ऐसे ज्ञानी का साधन काल में, मैत्री करुणा वाला जो स्वभाव था, वह ज्ञान होने के बाद जीवत्व तो बाधित हो गया फिर भी उसका मैत्री, जीव मात्र से मैत्री स्वभाव और जीव मात्र के लिए करुणा हृदय में ज्ञानी का स्वभाव होता है। करुणा होती है लेकिन ममता रहित करुणा होती है। अर्ध ज्ञानी यहां संसारी आदमी करुणा करेगा तो ममता सहित करुणा कर लेगा, लेकिन ज्ञानी की करुणा ममता रहित करुणा होती है। भरत ने करुणा की ममता की हिरन के बच्चे को बचाया, करुणा की लेकिन वो करुणा ममता सहित करुणा थी, हिरण के बच्चे में मोह हो गया। क्यों की सत्य का अनुभव जब तक नहीं होता है तब तक आकृति में पकड़ हो जाती है। आकृति में सत्यता रहती, जब सत्य की खबर नहीं है तो आकृति सत्य लगती है।

सेठ के पास दिल की कमाई आयी ₹200 के दो तोले सोना लेकर रामजी बना लिए, भगवान राम जी बना लिया। फिर तेजी मंदी आयी, बहुत पैसा कमा लिए, 500 रूपया लेकर राम जी का सेवक ले आया हनुमान जी, ₹500 का हनुमान जी बना पांच तोले का, दो तोले का राम जी बनाया, क्योंकि उस समय मुनाफा कम था तब दो तोले और बाद में पांच तोले फिर आया कोई मंदि का मौजा सेठ का दीवाल निकल गया और बड़ी तकलीफ हुई, पैसे पैसे के लिए मोहताज हो गया, थैली में डाल दिया हनुमान को और राम जी को और लगाया मानिक चौक, ज्वेलरी ने कहा की भाई देख साल पहले ₹200 तो भगवान राम के दे देंगे, ₹200 इसका  देंगे, (राम की तरफ इशारा करके) है और 500 उसके दास के देंगे। तो सेठ बोलता है दास का मूल्य ज्यादा और स्वामी का मूल्य कम, ये कैसे हो सकता है? जब दास के 500 देते हो तो स्वामी के 600 दो, सुनार बोलता है  स्वामी भी तुम ले जाओ और सेवक भी तुम ले जाओ, हमारी नजर सोने पर है आकृति पर नहीं। जो मूल को देखता है उसके आगे आकृति नहीं है और जो आकृति को देखता है उसके आगे मूल छुप जाता है|

13:51 तो ज्ञानी मैत्री करता है तो किस पर करता है? स्वर्ण पर करता है। जय राम जी की। ज्ञानी प्रेम करता है तो सोने पर करता है और हम प्रेम करते हैं तो दागिने पे करते हैं। ऐसा कौन सा सोने का दागिना है जो दगीना ले जाओ और सोना मेरे को दे दो, नहीं दे सकते हैं। पानी मेरे को दे दो और तरंग तुम ले जाओ, पानी के ऊपर जो तरंगे हैं तरंग तरंग तुम ले जाओ और पानी पानी मेरे को निकल कर दो, पानी के बिना तरंग नहीं रह सकती है, सूत के बिना कपड़ा नहीं रह सकता है। सोने के बिना गहना नहीं रह सकता है, मिट्टी के बिना घड़ा नहीं रह सकता। ऐसे चैतन्य के बिना तुम नहीं रह सकते हो, तो ज्ञानी ने अपने चैतन्य बपू अपने आप को अपने अंदर निहारा है उसे लिए भूत मात्र में अपने यार को निहारता है,  तो अपने आप से तो सदा प्रेम होता ही है।

स्वार्थ रहित प्रेम तो ज्ञानी कर सकता है।


गुरुजी नु स्नेह मने वार वार सांवरे, उतारे भवति पार जो……(भजन) 


मातृ जैसे ममता प्रेम, इस बात को श्री कृष्ण कहते हैं अद्वेष्टा सर्व भूतानाम, सर्व भुत प्राणी में द्वेष नहीं, जो उनका  जो बिगड़ता है, उनको गलियां देता है, उनके प्रति भी ज्ञानी का द्वेष नहीं होता है।करुणा स्वभाव होता है। 15:53

जिसने दिया दर्द दिल उसका खुदा भला करें

 जिसने दिया दर्द दिल उसका खुदा भला करें

आशिकों को वन्य की फिर से यही दुआ करें 

जिसने दिया दर्द दिल उसका खुदा भला करें


16:13 क्यों की आशिक जानते हैं कि दर्द तो उसके आसुरी राजसी तामसिक वृत्ति के द्वारा दिया गया है लेकिन दर्द देने वालों के पीछे भी उस चैतन्य तो अपना यार है। जैसे अपने दांत अपने जीव को दर्द दे देते फिर भी दांत का भला करते हैं हम लोग अपना नाक चमड़ी को कभी दर्द दे देता है फिर भी अपने उंगलियों को हम काट कर नहीं फेंक देते हैं, क्योंकि पता है की- सब हमारा है।

16:53 रात को मैंने स्वप्ना देखा, मेरा बच्चा कोई जरूरी चीज लेकर भागा, मैंने उसको बुलाया और रुका नहीं मैं उसके पीछे दौड़ा उसको पकड़ लिया पकड़ लिया तो उसने वो चीज झूठी कर ली, मुझे किसी को देनी थी प्रसाद में उसने झूठी कर ली, मैंने कहा बदतमीज यह क्या करा, उसने कहा कुछ भी करो, आई थी खाने के लिए, कोई भी खाएगा तो मैंने पहले खा ली, मैंने कहा तू अभी से वकील जैसा कुर कपट का जवाब देता है, ऐसा करके उसका कान पकड़कर जोर से तमाचा मारा,  आंख खुल गई, गाल मेरा ही था|

 सौ बार तेरा दामन मेरे हाथ में आया था

 मगर आंख खुली तो मेरा ही गरेवा था।

 ज्ञानी इस प्रकार समझता है की थप्पड़ भी मेरी है तो गाल भी मेरा ही है। लेकिन हम समझते हैँ थप्पड़ मेरा है गल उसका है। उसमें भी अपने को देखने वाला ज्ञानी बताओ किस से द्वेष करेगा?अद्वेष्टा सर्वभूतानां सर्व भूतों में द्वेष रहित वाला| 

 नदी में बारिश के कारण बाढ़ बह चला था। बाढ़ के पानी में एक बिच्छू भी बहा चला था, साधुनें देखा ये जंतु बेचारा बह चला है, उसको निकालू, हथेली पर उस जंतु को निकाला, और बिच्छू ने डंक मार लिया, साधु ने उछलकर दूसरे हाथ पर ले लिया,  वहां डंक मारा, साधु नदी से बाहर आ रहा,  लोगों ने कहा महाराज बिच्छू है। डंक मार रहा है। ये इसका स्वभाव है डंक मारना और ये मेरा स्वभाव है की इसे किनारे लगाना| 

 18:59 इसी प्रकार जो बुद्ध पुरुष समाज में आए हैं इस धरती पर आए हैं जब जब आए हैं तब तब समाज के लोगों ने और दुष्ट लोगों ने उन महापुरुषों को डंक मारे हैं लेकिन महापुरुषों ने उन्हें फिर भी किनारे लगाने का प्रयास किया है,  इसलिए भगवान ऐसे महापुरुषों के पीछे-पीछे घूमते हैं और भगवान ऐसे महापुरुषों के लिए बोलते हैं,अद्वेष्टा सर्वभूतानां सब भूतों के लिए,  सब भक्तों के लिए नहीं, भक्त शिष्यों के लिए नहीं, भक्त बिच्छुओं के लिए नहीं, लेकिन सब भूत प्राणियों के लिए जिसके चित में द्वेष नहीं है वो मुझे बहुत प्यारा है। “अर्जुन” में उन्हीं के चिंतन में मस्त रहता हूं। तो ऐसा मत समझना की मैं कोई और आनंद से आनंदित हूं, मैं गीता के ज्ञान से आनंदित हूं। ऐसा लक्ष्मी को श्री कृष्ण भगवान बैकुंठ में बता रहे थे। 

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।

जिसमें मैत्री भाव है, करुणा है। करुणा उनको करनी नहीं पड़ती है,  व्यापारी ग्राहक पर करुणा करता है, लेकिन वह करुणा नहीं लोभ है। ग्राहक व्यापारी पर करुणा करता है सेठ जी जो तुम्हे ठीक लगे कोई बांदा नहीं,दो पैसा ज्यादा ले लोग तो। उसके पीछे भी ग्राहक अपने अहंकार को पोषणा चाहता है। सेठ यदि नमता दे देता यहां फ्री दे देता है तो अच्छा कहलाने के लिए। बार का बाप यदि 25 50 शहनाइयों के ऊपर न्योछावर कर देता है  तो अपने अहंकार को पोषने के लिए, लेकिन ज्ञानी में ऐसा भी नहीं की लोग मुझे अच्छा कहे, लोग मेरी वाह-वा करें, अथवा में अच्छा देखूं इसलिए ज्ञानी कोई करुणा का काम करता है ऐसी बात नहीं है। 

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। बाप कमा कमा के बच्चों को दे देता है, सेठ कमा कमा के सेठानी को दे देता है, दे नेता कमा कमा के कूटमी जनों को आगे बढ़ाया जाता है लेकिन इसके पीछे ममता छुपी है। तब संत कमा कमा के सारे विश्व के जीवों के लिए समर्पित कर देता है फिर भी कोई ममता नहीं।


21.17 निमोमो निरहंकार 

ज्ञानी हो, निर्मम है, निरंकार है, बरसता रहता है, फिर भी उसके ऊपर दुख तकलीफ  आ सकती है। क्यों? ऐसा देहधारी कोई नहीं जिस पर कष्ट न आए हो। पुत्र प्राप्ति पुत्र वियोग, धन प्राप्ति धन वियोग, यश प्राप्ति यश वियोग, तंदरुस्ती प्राप्ति तंदुरुस्ती वियोग  जिसकी प्राप्ति होती है उसका वियोग होता है, जो मिलता है वो बिछड़ता है, जो बनता है वो बिगड़ा रहता है, तो ज्ञानी के पास भी जो कुछ शिष्य आते हैं तो सब शिष्यत्व निभा सकते हैं ऐसी कोई जरूरी बात नहीं, सब वफादारी कर सके यह कोई जरूरी बात नहीं, तो ज्ञानी को भी बहुत बेवफा व्यक्ति मिल सकते हैं, बहुत बेवफा परिस्थितियों खड़ी हो सकती है, फिर भी ज्ञानी सुख दुख में सम रहता है, हमको सुख मिलता है तो हम चिपक जाते हैँ, दुख मिलता है तो खिन्न हो जाते हैं, लेकिन ज्ञानी समझता है कि सुख और दुख प्रकृति में हो रहा है। 22.25 

  प्राकृति क्रियमा….मन्येट श्लोक 

 प्रकृति में गुण और कर्म हो रहे हैं अहंकार से जो विमूढ़ हो गया वो समझता की इसने मुझे सुख दिया यह बहुत भला है, और ये जुडा रहे जहाँ में और ये भी जुडा रहे में जुडा रहूं ये बस मेरा यार है, 22.53 

 दुख मिला की यह बस मर जाए तो अच्छा, चला जाए तो अच्छा इसकी हानी हो जाए तो अच्छा, ऐसे करके शत्रु का चिंतन करते या तो मित्र का चिंतन करते हैं लेकिन जिससे चिंतन होता है उसे चैतन्य को छोड़कर चिंतन करके मरते हैं साधारण लोग, लेकिन ज्ञानी जिससे चिंतन होता है उसी में खड़ा है और जो चिंतन होता है वो समझता है की वृत्तियों का खेल है, तो इसलिए ज्ञानी उलझता नहीं सुख दुख में, और अपने जैसे लोग उलझ जाते हैं, खैर तुम तो ज्ञानी होंगे,  हमारे जैसे लोग उलझ जाते हैं,

 

निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी। 

23.33 सुख दुख में समान रहे, क्योंकि सुख भी एक आने वाली चीज है, दुख भी एक आने वाले चीज है, हम बोलते हम मर गए, हम बहुत दुखी हैं। भले आदमी कैसे दुखी हो तुम बोले रात को खाया सुबह खाने का नहीं है, कल ₹10 जेब में थे आज चवन्नी है, 30 पैसा किराया भी नहीं है, में बहुत दुखी हूं, भाई ऐसे भी आदमी जिसके चार दिन से 30 पैसे का इंतजार है, ऐसे भी आदमी जिसने दो दिन से खाया नहीं, ऐसे भी आदमी है जो बेचारे पड़े हैं जेल में या रेल में या कहीं पड़े हैं, उनसे तो तुम और भी ठीक हो थोड़ा वह भी तो तुम्हारे स्वरूप हैं, लेकिन साधारण मनुष्य अपनी देह को ही सर्वस्व मानेगा। बाकी का जो होता है वह दुनिया के बच्चे मर जाएं तो कोई दुख नहीं, दुनिया के भाइयों को कुछ चोट लगे तो कोई दुख सुख नहीं लेकिन मेरे भाई को चोट लगी, मैं दुखी हो गया, मेरे बच्चे को चोट लगी मैं दुखी हो गया, तो हम लोगों के दुखी पना सुखी पना ममता से है, लेकिन ज्ञानी निर्मम है, ज्ञानी किसी को भी देखेगा सामने दुखी तो ज्ञानी का हृदय करुणा से भर जाएगा, हालांकि ज्ञानी को किसी ने पत्थर मारे हैं किसी ने मजाक की है, किसी ने लट्ठ मार दिया और ज्ञानी के ललाट से खून बहता है और सामने किसी ने पकड़ के उसे व्यक्ति को यदि दो चार डंडे मारा ज्ञानी की नजर पड़ेगी तो ज्ञानी अपना चोट भूलकर उसको बचाने दौड़ जाएगा। 25.13 


भगवान बुद्ध जा रहे थे एक अहीर बहुत सारे घेटे बकरे ले जा रहा था उसके कंधे पर एक छोटा सा बकरा था जिसकी टांग थोड़ी टूटी हुई थी, उसको भी उतार के जबरदस्ती चलवा रहा था, बुद्ध ने देखा, बुद्ध का हृदय भर गया उस भरवाड़ को हाथ जोड़ा के भाई कहां जाता है, अमुक राजा यज्ञ कर रहे हैं उसे यज्ञ में यह वली देने के लिए टाइम पर पहुंचना है, मैं थक गया हूं जल्दी से चला नहीं जाता इसलिए इसको उतार के घसीट के जल्दी जल्दी ले जा रहा हूं,  बुद्ध ने कहा क्षमा कर मेरे भाई, ये मेरे को दे दे, बुद्ध ने उस बकरे के बच्चे को कंधे पर उठा लिया|

 ऐसा नहीं सोचा की मैं बुद्धत्व उपलब्ध हूं मैं बड़ा आदमी हूं, लोग क्या कहेंगे मेरे को अपनी पर्सनैलिटी संभलनी है, मेरी इज्जत और आबरू संभलनी है, I am something, they are nothing,   ऐसा बुध पुरुष को नहीं होता, बुद्ध पुरुष  I और they नहीं  I  I  I+ I+I+I+I 26.35 all  I is we, ये में में में मिलाके हम तो ज्ञानी हम, तो ज्ञानी समझता है हम, जैसे अलग-अलग अंग है शरीर के, कान अलग काम करते हैं, आंख अलग कम करते हैं, नाक अलग काम करती है, जीवहा अलग काम करती है, शरीर की मांसपेशियां अलग-अलग अपना काम करती है, फिर भी इसको सबको तुम क्या बोलते हो “मैं”, जैसे पूरे शरीर के अलग-अलग अंग अलग-अलग काम करते हुए भी तुम्हारा मैं इसमें एक तत्व का अनुभव करता है, ठीक इसी प्रकार ज्ञानी का सारे विश्व में अलग-अलग देवी देवता यक्ष किन्नर गन्धर्व भूत प्रेत पिशाच डाकिनी शाकिनी सब अलग अलग पार्ट को ज्ञानी अपना आपा समझता है, इसलिए सब भूत प्राणियों से ज्ञानी स्नेह करता है, इसलिए भूत भी ज्ञानी से नहीं डरते, भयभीत नहीं होते, भयभीत होने के लिए क्रूरता चाहिए, ज्ञानी में क्रूरता नहीं होती है, भगवान शंकर के पास भूत भी मजे से रहते हैं। श्री राम। 27.37

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।

निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।13।।

 उनको ममता नहीं होती, ज्ञान में ममता नहीं होती और अज्ञान में ममता बिना और कुछ नहीं होता।

  मैं और मेरे तेरे की माया, बस करदिनी जीवन काया।

ममता से शरीर में मैं बुद्धि होती है और शरीर को में मानकर दूसरों को तू माना जाता है, मैं और तु से सारा अविद्या का व्यवहार चलता है, और अविद्या के व्यवहार से कर्म बनते हैं, कर्मों से फिर जन्म बनते हैं, और जन्मों से फिर कर्म बनते हैं, ऐसा चक्र का ये चलता रहता है, ज्ञानी को ये अहंकार ममता चला गाया, उस लिए उसकी स्वाभाभिक चेष्टा है, जाइए नदी सोचती नहीं है में गौओं के लिए शीतल जल बाहऊं, शेर आजाए तो जहर बन जाऊं, सज्जन हो तो दूध का लोटा भर जाए और दुर्जन हो तो कीचड़ भर दूँ, नदी कभी नहीं सोचती स्वाभाभिक बहती रहती है, ऐसे कभी नहीं सोचते की अच्छो को साधु और बुरों को हैरान करूँ, संतों की नजर में अच्छा तो अपना आपा है, और बुरा भी अपना आपा है। क्योंकि अच्छाई और बुराई व्यक्तियों का खेल है, अंदर में सबका आधार….। 

बुद्ध ने उठा लिया बकरा कंधे पर गए उस सम्राट के द्वार पर, जो इंतजार कर रहा था बकरों का बली देने के लिए, बकरा उसके कदमों में रखकर अपुर के पैरों पर गिर पड़े, की भाई पहले इस शरीर की बली दे। क्योंकि मैंने अपने आप को जान लिया अब यह शरीर मेरा काम का नहीं है, लेकिन यह तो अपने शरीर को काम वाला मानते हैं 29.36  इसलिए इनको दुख ज्यादा होता है, इनको पीड़ा ज्यादा होती है, मेरे को इतनी पीड़ा नहीं होगी मैं पीड़ा का साक्षी होऊंगा, यह पीड़ा स्वयं बन जाएंगे। ऐसा करके बुद्ध का ह्रदय पिघला,  पिघले हुए हृदय का असर उस सम्राट पर पड़ा,और सम्राट बुद्ध के शरण को प्राप्त हुआ। और यज्ञ में बलि देने की गलती से रहित हो कर भगवान के रास्ते चला। सच्ची बली तो देना है अहंकार की, और हम अपने अहंकार को बचाकर पशुओं की बलि देते हैँ। श्री राम। 30.19 

तो ज्ञानी निर्मम होता है, निरहंकार होता है, और सुख दुख में सम होता है, ज्ञानी को ऐसा नहीं होता की - मैं कहीं झुक गया छोटा हो गया,

क्षमा बड़न को होत है,छोटन को उत्पाद,

 विष्णु को क्या घटि गयो जो भृगु ने मारी लात।

  जितना आदमी बड़ा उतनी सहन शक्ति बड़ी होती है,  जितना बड़ा उतनी समता ज्यादा होती है।

30.56 सुना था की श्री कृष्ण का जन्म होते ही पूतना ने अपना कम शुरू कर दिया था शिशुओं को पय पान कराते, कई सैकोडो बच्चे मार डाले थे, वह पूतना जैसी तैसी नहीं थी,  क्योंकि जैसे तैसे व्यक्ति के स्थान पर श्री कृष्ण के आधार पहुंचे ये बात हो नहीं सकती, बाली राजा की लड़की थी वो पूतना, भुत पूर्व बलिराजा वहां जब भगवान वामन का रूप लेकर आए, तो उसने मैन में इच्छा किया की इस छोटे से बालक को उठाउ और गोद में लेकर बस लगा लूं चिपका दूँ, इसको पय पान कराऊँ, इसकी माँ बन जाऊं तो कितना अच्छा, इसी भाव भाव उसकी आंखें भर आयी, आँखें बंद हो गई समाधिस्थ हो गयी, भगवान जब बाली से संकल्प कराये और एक पैर भले के भूमि पर रखा, दूसरा पद पर रखा, और तीसरा उसके सर पर रखा, गरुड़ को आदेश दिया गरुड़ ने अपनी पास में बलि को बांध लिया, तो हाहाकार मच गया, हाहाकार मची तो लड़की की ऑंखें खुली और ये लड़का इतना सा छोटा था इतना बड़ा हो गया और क्रूर होगया, और मेरे पिता को बंधवा दिया, इसको मैं दूध कैसे पीलाउ, इसको तो मैं जहर पिलाऊंगी जहर,  तो दूध पिलाने का संकल्प भी सच्चा हुआ और जहर पिलाने का भी संकल्प सच्चा हुआ, तो जीव

जैसा जैसा संकल्प करता है, ऐसा ऐसा समय पाकर उसको उस प्रकार की अनुकूलता प्रकृति दे देती है, तो उसके संकल्प के अनुसार फिर उनकी देह बनती है, ज्ञानी को इस संकल्प नहीं करता, स्वाभाविक काम करता है, इसलिए ज्ञानी निर्मम होता है, ज्ञानी में ममता नहीं होती, औरों मैं ममता होती है, वही पूतना आकर कृष्ण को पहले दूध पिलाया फिर बिष भी पिलाया, बिष पिलाया लेकिन विश्व नियता को पिलाया, जो मुक्ति देनी थी यशोदा को वही मुक्ति पूतना को दी, क्यों की अपना बिगड़ने वाले को भी उन्होंने दुख नहीं दिया, क्यों की कृष्ण ज्ञान की मूर्ति है, नहीं तो गला दबाकर नरक में भेज सकते थे, लेकिन उसकी आयुष पुरी हुई, निमित्त करके स्वधाम भेज दिया, 

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।

निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी।।13।।



ज्ञानी का स्वभाव - part 2 ...contd



ज्ञानी का स्वभाव - part 1

          16 5 1982 सत्संग           परमात्मा का चिंतन करते करते तन के  विकार कम होते हैँ, रजो तमो गुण घटते जाते हैं, रजो और तमो गुण मे द्वे...