रविवार, 28 दिसंबर 2025

सेवा से सिद्धि तक का अद्भुत मार्ग…

 


 00:00 सत्संग की शुरुआत

00:30 तिलोपा की कथा

01:46 केवल सेवा से सिद्धि

02:43 शिष्य से गुरु की पहचान

04:41 तिलोपा का ब्रह्मज्ञान--

05:11 स्वप्न और जगत का उदाहरण

06:51 समर्थ रामदास और कल्याण की कथा

08:09 गुरु ने रखा कल्याण नाम

09:04 लंगड़ी गाय और दूध का चमत्कार

10:37 सच्चे शिष्य की पहचान



00:00 सत्संग की शुरुआत

0:02  मनुष्य में कितनी सारी शक्तियाँ छुपी हुई हैं, एक साधारण व्यक्ति कितना महान हो सकता है, यह साधना और सत्संग का विषय है। वही व्यक्ति आगे चलकर 84 सिद्धों में पूजा जाता है।

00:30 तिलोपा की कथा

0:30 प्रज्ञाभद्र एक साधारण ब्राह्मण थे, गुरु के चरणों में गए। गुरु जी ने उन्हें तिल कूटने की सेवा दे दी। वे तिल ऐसे कूटते थे मानो उसमें अपने प्राण डाल देते हों, क्योंकि यह गुरु की बताई हुई सेवा थी। 0:45 गुरु कृपा ही केवलम्, शिष्य परम मंगलम्। उत्तम सेवक वह है जो सेवा खोज ले, मध्यम वह है जो संकेत पाकर सेवा करे। उन्होंने गुरु का संकेत पाया और तिल कूटने लगे। 1:05  इतने भाव से तिल कूटे कि खेतों के सारे तिल मानो उसी किचन में कूट दिए गए। धीरे-धीरे प्रज्ञाभद्र नाम लोग भूल गए और हर ओर केवल तिलोपा, तिलोपा, तिलोपा नाम गूंजने लगा।

01:46 केवल सेवा से सिद्धि

1:27  जीवन भर तिल कूटते रहे और गुरु की आज्ञा में लगे रहे। अंत में गुरु ने केवल एक कुंजी लगाई और वे ऐसे सिद्ध हो गए कि 84 सिद्धों में उनका स्थान हो गया। 1:43 उन्होंने न जोग किया, न जप, न व्रत, न उपवास, न चालाकी, न राजकारण— केवल गुरु की आज्ञा में तिल कूटते रहे। दूसरी आज्ञा आने तक वही करते रहे। 2:08 गुरु ने कह दिया तिल कूटो, बस बात पूरी हो गई। बाहर से गुरु देख रहे हैं या नहीं, इससे उन्हें फर्क नहीं पड़ा, क्योंकि उन्हें यह पक्की सूझ थी कि गुरु अंतर में बैठकर सब कर्म देख रहे हैं।

02:43 शिष्य से गुरु की पहचान

2:38 लोग गुरु का नाम भूल गए थे, लेकिन तिलोपा की सिद्धि और सामर्थ्य से तिलोपा प्रसिद्ध हुए तो गुरु का नाम भी खोजा गया। 2:45  तब पता चला कि तिलोपा के गुरुदेव विजयपाद थे। आज भी विजयपाद महाराज का नाम तिलोपा के कारण ही लोगों की स्मृति में है। 3:19  तिलोपा की ऊँचाइयों से गुरु के नाम की खोज हुई। गुरु की आज्ञा तो मानी गई थी, लेकिन गुरु का नाम तक जानने की आवश्यकता नहीं समझी गई— यही सच्ची सेवा है।

04:41 तिलोपा का ब्रह्मज्ञान

हूं जग हूं बुद्ध ,  हूं निरंजन हूं अमरण , से आर भव भंजन 4:43  तिलोपा कहते हैं— मैं ही जगत हूँ, मैं ही जगदीश्वर हूँ। मैं हीराजा हूँ, मैं ही रानी हूँ, और मेरी ही यह पूरी कहानी है।

05:11 स्वप्न और जगत का उदाहरण

5:11 जैसे स्वप्न में आप देखते हैं कि कोई व्यक्ति आपको मार रहा है, डांट रहा है, उस समय आप स्वयं को भूल जाते हैं और स्वप्न-पुरुष बन जाते हैं, जबकि वह दूसरा व्यक्ति भी आपकी ही रचना है। 5:32 आप ही राजा हैं, आप ही स्वप्न रचने वाली रानी हैं और आप ही पूरी स्वप्न-कहानी हैं। यह सत्य सुन लेना ही नहीं, समझ लेना बहुत ऊँची बात है। हूं जग हूं बुद्ध  हूं निरंजन  से आर भव भंजन हूं 6:06  मैं ही जगत हूँ, मैं ही बुद्ध हूँ, मैं ही निरंजन हूँ और समस्त भव का भंजन करने वाला भी मैं ही हूँ।

06:26 तिलोपा का अनुभव

6:26 भव भी मैं हूँ, भव भंजन हारा भी मैं हूँ, करता, धरता, भरता, भोगता, महेश्वर, परमेश्वर मैं ही हूँ—यह किसका अनुभव है? यह गुरु की आज्ञा मानकर तिल कूटने वाले सेवक का अनुभव है।

06:53 समर्थ रामदास और कल्याण की कथा

6:53 डाल पेड़ के ऊपर पक्षियों की बैठी हुई थी, कुएँ का पानी गंदा था, आसपास पानी की संभावना नहीं थी, प्यासों के लिए यदि यह कुआँ साफ हो जाए तो ठीक है—गुरु ने कहा। लेकिन चेलों ने कहा गुरु जी अपना काम हो गया, अब निकल चलें, यह डाला कौन काटेगा, जो काटेगा वह सीधा मरेगा। 7:05 कल्याण को पता चला, अंबादास को पता चला। सब कहने लगे मरेगा, मरेगा। गुरु जी आए और बोले बेटा यह खतरे से खाली नहीं है, कुएँ में गिर सकता है। अंबादास बोला—भव पार करने वाले गुरु की इच्छा है कि डाला कट जाए तो फिर मेरे जीवन की कीमत भी क्या है गुरु के संकेत के आगे। 7:30 अंबादास धड़धड़ करता हुआ डाले पर चढ़ा और डाले के साथ स्वयं भी कुएँ में गिर पड़ा। ईर्ष्याखोर शिष्य भाग गए, लेकिन जब देखा तो अंबादास डाली पर मानो झूल रहा था। 7:54  समर्थ रामदास आए और बोले बेटा चोट तो नहीं लगी। अंबादास बोला नख को भी खरोंच नहीं आई। गुरु कृपा ही केवलम्। गुरु जी आपने तो कल्याण कर दिया।

08:10 गुरु ने रखा कल्याण नाम

8:10 गुरु जी बोले—तूने श्रद्धा आगे रखी, तूने अपना कल्याण कर लिया। इन स्वार्थी शिष्यों को दिखा दिया कि स्वार्थी शिष्य गुरु से वह नहीं ले सकते जो वफादार और ईमानदार शिष्य पा सकता है। 8:25 अंबादास तेरा तूने ही कल्याण कर दिया, आज से तेरा नाम कल्याण है—और कल्याण गजब का कल्याण।

08:34 समर्थ रामदास की यात्रा

8:34 समर्थ रामदास कल्याण को लेकर यात्रा कर रहे थे। बोले बेटा यह बड़ा सुख है, गाँव छोड़कर आए हैं, दूध मिल जाता तो अच्छा था। कल्याण बोला गुरु जी आप आराम करें, मैं अभी ले आता हूँ। 8:56  एक कोस पीछे गाँव था, तीन किलोमीटर चलकर पहुँचा।

09:06 लंगड़ी गाय और दूध का चमत्कार

9:06 एक माई लंगड़ी गाय को गालियाँ दे रही थी। गाय भागी और खड्डे में गिर गई। माई रो रही थी। इतने में कल्याण आया और बोला माता जी एक शेर भर दूध दे दो। 9:30  माई हँस पड़ी और बोली यह गाय तो चुल्लू भर दूध नहीं देती। कल्याण बोला गौ माँ, मेरे गुरुदेव की सेवा के लिए क्या तू सहायता नहीं करेगी? 10:05
गाय खड़ी हो गई, मानो कामधेनु हो गई। झाग से भरा लोटा देखकर माई आँखें मलने लगी।

10:38 सच्चे शिष्य की पहचान

10:38 माई बोली तू कौन है, भगवान है या कृष्ण है? कल्याण बोला—न मैं भगवान हूँ, न कृष्ण हूँ, मैं तो समर्थ का सत्य शिष्य हूँ।10:43 जो सच्चे समर्थ सतगुरु का सत्य शिष्य हो गया, उसे कृष्ण या राम बनने की जरूरत नहीं होती। वह जहाँ है वहीं अपने भगवान तत्व को पहचान लेता है। 10:58  कई लोग गुरुदेव का बाहरी रूप बनाकर भाषण देने लगते हैं, लेकिन हमें गुरु की नकल बाहर से नहीं करनी। हमें गुरु के अंतःकरण की संपत्ति मिली है, बाहर की संपत्ति समाज संभाल लेता है।





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