बुधवार, 24 दिसंबर 2025

मंत्र शक्ति प्रभाव





00:00 संकीर्तन और मंगलाचरण (हरि ओम) 01:39 अकबर और बीरबल की कथा (पाव भर चूना) - मत कर रे गर्व गुमान - ४ . ४४ 06:40 बीरबल की बुद्धिमत्ता की परीक्षा (3 प्रश्न) 11:00 अकबर की बेगम की साजिश और बीरबल की सूझबूझ 16:55 मंत्र शक्ति का प्रभाव (गायत्री और सरस्वती मंत्र) 17:00 माधवाचार्य स्वामी और गायत्री अनुष्ठान (माधव निदानम्) 20:55 विद्यारण्य स्वामी और 23 अनुष्ठान (पंचदशी ग्रंथ) 24:35 जप और अनुष्ठान कभी व्यर्थ नहीं जाते 25:28 बापूजी का 40 दिन का दूध पर अनुष्ठान और अनुभव 27:05 कबीर जी और काशी के पंडितों का संवाद 29:28 कबीर और पंडितों का झगड़ा (लड्डू फेंकने का दृष्टांत) 30:52 सर्दी-जुकाम मिटाने का रामबाण प्राणायाम प्रयोग

1:40 अकबर और बीरबल की एक प्रसिद्ध कथा है — पाव भर चूना। कहा जाता है कि बीरबल को सरस्वती मंत्र प्राप्त था। उसकी बुद्धि इतनी प्रखर थी कि अकबर जैसा सम्राट भी उससे अत्यंत प्रभावित रहता था 1:46
एक सुबह बीरबल के पास अकबर का खोजा आया। उसने कहा कि उसे पाव भर चूना चाहिए। वह आगरा में पान का गल्ला चलाता था, पढ़ा-लिखा भी था, अपनी माँ का भरण-पोषण करता था और घर का खर्च चलाता था। खोजा पान के गल्ले से पाव भर चूना लेने आया।

2:07उस समय बीरबल ने तनिक सरस्वती मंत्र का सुमिरन किया, भूमध्य में ध्यान लगाया और सारा रहस्य जान लिया। उसने खोजे से कहा— “तुमने कल अकबर को पान लगाते समय लापरवाही से चूना ज़्यादा घेर दिया है। इससे अकबर के मुँह में छाले पड़ गए हैं।” 2:20 “अब अकबर पाव भर चूना मंगवाकर तुम्हें सिपाहियों के सामने खाने को बाध्य करेगा। यदि तुम नहीं खाओगे, तो तलवार और भालों की नोक पर खिलाएगा। अब क्या करोगे— भाग जाओगे या मर जाओगे?”

2:39 खोजा घबरा गया। बीरबल बोले— “ऐसा नहीं। मैं कल पाव भर से दो सेर घी लाया हूँ। तुम पाव भर घी पीकर फिर राजदरबार में जाना। ऊपर से चूना खाओगे, तो घी चूने को मारेगा और चूना घी को। तुम जीवित रह जाओगे।” 2:54 खोजे ने वैसा ही किया। वह अकबर के पास चूना ले गया। अकबर ने बड़ी-बड़ी आँखें दिखाईं और क्रोध में बोला— “नासमझ! लापरवाह व्यक्ति दुश्मन से भी बदतर होता है। बेवकूफ और लापरवाह व्यक्ति से तो दाना दुश्मन भला।”3:09 “लापरवाह व्यक्ति पर भरोसा नहीं करना चाहिए, उसे अपने इर्द-गिर्द नहीं रखना चाहिए। बेवकूफ और लापरवाह व्यक्ति से तो दाना दुश्मन भला। ग्राउची ने लापरवाही की। 10 मिनट लेट आया तो नेपोलियन सेंट हेल सेंट हेलना जेल में दुखी होकर गया बेचारा लापरवाह व्यक्ति पर भरोसा नहीं। story

देखो, मेरे मुँह में छाले पड़ गए हैं। लापरवाह व्यक्ति तो कुत्ते से भी बदतर होता है, क्योंकि कुत्ता भी अपना कर्तव्य निभाता है। 3:53 अकबर ने सिपाहियों से कहा— “यदि यह चूना नहीं खाता, तो भाले और तलवार की नोक पर खिलाओ।” खोजा चूना खाने लगा— लप-लप, चपर-चपर। क्योंकि उसे बीरबल का उपाय पहले से पता था।

4:07 दो दिन बाद खोजा ताज़ा-तवाना अकबर के सामने उपस्थित हुआ। अकबर हैरान होकर बोला— “अरे! पाव भर चूना खाने के बाद भी तू ज़िंदा कैसे है?”4:14 खोजे ने सारी घटना सुना दी कि बीरबल को सरस्वती मंत्र प्राप्त है और उन्होंने पहले ही अकबर के इरादे को समझ लिया था।

 4:26 कहा गया— सरस्वती मंत्र में इतनी शक्ति होती है कि रटा-रटाया ज्ञान रखने वाले देखते ही रह जाते हैं। रटा-रटी वालों में अहंकार होता है, लेकिन सरस्वती मंत्र अहंकार को शांत कर भगवान की शक्ति को प्रकट करता है। 4:38 विद्वान होना अच्छा है, लेकिन विद्वता का अहंकार और वेशभूषा का अहंकार व्यक्ति को ईश्वर से दूर कर देता है।

दोहा / पद्य

मत कर रे गर्व गुमान, गुलाबी रंग उड़ी जावेगो।
धन, जोबन, थारा जोर जवानी, माटी में मिली जावेगो।
पाछो नहीं आवेगो॥

5:07 किसी भी बात का अहंकार हमें ईश्वर से विमुख कर देता है। और जो ईश्वर से विमुख हो गया, उसकी तुच्छता के सिवा और क्या गति हो सकती है? 5:13 रावण ने कितना कुछ पाया, फिर भी ईश्वरीय सुख से विमुख होने के कारण उसका क्या हुआ? हिरण्यकश्यप जैसे लोगों की गति क्या होती है, यह इतिहास बताता है। 5:19 इसलिए वही विद्वता अच्छी है, जिसमें मन भगवान में लगा हो। वही धन अच्छा है, जिसमें मन भगवान में लगा हो। वही कुटुंब अच्छा है, जिसमें मन भगवान में लगा हो। 5:31 तीर्थ और स्थान वही अच्छे हैं, जो विश्वनाथ के विश्व-मानव से अभिन्न सत्ता में जगा दें। नहीं तो पशु भी जी रहे हैं, बच्चे तो कुत्ते भी पैदा कर लेते हैं— इसमें क्या बड़ी बात है? 5:45 गंधर्वों, किन्नरों और यक्षों के पास भी धन होता है। विद्या हो गई, धन हो गया, सत्ता मिल गई— यह कोई बड़ी बात नहीं है।

6:00 सबसे बड़ी बात है भगवत-रस मिल जाना, आत्मा-परमात्मा की मुलाकात हो जाना। 6:07 संपदा हो या विपदा— हरि विस्मरण ही विपदा है और हरि स्मृति, हरि प्रीति ही सच्ची संपदा है।

6:13 अकबर ने कहा— “बीरबल को बुलाया जाए, पूरे सम्मान के साथ।” आज पहली बार उसे समझ में आया कि बीरबल हरि-स्मृति से इतना महान बना है। 6:26 बीरबल आए। अकबर बोले— “तुम मेरे मन की बात जान गए।” बीरबल बोले— “इसमें क्या बड़ी बात है? यह गुरु द्वारा दिया गया मंत्र है और गुरु का दिया हुआ आदेश है। उसी के अनुसार मैं अपने मन का अनुसंधान करता हूँ।

   तीन प्रश्न

6:40 जब मैं मन का अनुसंधान करता हूँ, तो दूसरे के मन के रहस्य का भी पता चल जाता है। अकबर ने कहा— “अच्छा बीरबल, तुमसे एक सवाल किया जाएगा। 6:48 ऐसा कौन-सा प्राणी है जो पैदा होता है, पर खाता नहीं, पीता नहीं, रोता नहीं, हिलता-डुलता नहीं, बोलता नहीं, चखता नहीं, सूँघता नहीं, सोता नहीं और माँ के गर्भ से पैदा होता है?” 7:08 बीरबल को उत्तर देने में तनिक भी देर नहीं हुई। यही बुद्धिमानों की बुद्धि का परिचय होता है। बुद्धि के तीन विलक्षण लक्षण बताए गए— पहला, संयम का धन; दूसरा, दृढ़ निश्चय का धन; और तीसरा, त्वरित उत्तर। 7:23 बीरबल ने तुरंत उत्तर दिया— “जहाँपनाह, वह अंडा है। वह माँ के गर्भ से पैदा होता है, पर न खाता है, न पीता है, न हिलता-डुलता है, न बोलता है, न रोता है, न हँसता है। ज्यों का त्यों पड़ा रहता है।” 7:41 अकबर बोले— “शाबाश! अच्छा, 

दूसरा सवाल। ऐसा कौन-सा प्राणी है जो सोता है, लेकिन आँखें खुली रखता है, और जिधर का बहाव होता है, उधर ही चलता है?” 7:47 बीरबल ने कहा— “वह मछली है। 7:56 अकबर ने आगे पूछा— “तुम कितने वर्ष के हो?” बीरबल बोले— “मेरे 14 वर्ष पूरे हुए हैं, पंद्रहवाँ अभी शुरू हुआ है।” 8:02 अकबर बोले— “फिर तुम्हारी ऊँचाई और शरीर पहलवानों जैसा कैसे है?” बीरबल ने उत्तर दिया— “हमने गुरुजी से दीक्षा ली थी। गुरुजी ने बताया था— तीन बिल्ली के पत्ते और एक काली मिर्च चबाकर पानी पियो और फुल करो, इससे ऊँचाई बढ़ेगी health । ऊँचाई बढ़ गई। भोजन के बाद टमाटर का जूस अथवा केला या सेब खाया करो, शरीर हृष्ट-पुष्ट होगा।” 8:22 अकबर ने कहा— “वास्तव में, कोई सोच भी नहीं सकता कि तुम्हारे केवल 14 वर्ष पूरे हुए हैं। तुम तो 22 वर्ष के युवक लगते हो। शाबाश, बीरबल! 8:33 फिर अकबर बोले— “एक बात और— जो झुककर बैठते हैं, वे दब्बू मन के होते हैं। कमर सीधी और गर्दन सीधी रखने से बुद्धि प्रखर होती है। 8:40 अकबर ने 

तीसरा प्रश्न किया

 “ऐसा कौन-सा पुरुष है जो 360 कदम चलता है, फिर वहीं से शुरू करता है, 12-12 करवटें लेता है, फिर वहीं से करवट लेना शुरू करता है, तीन-तीन अवस्थाएँ करता है और छह-छह अंगड़ाइयाँ लेता है? 9:00बीरबल ने उत्तर दिया— “जहाँपनाह, वह कालचक्र है। 360 दिन घूमकर फिर वहीं से शुरू होता है। 12-12 महीने होते हैं— जनवरी, फरवरी आदि। फिर तीन मौसम— गर्मी, सर्दी और वर्षा। और छह ऋतुएँ— यही कालचक्र है। 9:13 अकबर ने प्रसन्न होकर कहा— “कालदेवता तुम्हारी रक्षा करें। चिरंजीवी भव! बीरबल, तुमने तो मुझे कर्जदार बना दिया। 9:24 अब मैं तुम्हारा यह कर्ज कैसे चुकाऊँ? मैं तुम्हें मंत्री पद देता हूँ। स्वीकार है?” बीरबल बोले— “कोई बात नहीं। 9:29 इस प्रकार बीरबल ने मंत्री पद संभाला। जैसे पाँच वर्ष का बालक ड्राइविंग पद संभाला , ऐसे   ही   सरस्वती मंत्र के बल पर बीरबल ने सहज रूप से मंत्री पद संभाल लिया।


  बेगम की साज़िश और बीरबल की सूझबूझ

9:43 जब बीरबल उन्नीस वर्ष का हुआ, तो सभी मंत्रियों ने मिलकर एक साज़िश रची कि किसी भी तरह बीरबल को दरबार से हटाया जाए। उन्होंने बेगम के भाई को प्रलोभन दिया कि यदि बीरबल को हटवा दिया गया, तो उसी की जगह वह मुख्यमंत्री के पद पर शोभायमान होगा।

9:58 मंत्रियों ने कहा— “तुम अपनी बहन बेगम पर स्नेह डालो। अकबर बेगम की बात बहुत मानते हैं। बेगम से कहलवाओ कि बीरबल को हटा दिया जाए।” बेगम लगातार अकबर से कहने लगी— “बीरबल को हटाइए, बीरबल को हटाइए। 10:18 अकबर ने समझाया— “बुद्धिमान और लोकप्रिय मंत्री को हटाने से क्या लाभ? ऐसे मंत्री को हटाकर समाज से बैर मोल लेना उचित नहीं। यदि बीरबल में कोई दोष हो तो बताओ। 10:42
यह सुनकर बेगम ने नाटक रचा। उसने अपने बाल बिखेर दिए, श्रृंगार अस्त-व्यस्त कर दिया, खाट उलट दी और रूठकर बैठ गई। 10:56 अकबर ने पूछा— “यह क्या हो रहा है?” बेगम बोली— “मैं रूठी हुई हूँ। जब तक बीरबल को नहीं हटाओगे, मैं नहीं मानूँगी। 11:02 बेगम ने शर्त रखी— “बीरबल को आदेश दो की बेगम को राजदरबार में बुलाओ। औरतें राजदरबार में नहीं आतीं, इसलिए मैं नहीं आऊँगी। बीरबल को कह देना कि तुम्हारी छुट्टी हो गई, तुम अपने काम में विफल रहे।”

11:12 अकबर बोले— “तुम्हारी साज़िश बड़ी ज़ोरदार है, लेकिन बीरबल पक्के गुरु का चेला है। सरस्वती मंत्र से उसकी बुद्धि खुली है। कहीं यह साज़िश भारी न पड़ जाए।” बेगम अड़ी रही— “मैं आने वाली नहीं हूँ। 11:33
अकबर ने राजदरबार में बीरबल को बुलाया और कहा— “आज एक विशेष काम है। यदि तुम इसमें असफल हुए, तो तुम मंत्री पद के योग्य नहीं माने जाओगे। 

11:46 बीरबल ने कहा— “जहाँपनाह, आज्ञा कीजिए।” अकबर बोले— “बेगम रूठ गई है। लाख उपायों पर भी नहीं मान रही। तुम किसी तरह उसे समझाकर यहाँ हाज़िर करो। 12:01 बीरबल ने सरस्वती मंत्र का स्मरण किया। वह सोचने लगा— “बेगम को किसी पुरुष द्वारा राजदरबार में बुलवाना अवश्य किसी साज़िश का परिणाम है।” उसने गुरु-मंत्र का जप किया, ध्यान किया और सारा रहस्य समझ में आ गया।

12:16 बीरबल दास-दासियों के पास गया और सारी बात जान ली। उसने उनसे कहा— “मैं बेगम के पास जाऊँगा। एक-दो मिनट बाद तुम शोर मचाते हुए आना और यह-यह बातें कहना। 12:42
बीरबल बेगम के पास पहुँचा। बेगम ने उसे देखते ही कहा— “क्यों मुँह लटकाए बैठे हो?”
बीरबल बोला— “बेगम साहिबा, सलाम वालेकुम।”

13:07 बीरबल ने कहा— “जहाँपनाह आपको याद कर रहे हैं। आपके बिना राजदरबार में मायूसी छाई है। कृपया तशरीफ़ लाइए। 13:19 उसी समय दास-दासियाँ शोर मचाते हुए आईं— “बीरबल! जहाँपनाह तुम्हें बुला रहे हैं। अफगानिस्तान की शहजादी अत्यंत सुंदर और बुद्धिमान है। यदि उससे निकाह नहीं हुआ, तो जहाँपनाह जीवित नहीं रह पाएँगे। 13:37 इस बेगम को छोड़ो। यह तो तुम्हारा पत्ता काटने वाली है। वह शहजादी न किसी मंत्री का पत्ता काटेगी, न भाई के कहने में आकर अपनी कब्र खोदेगी।”

14:07 इतना सुनते ही बेगम घबरा गई। वह बोली— “बीरबल! वह अफगानिस्तान की शहजादी कौन है? उसे क्यों लाओगे? फिर मैं कैसे जीऊँगी? 14:32 अल्लाह के नाम पर, बीरबल! जहाँपनाह की वहाँ शादी मत करवाना, नहीं तो मैं मर जाऊँगी। 14:45 बीरबल ने कहा— “जहाँपनाह की इजाज़त है, मैं तो जा रहा हूँ।” बेगम घबरा गई। वह उठ खड़ी हुई और बीरबल के पीछे-पीछे चल पड़ी।

15:11 जो बेगम कभी कालीन से नीचे पैर नहीं रखती थी, वह नंगे पैर बीरबल के पीछे चलने लगी। देखने वाले दंग रह गए 15:35 चलते-चलते बीरबल राजदरबार पहुँचा। अकबर ने कहा— “बेगम को नहीं लाए? तो तुम्हारी छुट्टी समझो। 15:47 बीरबल बोला— “जहाँपनाह, धैर्य रखिए। द्वार की ओर देखिए।” उसी समय बेगम दौड़ती हुई अंदर आई और चिल्लाने लगी— “अफगानिस्तान की शहजादी को मत लाओ। पहले मेरा गला घोंट दो।”

16:09 अकबर ने आश्चर्य से पूछा— “यह क्या कर रही हो?” बेगम बोली— “अगर वह शहजादी आई, तो मैं ग़मों की खाई में गिरकर मर जाऊँगी। 16:20 अकबर ने कहा— “कौन-सी अफगानिस्तान की शहजादी?” तब बीरबल बोला— “जहाँपनाह, बात वही है— काँटे से काँटा निकाला जाता है। यह पूरी साज़िश थी, और प्रभु की प्रेरणा से इसका समाधान भी हो गया।”

16:33 अकबर ने बेगम से पूछा— “तुम तो कह रही थीं कि नहीं आओगी, फिर कैसे आ गईं? बेगम बोली— “ऐसा-ऐसा हुआ था…” इस प्रकार बीरबल की सूझबूझ से साज़िश विफल हो गई और सत्य प्रकट हो गया।

 बीरबल तेरी बुद्धि को आरीन है तेरे सारसत्य मंत्र के चमत्कार को दुनिया गाएगी।  तो बच्चों का भी भला होगा बड़ों का भी भला होगा।  सरस्वती मंत्र लो बच्चे रटा रटी तो करो लेकिन सरस्वती मंत्र से आध्यात्मिक बल जगाओ। 


माधवाचार्य स्वामी और गायत्री अनुष्ठान (माधव निदानम्)

17:00 एक बाबा थे जो वृन्दावन में रहते थे। वे गायत्री मंत्र का अनुष्ठान करते थे। एक वर्ष, दो वर्ष, तीन वर्ष बीत गए, यहाँ तक कि बारह वर्ष पूरे हो गए। 17:11 तेरह वर्ष बीत जाने पर भी बाबा को लगा कि कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। न कोई चमत्कार दिखाई दिया, न कोई अद्भुत अनुभव हुआ। वे सोचने लगे— अब क्या किया जाए?

17:27 उस बाबा का नाम था माधवाचार्य स्वामी। तेरह वर्षों के गायत्री अनुष्ठान के बाद भी कोई विशेष अनुभूति न होने से वे व्याकुल हो उठे। 17:34 किसी ने उन्हें सलाह दी— “आप वाराणसी चले जाइए।” माधवाचार्य स्वामी वाराणसी आए और वहाँ साधु-संतों के बीच घूमते-घूमते एक अघोरी बाबा के पास पहुँच गए। 17:57 अघोरी बाबा ने उनसे कहा— “तुम यह गायत्री-वायत्री छोड़ दो। मैं तुम्हें मंत्र देता हूँ।” फिर उन्होंने शिव महिमा स्तोत्र का श्लोक सुनाया।

अघोरा नाम परो मंत्रो
महेश नाम परो देवो
महिमो नाम परास्तुति
नास्त तत्वं गुरुः परम्॥

18:21 अघोरी बाबा ने कहा— “मैं तुम्हें मंत्र देता हूँ। एक महीने के भीतर तुम्हारे सामने चमत्कार हो जाएगा।” माधवाचार्य स्वामी ने अघोरी का मंत्र ग्रहण कर लिया। 18:36 एक महीना पूरा हुआ। एक आवाज़ आई— “मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। वरदान माँग लो।” माधवाचार्य स्वामी बोले— “आप कौन हैं? कृपया सामने प्रकट होकर दर्शन दीजिए, तब मैं वरदान माँगूँगा।” 18:55 उत्तर मिला— “तुमने तेरह वर्ष गायत्री मंत्र का जप किया है। जो भी भगवान के नाम का जप करता है, उसके मुख-मंडल पर एक आध्यात्मिक आभा छा जाती है। वह आभा स्थूल आँखों से नहीं दिखती, पर आदिदैविक जगत में उसका प्रभाव पड़ता है।19:19 उसी प्रभाव के कारण हम सामने प्रकट नहीं हो सकते। गायत्री मंत्र के तेज से हमारा प्राकट्य संभव नहीं है। imp

19:31 तब माधवाचार्य स्वामी ने प्रश्न किया— यदि हमने तेरह वर्ष गायत्री जप किया, तो हमें कोई चमत्कार या विशेष अनुभव क्यों नहीं हुआ? 19:44 उत्तर मिला— “जब तक तुम गायत्री मंत्र का जप कर रहे थे, तब तक वह तुम्हारे पूर्व जन्मों के प्रारब्ध, दुष्कृत और पापों को काट रहा था। 19:56 जब ध्यान करते समय कोई विशेष अनुभव न भी हो, तब भी साधना बंद नहीं करनी चाहिए। क्योंकि उस समय मंत्र तुम्हारे अंतःकरण की मलिनता को दूर करता है, पाप-राशि और दोष-राशि को नष्ट करता है। IMP 20:03 जब अंतःकरण की शुद्धि हो जाती है, तब मंत्र का देवता और मंत्र की दिव्यता प्रकट होती है।

20:18 अब तुम वृन्दावन जाकर पुनः साधना आरंभ करो। कुछ समय में तुम्हें मंत्र-शक्ति का प्रकाश, ज्ञान और दिव्य प्रेरणा प्राप्त होगी। 20:26 माधवाचार्य स्वामी वाराणसी छोड़कर वृन्दावन चले गए। वहाँ उन्हें अंतर-प्रेरणा होने लगी। उन्हें जड़ी-बूटियों का गूढ़ ज्ञान प्राप्त हुआ। 20:40 उसी दिव्य प्रेरणा के फलस्वरूप उन्होंने आयुर्वेद का एक महान ग्रंथ लिखा— माधव निदानम् 20:47 माधव निदानम् आयुर्वेद का एक अत्यंत प्रसिद्ध और प्रामाणिक ग्रंथ है, जो आज भी सम्मान और श्रद्धा के साथ पढ़ा जाता है।

   

  विद्यारण्य स्वामी और 23 अनुष्ठान (पंचदशी ग्रंथ) - story

20:58 ऐसे ही एक विद्वान वाराणसी में रहे— विद्यारण्य स्वामी। वे लगभग चौबीस वर्ष तक वहाँ रहे, फिर अपने गुजरात चले गए। 21:03 माता-पिता चाहते थे कि उनका विवाह हो जाए, पर वे अत्यंत गरीब और दरिद्र थे। दरिद्र कन्या की खोज होने लगी। तब विद्यारण्य स्वामी ने कहा— “माता, ठहरो। मैं गायत्री देवी का अनुष्ठान करता हूँ। छह महीने का पुरुष्चरण करूंगा। माता प्रकट होंगी और मैं संपत्तिवान होने का वरदान ले लूंगा। 21:23  एक अनुष्ठान किया, फिर दूसरा। माता प्रकट नहीं हुईं। फिर तीसरा, चौथा— करते-करते बारह वर्ष बीत गए और उन्होंने पूरे 23 अनुष्ठान कर डाले। 21:47 जो विद्यार्थी 24 वर्ष का था, वह अब 36 वर्ष का हो गया। इतने वर्षों की साधना के बाद उसके भीतर वैराग्य जाग उठा 21:53  छत्तीस वर्ष की अवस्था के बाद माता प्रकट हुईं और वरदान भी दिया। 12 वर्षों में 23 अनुष्ठान पूरे हो चुके थे।

22:06 अब विद्यारण्य स्वामी 36 वर्ष के हो चुके थे। उन्होंने सन्यास ले लिया। सन्यास लेकर जब वे पूर्व दिशा की ओर अभिमुख होकर अर्घ्य देने गए, तो दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ 22:12 माता की वाणी हुई— “अब क्या करना चाहते हो?  विद्यारण्य स्वामी बोले— “माँ, अब तो सन्यास योग है। अब किसी वरदान की आवश्यकता नहीं। भिक्षा कहीं भी मिल जाएगी, निवास कहीं भी हो जाएगा। 22:34  माता ने कहा— “विद्यारण्य, पीछे मुड़कर देखो। 22:40  पीछे देखने पर उन्होंने बड़े-बड़े, काले, विकराल, पर्वताकार भयंकर दृश्य देखे।

22:56 माता बोलीं— “ये तुम्हारी 23 ब्रह्म-हत्याएँ थीं, जो एक-एक पुरुष्चरण से समाप्त हुईं। अब तुमने सन्यास ले लिया है। अब तुम्हारा पुण्य प्रारंभ हो गया है। इसलिए बुलाते ही मैं प्रकट हो गई। 23:11  “अब तुम्हें विवाह नहीं करना है। तुम्हारी विद्या तुम्हें फलेगी। 23:19 विद्यारण्य स्वामी अत्यंत विद्वान और प्रसिद्ध हुए। उन्होंने पंचदशी नामक महान ग्रंथ की रचना की। 

bapuji ko sakshaatkaar

23:27 पंचदशी ग्रंथ के पाँच-पाँच अध्यायों के तीन भाग हैं। इसके सातवें प्रकरण को गुरुजी ने किसी को पढ़ने को दिया और मुझे संकेत किया।

शास्त्रीय वाक्य

सुन् किम् इच्छन् कः कामाय शरीरमनुस्मरन्।

23:44 उसकी व्याख्या सुनते-सुनते गुरु की कृपा ऐसी उतरी कि हमारा जीवत्व बाधित हो गया और ब्रह्मत्व, ब्राह्मी स्थिति प्राप्त होने लगी।

 

ना शेष गुरुवर कार्य रहे,
ना मोह कभी ठग सके।
इच्छा नहीं लव-लेश,
पूर्ण गुरु कृपा मिली।

24:22  गुरुवर का पूर्ण ज्ञान मिला। आँखें आँसुओं से भर गईं। साईं आसाराम। 24:33
तो आपके काशी के विद्यार्थी ने अनुष्ठान किए और विद्यारण्य स्वामी बने। यह सिद्ध होता है कि जप और अनुष्ठान कभी व्यर्थ नहीं जाते, और न ही साधना निष्फल होती है।

जप और अनुष्ठान कभी व्यर्थ नहीं जाते


24:40 यदि लाभ मुझे मिला है, तो आप भी जो जप-तप, पूजा-पाठ करते हैं, उसमें धैर्य रखें। साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती। 24:49  जिस प्रकार मनुष्य छिपकर किए गए अशुभ कर्म भी बिना फल दिए नहीं छोड़ते, उसी प्रकार जप, तप और ध्यान भी अपना फल अवश्य देते हैं। 25:03  इसलिए जप और ध्यान को महत्व, समझ और बुद्धि के साथ करें।

 

मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा,
पंचम भक्ति वेद प्रकाशा॥

25:11  मंत्र-जप और दृढ़ विश्वास— ये भक्ति का पाँचवाँ सोपान है। 25:18  मैं तुम्हें इस युग में घर बैठे सिद्धियाँ, सफलता और महान अनुभूतियाँ प्राप्त हों— ऐसी साधना बता सकता हूँ।


बापूजी का 40 दिन का दूध पर अनुष्ठान और अनुभव


25:31 मैंने एक बार केवल दूध पर चालीस दिन का अनुष्ठान किया। सुबह किसी भक्त की ड्यूटी लगा दी थी। वह थर्मस में दूध रखकर चला जाता था। 25:40  मैंने मौन रखा था। थर्मस में दूध रख लेता था। जब भी भूख लगती, तो एक पाव दूध पी लेता था। 25:46  दूध पीने के बाद आधे घंटे तक ध्यान नहीं करना चाहिए। उस समय शास्त्र पढ़ो, थोड़ा आराम करो, जप करो, फिर ध्यान में बैठो। 26:00  दिन में दो-तीन लीटर, जितना आवश्यक लगता था, उतना दूध पी लेता था। इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। 26:05  केवल जप करो, ध्यान करो। ध्यान के बाद जप, जप के बाद ध्यान। शास्त्र पढ़ो, किसी से मिलो नहीं। 26:12  सैंतीसवें दिन मुझे ऐसी-ऐसी अनुभूतियाँ हुईं और ऐसे आध्यात्मिक खज़ानों की कुंजियाँ मिलीं कि पिछले चालीस–बयालीस वर्षों से मैं उन्हें बाँट रहा हूँ। आज तक उनमें कोई कमी नहीं आई।

26:30  यदि आप लोग केवल मेरा भाषण सुनने के लिए आए होते, तो इतने लोग इकट्ठे नहीं होते। 26:37
यह ईश्वर की प्रसाद-कृपा है। जब हम दृष्टि डालते हैं, तो आप लोगों का मन पवित्र होने लगता है। आप बैठते हैं, तसल्ली होती है और आपको लाभ होने लगता है। 26:51  स्वामी विवेकानंद कहा करते थे— लोग आपकी लचकीली भाषा के लिए नहीं बैठते। 26:58 आपकी वाणी के पीछे आपकी साधना, एकाग्रता, उपासना और तपस्या होती है। तभी लोग बैठते हैं, तभी वाणी प्रभावशाली बनती है।

कबीर जी और काशी के पंडितों का संवाद

27:05  काशी पंडितों का गढ़ मानी जाती थी। उस समय पंडिताई का बहुत बड़ा प्रभाव था और पंडितों का समाज में विशेष वर्चस्व था। 27:13  कुछ पंडितों ने कबीर जी को घेर लिया और कहा— “हम में कोई न्यायाचार्य है, कोई सांख्य का ज्ञाता है, कोई वेदांत का विद्वान है, कोई षड्दर्शनाचार्य है। हम प्रवचन और भाषण करते हैं, पर मुश्किल से पचास लोग इकट्ठे होते हैं।” 27:29 उनमें से भी कोई उठता है, कोई आता है, कोई बैठता है, कोई चला जाता है। पचास, सौ, दो सौ लोग भी हमारी कथा में बड़ी मुश्किल से आते हैं और उसमें भी ‘आया राम, गया राम’ चलता रहता है। 27:46 लेकिन तुम्हारे पास जो आते हैं, वे टिक जाते हैं। काशी नरेश राजा वीर सिंह बघेला तक को हमने समझाया था, फिर भी अंत में वह तुम्हें गुरु मानकर राजपाट छोड़कर तुम्हारी सेवा में लग गया। तुम्हारे पास ऐसा क्या है?”

28:09  कबीर जी ने कहा— “पंडितों, बुरा मत मानना। आप जो बोलते हैं, वह काग़ज़ में लिखा हुआ, शास्त्रों का रटा-रटाया ज्ञान है। 28:21 और मैं जो बोलता हूँ, वह आत्मा–परमात्मा की अनुभूति के झरने से बोलता हूँ। आपका पानी टंकी का है और मेरा पानी सीधा झरने से आता है। 28:29 कबीर जी ने निर्भीक होकर यह बात कह दी। काशी पंडितों का गढ़ था और वहाँ अकेले कबीर गूँज रहे थे।

पंडित वाद-वदंती झूठा, राम-राम सब कोय।
कहे जो राम मिले, मिश्री कहे होय, मुँह मीठा होय॥

28:56 कबीर जी की ऐसी वाणी से कई पंडित और भी नाराज़ हो गए। विरोध खूब हुआ, टकराव भी चला। 29:04  फिर भी यह सत्य है कि पंडित हों या कबीर जी— दोनों के प्रति कृतज्ञता बनती है। क्योंकि इस वैचारिक टकराव से साधकों को भगवत्-प्राप्ति के मार्ग पर सोचने और समझने का अवसर मिला। 29:12  पंडित और कबीर आमने-सामने आए, पर अंततः यह संघर्ष भी साधकों के लिए शुभ ही सिद्ध हुआ।


लड्डू फेंकने का दृष्टांत

29:23 कल्पना करो— यह घटना वास्तविक भी हो सकती है या केवल दृष्टांत भी 29:30 बाज़ार में आमने-सामने दुकानों की कतारें होती हैं। बीच में रास्ता और दोनों ओर दुकानें। मान लो, आमने-सामने दो मिठाई की दुकानें थीं। 29:36  एक दुकानदार दूसरे के ग्राहकों को इशारों से बुलाने लगा। दूसरा भी वैसा ही करने लगा। धीरे-धीरे बात बढ़ी और दोनों आपस में भिड़ गए।

29:42
“तू मेरे ग्राहक क्यों बुलाता है?”
“तेरे बाप को बुलाया है क्या?”
“वो तेरा बाप था!”
“तू क्या समझता है?”
“तू क्या समझता है?”

29:59 बात हाथापाई तक पहुँच गई। जोश में आकर एक ने अपनी दुकान से लड्डू उठाकर फेंक दिया। 30:06  दूसरे ने भी जवाब में लड्डू फेंकने शुरू कर दिए। कुछ लड्डू दुकानों पर लगे, कुछ रास्ते में गिरे। 30:12  रास्ते से आने-जाने वाले यात्री, भिखारी, गायें— सबको प्रसाद मिल गया। लोग बोले— “भाई, तुम खूब फेंको! 30:19  लड्डू खत्म हुए तो बालूशाही, फिर मावे की मिठाइयाँ, रसगुल्ले, बर्फी— एक-दूसरे पर चलने लगीं। 30:25  वे दोनों तो एक-दूसरे पर मारते रहे— लगे या न लगे— लेकिन राहगीरों के लिए तो आनंद ही आनंद हो गया।

30:32 ऐसे ही कबीर और पंडितों के तीर— वाणी और तर्क— एक-दूसरे को लगें या न लगें, पर काशी के भक्तों के लिए तो मौज हो गई। 30:39  इस वैचारिक संघर्ष से साधकों को रस मिला, समझ मिली और भक्ति का स्वाद बढ़ा।

सर्दी-जुकाम मिटाने का प्राणायाम प्रयोग

30:52 अब एक छोटा-सा प्रयोग समझो।  30:58  जब तेज सर्दी होती है, तो लोग दवाइयाँ ले लेते हैं। सर्दी दब जाती है, जड़ से समाप्त नहीं होती। 31:06  कफ सूख जाता है, फिर आगे चलकर कहीं जमा होकर ब्लॉकेज, गाँठ या अन्य रोगों का कारण बन सकता है। 31:14 सर्दी मिटाने के लिए अंग्रेजी दवा आवश्यक नहीं— एक सरल प्राणायाम प्रयोग करो।

प्राणायाम विधि

31:22

  1. कमर सीधी, गर्दन सीधी रखें।

  2. दाहिने नथुने से श्वास लें।

31:30
3. श्वास रोकें और मन में “रम-रम-रम” या “ॐ-ॐ” का जप करें।
– जिसे प्रणव प्रिय हो, वह “ॐ” जपे।
– अन्यथा अग्नि देवता का “रम-रम” जप करे।

31:47
4. श्वास को 20 सेकंड से सवा मिनट तक रोकें।
– जप निरंतर चलता रहे।

32:00
5. श्वास रोके रखते समय पेट को थोड़ा अंदर खींचें।
6. मूल स्थान (संकोचन) हल्का-सा करें— इससे रोग और वासना नाश की शक्ति बढ़ती है।

32:16
7. लगभग 40 सेकंड के बाद भी श्वास रोके रखें— “लगे दम, मिटे गम।”

32:27
8. सवा मिनट या जितना सहज हो, श्वास रोकने के बाद—

32:44
9. बाएँ नथुने से धीरे-धीरे श्वास छोड़ दें।

32:55 ऐसा चार–पाँच बार करें। 33:03  कैसी भी सर्दी हो— उसी दिन कम होनी शुरू हो जाती है और कफ से जुड़ी गड़बड़ियाँ शांत होने लगती हैं।

33:11



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