रविवार, 28 दिसंबर 2025

तू प्रार्थना करके तो देख… कृपा बरसेगी

 


00:00 संकीर्तन और मंगलाचरण

01:29 भजन: हरि सम जग कछु वस्तु नहीं

05:38 भगवान की भक्ति और प्रार्थना क्यों जरूरी है?

07:18 माँ और भगवान की करुणा की तुलना

09:12 भगवान की कृपा को खींचने का तरीका (बिल्लौरी कांच का उदाहरण)

10:46 श्रद्धा का महत्त्व (गंगा जल का उदाहरण)

12:35 गांधी जी के पुत्र मणिलाल की बीमारी और प्रार्थना का चमत्कार

14:35 स्वास्थ्य सावधानी: कैप्सूल और खड़े होकर भोजन करने के नुकसान

17:45 1956 मद्रास का सूखा और राजगोपालाचारी की प्रार्थना

23:07 तुलसीदास जी की विनती: मम हृदय भवन प्रभु तोरा

27:02 भगवान कहाँ रहते हैं? (नारद जी से संवाद)

30:38 राजा जनक और पाराशर मुनि का संवाद

33:17 क्षमा और प्रशंसा से शत्रुओं और परिवार को जीतने की कला

37:18 मंत्र जप के प्रकार और उनका प्रभाव (उपांशु और मानस जप)

 0:03 संकीर्तन ओम नमो भगवते वासुदेवाय।
ओम नमो भगवते वासुदेवाय।
वासुदेवाय, वासुदेवाय—आत्म देवाय।
आत्म देवाय, माधुर्य देवाय, प्रभु देवाय।
प्रभु देवाय, प्रीति देवाय, भक्ति देवाय।
भक्ति देवाय, मुक्ति देवाय, मम देवाय।
मम देवाय—ओम नमो भगवते वासुदेवाय।

0:53 नाम-स्मरण का महात्म्य

जब नाम हृदय धरो, भयो पाप को नाश।
भयो पाप को नाश, जैसे चिनगी आग की,
जैसे चिनगी आग की पड़ी पुराने घास। , हरि हरि ओम।

1:34 भजन — हरि सम जग कछु वस्तु नहीं

हरि सम जग कछु वस्तु नहीं,
कछु वस्तु नहीं।
प्रेम पंथ सम, सतगुरु सम सज्जन नहीं।
सतगुरु सम सज्जन नहीं, गीता सम नहीं ग्रंथ।

तो क्या करोगे भला—हरि हरि ओम।

2:11 जीवन की क्षणभंगुरता और विवेक

क्या करिए, क्या जोड़िए?
थोड़े जीवन का काज।
छोड़-छोड़ सब जात है,
ले ग धनराज।

2:38 हरि-भजन का उपदेश

आड़वड़ा हरि भजन कर,
बड़ा हरि भजन कर।
द्रव्य बढ़ा, कछु दे;
अकल बड़ी, उपकार कर।

जीवन का फल—हरि हरि ओम।

3:28 संसार की असारता

राम गयो, रावण गयो,
ताको बहु परिवार।
कहना कथिर कछु नहीं,
स्वप्ने जो संसार। हरि हरि।

4:09 गुरु-शरण और विनती

फिरत-फिरत प्रभु आइयो,
परोत्तम शरण आए।
नानक की प्रभु विनती—
तू अपनी भक्ति लाए।

4:37 अपनी अज्ञानता की स्वीकारोक्ति

ज्ञान, ध्यान, कुछ कर्म न जाना।
सार न जानूं तेरी, हार न जानूं तेरी।
सबसे बड़ा मेरा सतगुरु।

5:00 गुरु-कृपा और प्रार्थना

कल विच राखी, मेरी विच राखी।
ले कदम न छूटिया।
खिनक न फूलनहार, दिन पूरनहार।
बक्षनहारा बख्श ले,
गुरु पार उतारणहार।

5:36 चिंतन का सूत्र

भगवान की भक्ति हम क्यों करते हैं?
प्रार्थना क्यों करते हैं?
सत्संग क्यों करते हैं?
कर्म का फल—कर्म का फल अगर भगवान…

5:43 भगवान की भक्ति और प्रार्थना क्यों आवश्यक है

देने तो भगवान वैसे भी देते हैं, फिर भगवान की भक्ति करने की क्या आवश्यकता है?
भगवान हमारे कर्मों और उनके फलों को देखे बिना अपनी करुणा, कृपा और उदारता से हमें गले लगा लें—ऐसा क्यों नहीं होता?

इसलिए हम भगवान के नाम का, भक्ति का, प्रीति का और सत्संग का आश्रय लेते हैं।

6:12 भगवान की सत्ता और परिभाषा

भगवान उसे कहते हैं जिसकी सत्ता से हमारा भरण-पोषण होता है, जो गमनागमन की सत्ता देता है, जो वाणी—वैखरी—की सत्ता देता है।
और यह सब होने के बाद भी, जो हमारा साथ नहीं छोड़ता, जो हमारे दोषों को नहीं देखता और अपनी उदारता बरसाने में देर नहीं करता—वही परमेश्वर भगवान है।

उसी के नाम से हमारा चित्त पावन होता है, मति में प्रकाश होता है, मन में सौम्यता आती है।
दिल में भाईचारा आता है, व्यवहार में मधुरता आती है, वाणी में प्रीति और पवित्रता आती है।

6:52 केवल सांसारिक जीवन पर्याप्त क्यों नहीं

नहीं तो भगवान की क्या आवश्यकता है?
कमाते, खाते, सुख-दुख भोगते और मर जाते।

लेकिन भगवान की इसलिए आवश्यकता है कि जीव की जो मांग है, वही भगवान है।
जो रसमय है—कौन रस नहीं चाहता?
जो प्रेममय है, जो करुणामय है, जो हमारे दोषों को न देखे।

7:15 माँ और भगवान की करुणा की तुलना

माँ का मतलब क्या है?
यह नहीं कि हम जो करें उसका फल दे।
माँ का मतलब है—हम कैसे भी हों, मैले हों, बुद्धू हों या होशियार हों—हमारी पुकार मात्र से भागी-भागी चली आए।

माँ हमारे ऐब नहीं देखती, हमारी गंदगी और मैलापन नहीं देखती, फिर भी हमें अपना बना लेती है और हमारा ख्याल रखती है।  उसी का नाम माँ है।

7:43 भगवान की करुणा की महिमा

ऐसी हजारों-लाखों माताओं और लाखों दयालु लोगों को करोड़ों में जोड़ दो, तब भी भगवान शब्द की महिमा पूरी नहीं होती।

ऐसे भगवान करुणामय हैं, प्रीतिमय हैं, सुख-स्वरूप हैं, समर्थ हैं।

8:06 शिशु, माँ और भगवान का संबंध

शिशु को यह पता नहीं होता कि उसका भला किसमें है।
बालक में इतनी सूझ-बूझ नहीं होती कि वह अपना भला स्वयं कर सके।

अपने भले की जितनी जानकारी माँ को होती है, उतनी बच्चे को नहीं होती।
और अपने भले का जितना सामर्थ्य माँ में होता है, उतना बच्चे में नहीं होता।

8:19 भगवान सर्वहितैषी हैं

ऐसे ही हमारे भगवान—प्राणी मात्र के हितैषी हैं।
भगवान हमारा जितना भला जानते हैं, उतना हम स्वयं नहीं जानते।
भगवान हमारा जितना भला कर सकते हैं, उतना हमें पता ही नहीं है।

8:33 भगवान का स्वरूप

भगवान सत्-स्वरूप हैं।
भगवान चेतन-स्वरूप हैं।
भगवान सर्वसमर्थ हैं।
भगवान सर्वअंतर्यामी हैं।
भगवान सर्वकर्मों के द्रष्टा हैं।
भगवान कर्म के फलदाता हैं, कर्म के नियामक हैं।
भगवान परम दयालु हैं।

8:56 विशेष कृपा का रहस्य

यदि भगवान सभी पर समान रूप से ज्यों-का-त्यों दया करते चले जाएँ, तो सृष्टि की व्यवस्था-लीला टूट जाती है।

इसलिए जो उनका सुमिरन करता है,
जो उनका सत्संग करता है,
जो उनकी शरण जाता है,
जो उनसे प्रीति करता है—
उसे विशेष दया प्राप्त होती है।


9:15 भगवान की कृपा को खींचने का तरीका — बिल्लौरी काँच का उदाहरण

जैसे सूर्य सामान्य रूप से सबको प्रकाश देता है। पत्थर पर भी प्रकाश पड़ता है, लेकिन पत्थर कुछ नहीं करता। आईने पर प्रकाश पड़ता है तो वह परावर्तित प्रतिबिंब पैदा करता है। और बिल्लौरी काँच पर पड़ा हुआ प्रकाश तो सूर्य की दाहक शक्ति तक खींच ले आता है। सूर्य तो सामान्य रूप से सबको प्रकाश देता है।  ऐसे ही भगवान भी सब पर सामान्य रूप से दया करते हैं, लेकिन जो उसका सुमिरन करता है, चिंतन करता है, ध्यान करता है—उसके पास भगवान की करुणा और कृपा विशेष रूप से प्रकट होती है।

9:44 क्या भगवान पक्षपात करते हैं?

अगर भगवान किसी व्यक्ति पर अधिक दया करें और किसी पर कम करें, तो भगवान में भी नेताओं जैसा दोष आ जाएगा। अपने चमचों के भगवान जय राम जी—भगवान ऐसे नहीं हैं। भगवान भक्तों पर ही दया करते हों, ऐसा नहीं है।  दया तो सामान्य रूप से सब पर है।  लेकिन जैसे सूर्य का प्रकाश सब जगह समान है, फिर भी बिल्लौरी काँच उस प्रकाश को अधिक खींच लेता है—  वैसे ही जो भक्ति और सुमिरन करता है, वह भगवान की दयालुता का लाभ अधिक उठाता है।

10:09 गंगा जल का उदाहरण — राग-द्वेष नहीं, पात्रता का अंतर

जैसे गंगा जी है— साधु-संत के लिए वही शीतल, पापनाशी जल है, गाय के लिए वही मधुर जल है। और शेर अगर गंगाजल पीने जाए, तो उसके लिए गंगा जहर नहीं बना देगी।  यह गंगा के बस की बात नहीं है। जब भगवान की बनाई हुई गंगा भी राग-द्वेष नहीं करती, तो भगवान राग-द्वेष क्यों करेंगे?

10:40 श्रद्धा का महत्त्व

शेर गंगाजल पिएगा तो उसकी प्यास बुझेगी, ठंडक मिलेगी,  लेकिन पुण्य तो भक्त भावना से पीने वाले को मिलेगा। गंगा हरा-पाप-नाशिनी है,  लेकिन जिसकी जैसी भावना होगी, उसे वैसा ही फल मिलेगा।

10:53 भावना-विहीन कर्म का फल

किसी को धक्का मारकर गंगा में स्नान करा दिया जाए, तो स्नान तो हो जाएगा, ठंडक भी मिल जाएगी,  लेकिन श्रद्धा-विहीन व्यक्ति को उतना पुण्य नहीं मिलेगा। गंगा तो वही की वही है।  अंतर भावना का है।

11:07 श्रद्धा का वैदिक प्रमाण

इसलिए वेद में कहा गया है—

श्रद्धा पूर्वा सर्वधर्मा, मनोरथा फलप्रदा।
श्रद्धया साध्यते सर्वं, श्रद्धया तृप्यते हरिः॥

श्रद्धा सारे धर्मों और कर्मों का मूल है।

11:29 श्रद्धा का प्रभाव

श्रद्धा जिसके हृदय में होती है,  वह उसे रसमय बना देती है,  उत्साहमय बना देती है,  प्रेममय बना देती है। और भगवान की करुणा, कृपा, प्रेम और माधुर्य को आकर्षित करने की योग्यता निखार देती है।  वही श्रद्धा देवी है।

11:49 शास्त्रों में श्रद्धा का स्थान

इसीलिए श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा—

श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।

श्रद्धावान व्यक्ति ही आत्मा और परमेश्वर-तत्व का ज्ञान प्राप्त कर सकता है।

अष्टावक्र संहिता में आता है— अष्टावक्र गुरु जनक से कहते हैं— “श्रद्धास्व तात, श्रद्धास्व।”

12:06 वेदों में श्रद्धा सूक्त

वेदों में श्रद्धा सूक्त अलग से है।  प्रातःकाल और संध्या में श्रद्धा देवी का आवाहन किया जाता है—  कि हे श्रद्धा देवी, हमारे हृदय में निवास करो।

12:19 श्रद्धा और बिल्लौरी काँच का संबंध

जैसे बिल्लौरी काँच सूर्य की शक्ति को खींच लेता है,  वैसे ही श्रद्धा भगवान की दयालुता,  भगवान की करुणा,  भगवान के प्रेम, भगवान के माधुर्य, भगवान की सांत्वना और भगवान के दैविक विधान को आकर्षित करती है।

12:33 गांधी जी के पुत्र मणिलाल की बीमारी — प्रार्थना का चमत्कार

मोहनलाल करमचंद गांधी के बेटे मणिलाल बहुत बीमार पड़ गए। यह उस समय की बात है जब गांधी जी बंबई में रहते थे। पारसी डॉक्टर इलाज करते-करते थक गया।  आखिर उसने कहा— मणिलाल जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहा है।

12:53 डॉक्टर और गांधी जी का संवाद

डॉक्टर ने कहा— कमज़ोर आदमी को दूध में अंडा डालकर पिलाना चाहिए। मणिलाल ने इंकार कर दिया।
गांधी जी भी नाराज़ हो गए। डॉक्टर ने कहा—
“मेरी बात मानो।” गांधी जी बोले—
“शरीर को ठीक करने के लिए हृदय और मन को बिगाड़ना,  कपड़े ठीक करने के लिए सिर कूटने जैसा है।”


13:19 अंतिम उपाय और श्रद्धा

डॉक्टर नाराज़ होकर चला गया— “फिर तुम देसी इलाज करो, ललाट पर मिट्टी रखो, ठंडे कपड़े के टुकड़े रखो।” गांधी जी सोच में पड़ गए—अब क्या करें?

13:39 गांधी जी की श्रद्धा और प्रार्थना

गांधी जी को भगवान राम के प्रति गहरी श्रद्धा थी।राम-नाम का जप करते हुए— राम राम राम नाम,
जपत मंगल दिशा दस। गांधी जी को स्मरण हुआ— एकांत में जाओ, शांत हो जाओ।

13:58 समर्पण की पराकाष्ठा

मुंबई के समुद्र तट पर एकांत में जाकर गांधी जी ने कस्तूरबा से कहा—“मणि का ध्यान रखना।” और मन में प्रार्थना की—  “हे प्रभु, शरीर से तो मणि मेरा बेटा है,  पर वास्तव में हर जीव तेरा ही बेटा है। अब यह तेरे हाथ में है।  तू चाहे तो इसे मृत्यु के मुख से बाहर निकाल सकता है।”

14:24 श्रद्धा का संकेत

मणिलाल को टाइफाइड हो गया था।  बीमारी बहुत उलझ गई थी।  अंग्रेजी दवाइयों, गोलियों और कैप्सूलों ने स्थिति और जटिल कर दी थी।

14:35 स्वास्थ्य सावधानी — कैप्सूल और खड़े होकर भोजन करने के नुकसान

कैप्सूल बनता है तो उसकी जो टोपी या कवर होता है, वह जिलेटिन का बनता है। यह जिलेटिन पशुओं की हड्डियों से बनाई जाती है। इसलिए किसी दुर्भाग्यवश कैप्सूल लेना पड़े तो कैप्सूल खोलकर उसका पाउडर फांक लेना चाहिए, लेकिन लाल-हरे रंग की टोपी सहित कैप्सूल निगलना नहीं चाहिए। इससे बुद्धि पर बुरा प्रभाव पड़ता है। अशुद्ध खुराक से बुद्धि, मन और पाचन तंत्र प्रभावित होता है

15:00 अशुद्ध भोजन के आधुनिक रूप

आजकल दुकानों में जो एकदम मोटी मलाई वाला दही मिलता है, उसमें भी पशुओं की हड्डियों से बनी जिलेटिन डाली जाती है। आइसक्रीम में जो स्मूदनेस आती है, वह भी जिलेटिन पाउडर के कारण आती है। आइसक्रीम खाने वालों को सावधान हो जाना चाहिए। थोड़ी देर की जीभ का मज़ा, लेकिन बुद्धि, मन और पाचन तंत्र को सदा के लिए खराब करने की गलती क्यों करें?

15:26 खड़े होकर भोजन करने का दुष्परिणाम

खड़े-खड़े भोजन करना पिशाच लोग करते थे। आजकल पार्टियों में फिर वही चलन आ गया है। याद रखना—खड़े-खड़े पानी पीना, खड़े-खड़े भोजन करना, यह पैरों की पिंडलियों के दर्द को बुलाना है। अभी जवानी में पता नहीं चलेगा, लेकिन 45-50 साल के बाद पिंडलियाँ और घुटनों के नीचे का हिस्सा दर्द करने लगेगा। इसलिए खड़े-खड़े भोजन करना, खड़े-खड़े पानी पीना, भोजन के साथ ठंडा पीना, भोजन के साथ आइसक्रीम खाना—यह सब स्वास्थ्य के लिए बुरा है।

16:07 सांसारिक भोग और आध्यात्मिक संदेश

ऐसे ही भगवान को भूलकर संसार से केवल मज़ा लेना भी अपने लिए बुरा है। अपने व्यवहार में भगवान की करुणा और कृपा को बुलाओ। मणिलाल की दयनीय स्थिति देखकर भगवान का चिंतन करते-करते प्रेरणा मिली और समुद्र किनारे गए। प्रार्थना करते-करते थोड़ी देर खो गए। जिससे मन उठता था, उसी के हो गए।

16:31 प्रार्थना का चमत्कार

वहाँ क्या हुआ? कर्तुं शक्यम्, अकर्तुं शक्यम्, अन्यथा कर्तुं शक्यम्—उस परमेश्वर ने अपनी करुणा बरसाई, कृपा बरसाई। मणिलाल को पसीना छूटा और वह सुस्ती से आगे उठ खड़ा हुआ। उसने पूछा—माँ-पिताजी कहाँ गए? बताया गया—बेटा, तेरी हालत गंभीर थी, भगवान से प्रार्थना करने गए थे। वह बोला—उनकी प्रार्थना फल गई है, मैं ठीक हो रहा हूँ।

16:59 गांधी जी का भाव

गांधी जी घर आए, उससे पहले ही बेटा मिलने आ रहा था। गांधी जी गदगद हो गए—“प्रभु, तेरी कैसी कृपा।” डॉक्टर रूठकर कह रहा था कि अब बेटा गया, लेकिन गांधी जी द्रवित होकर लिखते हैं—प्यास पानी पीने से न बुझे, ऐसा हो सकता है; भोजन करने से भूख न मिटे, ऐसा हो सकता है; लेकिन सच्चे हृदय से प्रार्थना करो और दुख न मिटे, ऐसा नहीं हो सकता। भगवान मदद न करे, ऐसा नहीं हो सकता।

17:43 1956 का मद्रास अकाल — राजगोपालाचार्य की प्रार्थना

1956 में मद्रास में अकाल पड़ा। रेड स्टोन लेक सूख गया। तब के मुख्यमंत्री राजगोपालाचार्य जनता को लेकर प्रार्थना करने लगे। प्रार्थना करते-करते वे उन पवित्र शब्दों के साथ स्वयं भी एकाकार हो गए—हमारे गुनाह, हमारी लापरवाही, हमारी शोषण वृत्ति से प्रकृति को पीड़ा पहुँची है। प्रभु, प्रजा को पानी हम नहीं दे सकते, पर तू अपनी दया करे तो हम संभल जाएँ।

18:25 करुणा की पुकार

हे देव, तेरी देह लीला है। देवों में तेरी सत्ता है, देवियों में तेरी सत्ता है और मनुष्य में तेरी सत्ता है। हे वरुण देव, हे इंद्र देव, हे आदि नारायण देव—हरि शरणम्। प्रार्थना करते-करते शब्द और हृदय एक हो गए और तनिक शांत हो गए।

18:58 दैवी चमत्कार

रात्रि को दस बजे बादल छा गए। लोगों ने कहा—ऐसा तो रोज़ होता है। लोग थके-माँदे थे, खा-पीकर सो गए। लेकिन फिर ऐसा बरसा, मुसलधार बरसा, बड़े-बड़े बूँदों से बरसा। न बारिश का मौसम था, फिर भी मेघ गरजे, बिजली चमकी और वर्षा हुई।

19:36 कृपा की पराकाष्ठा

सुबह होते-होते रेड स्टोन लेक छलक उठा। फिर भी बादल बरसते रहे—दोपहर, शाम, रात और दूसरे दिन सुबह तक। मद्रास की सड़कों पर सरकार को नाव चलानी पड़ी। लोग चकित रह गए। देने वाला देने पर आए तो लेने वाला थक जाए।

20:01 अंतिम उपदेश

वह इतना दयालु है। तू पुकार कर तो देख, प्रार्थना करके तो देख, उसकी करुणा में डूबकर तो देख। यह जो तुम यहाँ बैठे हो, यह न तुम्हारी अकल से है, न हमारी अकल से। कोई ऐसा भाव बना जो उस प्यारे को पसंद आ गया। उसी निमित्त हम उसकी चर्चा, उसका सत्संग, उसका सुमिरन कर पा रहे हैं। इसीलिए उस प्यारे ने हमें सत्संग की व्यवस्था दी है। यह उसकी कृपा है।

20:38 समापन — नानक वाणी

कहे नानक—सब तेरी बढ़ियाई है।
मेरे रब, हे प्रभु, सब तेरी मेहरबानी है।
तेरी कृपा मेरा कीता हो नहीं।
जो भावे सो बलीहार, तू सदा सलामत निरंकार।
मैं निर्गुण यार की बेनती तुम सुनो, गरीब नवाज़—
जो मैं पुत्र कपूत हूँ, तो पिता तेरी लाज।

 21:09 करुणामय प्रार्थना — विकारों से रक्षा की पुकार

सच्चे हृदय से प्रभु से प्रार्थना करो कि हमें तेरी प्रार्थना का प्रसाद मिल जाए, तेरी स्मृति मिल जाए, तेरी भक्ति मिल जाए, तभी इन विकारों से, धोखाधड़ी भरे संसार से, कलियुग के दोषों से तेरे बच्चे बच पाएँगे। मेरे प्रभु, हम तेरे नन्हे बालक हैं। इस माया की अटपटी चाल में हम घसीटे न चले जाएँ। मनुष्य जीवन मुक्ति के लिए मिला था, और वही खाने-पीने, संग्रह करने, भोगने, निंदा-चुगली करने और कुकर्मों में नष्ट हो रहा है। प्रभु, अब बची हुई मुट्ठी-भर ज़िंदगी है, अब तेरी कृपा के सहारे हमारी नैया का रुख बदल जाए।

22:04 दृष्टि बदली तो दिशा बदली

नज़रें बदलीं तो नज़ारे बदल गए। किश्ती ने बदला रुख तो किनारे बदल गए। जहाँ 84 लाख योनियों की ओर हम भटक रहे थे, यदि तेरा संत, तेरी भक्ति और तेरा नाम मिल जाए, तो हम मुक्ति के मार्ग से होते हुए तुझ तक पहुँच जाएँगे। मेरे प्रभु, मेरे देव, हे दयानिधि।

22:29 भगवान की सुलभता — इतिहास और भक्ति के उदाहरण

तू धनन्ना जाट के सामने प्रकट होने में संकोच नहीं करता। शबरी के बेर खाने में तुझे संकोच नहीं। राजकाज में डूबे जनक के हृदय में तू ब्रह्म-रूप से प्रकट हो सकता है। राजा अश्वपति के हृदय में तू प्रकट हो सकता है। मुगलों से घिरे, औरंगज़ेब की कूटनीति के शिकार बने शिवाजी के हृदय में गुरु-कृपा से तू प्रकट हो सकता है। तुलसीदास ने तो भगवान के गले पड़ने की रीत ही सिखा दी।

23:05 तुलसीदास की विनती — गले पड़ने की भक्ति

जैसे बच्चा माँ-बाप के गले पड़ जाता है और वे उसे गले लगा लेते हैं, वैसे ही तुलसीदास जी कहते हैं—

मम हृदय भवन प्रभु तोरा।
ताहि बसे आई बहु चोरा॥

यह मेरा हृदय तेरा भवन है, तेरा घर है, पर इसमें बहुत चोर घुस गए हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, चिंता, बेईमानी। मैं अकेला और असहाय हूँ। मैं पुकारता हूँ, पर बार-बार फिसल जाता हूँ।

मैं एकल अमित बटमारा।
को सुनत नाही मोर पुकारा॥

23:52 दीनता की पुकार और ईश्वर की लाज

रघुनायक, बेगी करो संभारा। प्रभु, जल्दी संभाल लो। मुझे भय होता है कि यदि मैं गिर गया, डूब गया, विकारों में फँस गया, तो अपयश तुम्हारा होगा। क्योंकि तुम्हारा बेटा यदि कामी-क्रोधी-लोभी होकर नरकों में जाए, तो पिता की इज़्ज़त का सवाल है। नाथ, अपनी इज़्ज़त का ख्याल करो और मेरा हाथ पकड़ो।

24:30 भक्ति-रस और विकारों से मुक्ति

तुलसीदास कहते हैं—प्रभु, तेरी भक्ति दे दे, तेरी कृपा दे दे। जब तक भक्ति का रस नहीं मिलता, तब तक विकारों से छुटकारा नहीं मिलता। जैसे-जैसे भीतर का सुख और रस मिलता है, वैसे-वैसे मनुष्य पाप के आकर्षण से बचता है, और जो पाप से बचता है, उसका रस और दृढ़ होता जाता है।

24:55 गिरना-उठना साधना का अंग

ऐसा कोई महापुरुष नहीं जो फिसल-फिसल कर उठा न हो। आज जिन्हें तुम पूज्य मानते हो, वे भी इसी मार्ग से गुज़रे हैं। जैसे तुम जी रहे हो, खा-पी रहे हो, वैसे ही उनकी भी यात्रा हुई है। इसलिए अपने को ज़्यादा कोसना नहीं, अपने को दीन-हीन मत मानना।

25:14 गृहस्थ और भगवान का संबंध

हम गृहस्थ हैं, हम संसारी हैं, लेकिन प्रभु ने संसारियों में ऐसी योग्यता भर दी है कि वे संसारी होकर भी संतों के माता-पिता बन जाते हैं। संसारी भगवान के सखा और संबंधी हो जाते हैं। संसारी भगवान के माता-पिता बन सकते हैं—इतना ऊँचा उठाकर रखा है प्रभु ने। वह कितना दयालु है।

25:44 प्रेम से आत्म-संस्कार

अपने को अहंकार से मत उभारो और दोषों से मत कोसो। अपने को प्रेम से उभारो। जप, ध्यान, भक्ति और सत्संग से अपने दिल को ऐसा पोसो कि दिलबर भीतर बैठा टकुर-टकुर निहारता हुआ प्रसन्न हो जाए।

26:00 अंतर्मुखी जागरण का भाव

चलो री सखी, वहाँ जाइए। ज़रा देखें—दिल के झरोखों से कौन झुरमुट-झुरमुट देख रहा है। अच्छा करते समय हिम्मत बढ़ाने वाला कौन है, और बुरा करते समय हृदय में ग्लानि देने वाला कौन है।

26:35 अंतर्बोध का भजनात्मक भाव

राम झरोखे बैठ के,
सबका मुजरा ले।
जैसी जिसकी चाकरी,
प्रभु तैसा फल दे॥

हरि ओम।

27:02 भगवान कहाँ रहते हैं — नारद संवाद

नारद जी से भगवान कहते हैं—

नाहं वसामि वैकुण्ठे,
योगिनां हृदये न च।
मद्भक्ता यत्र गायन्ति,
तत्र तिष्ठामि नारद॥

27:39 भक्ति जहाँ, भगवान वहाँ

हे नारद, मैं न सदा वैकुण्ठ में रहता हूँ, न सदा योगियों के हृदय में। जहाँ सूर्य होता है वहाँ प्रकाश होता है, जहाँ चंद्र होता है वहाँ चाँदनी होती है, जहाँ समुद्र होता है वहाँ लहरें होती हैं। और जहाँ संत-भक्त होते हैं, वहाँ मेरा सत्संग होता है। जहाँ मेरा सत्संग होता है, वहाँ मैं लोगों के हृदय में आनंद-रूप, ज्ञान-रूप, कृपा-रूप और माधुर्य-रूप से प्रकट होकर उनका मंगल करता हूँ।

मद्भक्ता यत्र गायन्ति,
तत्र तिष्ठामि नारद॥

भगवान की भक्ति, सत्संग और धर्माचरण का महत्व

28:26 एक-एक कदम चलकर ही कोई आता है। गाड़ी-मोटर बाहर रह जाती है, कुछ तो चलना ही पड़ता है। एक-एक कर्म का फल होता है। बैठते हो तो भक्ति-योग का फल मिलता है, सुनते हो तो ज्ञान-योग का फल मिलता है और सामूहिक कीर्तन करते हो तो दिव्य ध्वनि-कंपन उत्पन्न होते हैं।

28:38स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि यदि कोई पापों का पहाड़ लेकर भी आ जाए और उसे किसी महापुरुष के सत्संग के वातावरण में बैठा दिया जाए तो अहंकारी का अहंकार मिट जाता है, चिंतित की चिंता समाप्त हो जाती है, पापी के पाप और द्वेषी का द्वेष नष्ट हो जाता है। यही सत्संग की शक्ति है।

29:00 कबीर साहब सत्संग और गुरु की महिमा बताते हुए कहते हैं—

तीरथ नाए एक फल, संत मिले फल चार।
सतगुरु मिले अनंत फल, कहत कबीर विचार॥

29:09 यह शरीर कोई स्थायी वस्तु नहीं है। यह तो खाद बनाने की फैक्ट्री है। जो पच गया वह मल-मूत्र बन गया और जो नहीं पचा वह विष बन गया, रोग और विकार बन गया।

29:15 कबीर साहब कहते हैं—

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान।
शीश दिये जो सतगुरु मिले, तो भी सस्ता जान॥

29:29 यह शरीर कठोर और नश्वर है, पर इसके भीतर कर्म का प्रेरक, कर्म का नियामक और कर्म का फलदाता अंतर्यामी रूप से विराजमान है। यदि उसका सत्संग मिल जाए, उसकी स्मृति मिल जाए और साधना का मार्ग मिल जाए तो जीवन धन्य हो जाता है। 29:49 यह मत समझना कि ईश्वर-प्राप्ति कठिन है या किसी एक की बपौती है। ईश्वर किसी व्यक्ति विशेष की निजी संपत्ति नहीं है। ईश्वर सभी के हैं 30:00 हरि हरि ओम।

राजा जनक और पराशर मुनि का संवाद (शांति पर्व संदर्भ)

30:44  राजा जनक ने पराशर मुनि का सत्कार कर चरण-वंदना की और पूछा— हे प्रभु, ऐसा कौन-सा कर्म है जो इस लोक और परलोक दोनों में संपूर्ण प्राणियों के लिए कल्याणकारी है? 31:20 पराशर मुनि बोले— हे जनक, तुमने अपने स्वार्थ को महत्व न देकर लोक-हित को महत्व दिया है। तुम्हारे इस साधु स्वभाव से हम अत्यंत प्रसन्न हैं।31:34  इस लोक और परलोक में एक ही ऐसा कर्म है जिससे संपूर्ण प्राणियों का मंगल होता है, और वह है धर्म का आचरण। 31:52  हे राजन, इंद्रियों को मनचाही वासनाओं के अनुसार छोड़ देने से जीवात्मा का पतन होता है। यही उपदेश भगवान राम को उनके गुरु वशिष्ठ ने दिया था।

32:17 वाल्मीकि जी ने भारद्वाज से कहा कि वही जीव जो इंद्रियों के वश होकर तुच्छ योनियों में भटकते हैं, वही जीव संयम और श्रेष्ठ कर्म से देवताओं का राजा इंद्र बन जाता है। 32:45  इंद्र ने इंद्रिय-संयम किया। जहाँ-जहाँ इंद्रियाँ गलत मार्ग पर गईं, वहाँ उन्हें रोका और श्रेष्ठ कर्म कर श्रेष्ठ पद को प्राप्त किया। 33:06 जो मनुष्य मनमाने भोग, भोजन और विचरण में लिप्त रहता है, वह अधोगति को प्राप्त होता है। इसलिए मनुष्य को जीवन में इंद्रिय-संयम अवश्य अपनाना चाहिए। 33:14   दूसरा महत्त्वपूर्ण गुण है क्षमा। क्षमा गृहस्थ का भी भूषण है और साधु का भी।

क्षमा और प्रशंसा से शत्रुओं व परिवार को जीतने की कला

33:21 आप अड़ जाएंगे, हट जाएंगे तो कभी पत्नी से, कभी पति से, कभी बेटी से, कभी बेटे से गलती हो जाएगी। उनकी गलती को गांठ बांधकर अगर आप चुभने वाले वचन कहते रहोगे तो आपका घर विष हो जाएगा। हो सकता है बेटी में सौ-सौ गलतियाँ हों, बेटे में सौ-सौ ऐब हों, लेकिन ऐबों का बयान करके आप उन्हें सुधार नहीं सकते।

33:47  बेटे में, बेटी में, माँ में, सासू में, पड़ोसी में कोई न कोई एक-आध अच्छा गुण अवश्य होता है। पहले उस अच्छे गुण की बखान करो। फिर धीरे से विश्वास में लेकर कहो— देखो, तुम इतने अच्छे हो, तुममें सज्जनता है। यह जो दोष है, वह तुम नहीं हो; वह तुम्हारे मन, बुद्धि या स्वभाव में बैठा है। तुम तो आत्मा हो, परमात्मा के अमृत पुत्र हो।

34:17  तुम हिम्मत करो, थोड़ा जल भरो, लंबा श्वास लो, प्राणायाम करो और संकल्प करो कि मैं इस दोष को निकालूँगा। तो मन का दोष निकल जाएगा। बेटे तुम कितने अच्छे हो सकते हो, बेटी तुम कितनी महान हो सकती हो, बहन जी तुम कितनी पवित्र हो सकती हो, भैया तुम कैसे ऊँचे उठ सकते हो— इस प्रकार अपनत्व में लेकर दोष निकालो तो सामने वाला निर्दोष बनता है।

34:43  पंचिंग करते-करते, ताने देते-देते आप न बच्चों को सुधार सकते हो, न पड़ोसियों को, न अपने संपर्क में आने वालों को। शत्रुओं को टोटे चबाने की अपेक्षा अपने मन में उनके लिए भी सत्संग की खीर-खांड खिलाने का सद्भाव रखो तो शत्रु भी जीत लिया जाता है।

35:10  शत्रु को मारपीट कर नष्ट कर देना या हत्या कर देना, यह शत्रु-विजय नहीं है। वह अगले जन्म में बदला लेगा। लेकिन शत्रु के भीतर जो कोई सद्गुण है, उसे देखकर अपने द्वेष और नाराजगी को मिटा दो। यदि उसने हानि पहुँचाई है तो समझो कि भगवान तुम्हारे ही किसी कर्म का फल उसके माध्यम से दिला रहे हैं।

35:43  इसलिए उस पर बरसने की अपेक्षा अपनी गलती खोजो या कर्म-परिपाक समझकर दिल को मजबूत रखो। शत्रु की कुचाल से सावधान रहो, लेकिन द्वेष-बुद्धि रखकर अपना दिल मत बिगाड़ो। ऐसा करने से ही सच्ची शत्रु-विजय होती है।

36:14 बच्चों, पड़ोसियों, माता-पिता, सास-बहू के संबंधों में भी गांठ मत बांधो। यदि सास को जीतना है तो बहू सास की सहेलियों के बीच उसकी बखान करे। बहू को जीतना है तो बहू की सहेलियों के सामने उसकी निंदा नहीं, उसकी प्रशंसा करो। देर-सवेर हृदय बदल जाता है।

37:15 दूसरी बात— मंत्र-जप की संख्या बढ़ने से भी शत्रु-विजय होती है।

मंत्र-जप के प्रकार और उनका प्रभाव (उपांशु एवं मानस जप)

37:22 शास्त्रों में कहा गया है कि विविध यज्ञों की अपेक्षा जप-यज्ञ दस गुना अधिक प्रभावशाली है, उपांशु जप उससे सौ गुना और मानस जप हजार गुना फल देने वाला है।

विविध यज्ञ जप यज्ञ विशिष्टो दशगुणः।
उपांशु शतगुणः प्रोक्तः सहस्रः मानसः स्मृतः॥

38:04  मन से किया गया जप हजार गुना फल देता है। यदि प्राणायाम करके, भगवान का पूजन-सुमिरन करके, गुरु का आह्वान करके जप किया जाए तो एक जप भी हजार जप के समान फल देता है। 38:25  इस प्रकार सौ जप लाख बन जाते हैं, लाख जप करोड़ बन जाते हैं।38:37



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