ज्ञानज्योति प्रगटाओ| Gyanjyoti pragtao| Part-3|
सत्संग के मुख्य अंश:
- मान पाने के चक्कर में हम इतना उलझ जाते हैं कि हमारा असली उद्देश्य ही भूल जाते हैं !
- जिज्ञासु के ये लक्षण... विस्तृत वर्णन !
- एक लॉजिकल सिद्धांत... आप जितने अंश में परमात्मा के नजदीक होते हो उतना ही संसार की चीजें आपकी तरफ स्वयं चली आते हैं और आप जितना संसार का अवलम्बन लेते हैं और खुद से दूर जाते हैं तो संसार की चीजें भी आपसे दूर चली जाती है !
- अपने जीवन का ज्ञान ना होने के कारण यह जीव प्रकृति की अहंता-ममता में फँस कर दु:खी होता है !
- आध्यात्मिक जगत में दक्ष रहना क्या है... पूर्णरूप से जानिये !
- इच्छित पदार्थों की अनायास पूर्ति की टेक्निक...
- 50 वर्ष की निष्कपट भक्ति से अज्ञान दूर नहीं होता लेकिन एक मुहूर्त भी ब्रह्मवेत्ता की सेवा करने से हृदय का अज्ञान दूर होता है !
- 3 गूढ़ प्रश्नों का उत्तर क्या दिया युधिष्ठिर ने एक यक्ष को? ... महाभारत प्रसंग !
- सदैव प्रसन्न रहना ईश्वर की सर्वोपरि भक्ति है।
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सत्संग -
“0:04 तमोगुण आदमी का स्वभाव होता है की– मारू ते मारा छोकराव अथवा मरूट मारा आप नुनता राम, 0:12 मैं किसी को मानना न दूं, लेकिन मेरे को सब मान दे, तमोगुण ऐसा चाहता है, 0:20 रजोगुणी ऐसा चाहता है कि अपने लगन मैन बोले तो हेमनाथ छोकरा ना लगन था मोती पार्टी से ना पड़े जमाने वाले 0:27 अपने बहस मनु ,ऐसा करके मान के तंतु, मान मिलने के लिए वो 0:36 संबंध के तंतु जोडा रहता है, और संबंध के तंतु जोड़ते जोड़ते इतना बहिर्मुख हो जाता 0:42 है की जिससे संबंध जोड़ना चाहिए उसके लिए उसको फुर्सत ही नहीं मिलती है, और आखिर जगत 0:48 से अपमानित होकर चला जाता है, और हमें याद रहना चाहिए की कितना भी मान 0:54 मिलेगा तो इस बॉडी को शरीर को देखकर लोग मान देंगे, और शरीर को कितना भी तुमने मान 1:00 से सजाया अंत में देखो मृत्यु आकर इसका अपमान कर दे, 1: 07 दिखलु फटी जाए सब हो जाने पर कितना अपमान होता है, लोग बांधते रस्सों से जिसको मान दिलाया उसको 1:14 तो रसों से बांधकर आरथी पर शमशान यात्रा ले जाना है, यह मान को हम याद दिलाये, और फिर 1:21 उसके ऊपर लकडे रखें जाएंगे और आग़ दी जाएगी, जिसके मान के लिए हम परेशान हो रहे 1:26 हैं, जय राम जी, तो कहना पड़ेगा ना, श्री राम, 1:32
रिवई वे भाई ऐसा बराबर रखना चाहिए, लड़के की शादी हमक जगह पे होनी चाहिए, लड़की की 1:38 शादी अमुक जगह पे जानि चाहिए, घर का डेकोरेशन ऐसा होना चाहिए, कैसा मकान होना चाहिए, इस लटे में होना चाहिए, ये होना 1:45 चाहिए, वो होना चाहिए, हम कितना कितना करते हैं, क्यों मोह 1:51 उससे आधा अगर परमात्मा अपने के लिए कोशिश की जाए तो 1:58 महाराज, यह ब्रह्म विद्या ऐसी है की– ठीगनी शरीर में टेढ़ी टांगों में और काला चेहरे 2:05 में अगर ब्रह्म विद्या आती है, तो महाराज बड़े बड़े विशाल वाहु विशाल काय विशाल राज्य 2:12 के मलिक जनक जैसे भी उनके चरणों में नतमस्तक हो जाते हैं, और साधु संत भी उनके गीत गाते रहते हैं, 2:20 ये ब्रह्म विद्या ऐसी है आध्यात्मिक विद्या अष्टावक्र मुनि 2:27 शरीर में आठ बांक थे काली काया टेढ़ी मेंढ़ा शरीर, ठीगना शरीर 2:33 12 वर्ष की उम्र, लेकिन ब्रह्म विद्या है तो सु शोभनीय है, 2:39 मजे की बात है, की लोग अपना ड्राइंग रूम गंदा रखना नहीं चाहते, अपना बाथरूम गंदा 2:45 रखना नहीं चाहते, रसोड़ा गंदा रखना नहीं चाहते, लेकिन इन इच्छाओं वासनाओं से अंतकरण 2:51 गंदा हो रहा है, उसका ख्याल भी नहीं करते, कितने समझदार लोग, ओम ओम ओम ओम।
2:59 तो तीसरा शिष्य का साधक का जिज्ञासु का तीसरा सदगुण है पहले सदगुण है मान से दूर 3:07 भगाना, दूसरा सदगुण है मत्सर से ईर्ष्या से दूर भागना, तीसरा है अपने कार्य में दक्ष, 3:17 हां हां सबकी करना लेकिन गली अपनी नहीं भूलना, 3:23 जैसे लोभी ग्राहक से हां हां करेगा, साहब से हां करेगा हूं हूं करेगा, लेकिन कुछ भी पैसे की 3:28 बचत होती है की नहीं घुमा फिर के money makes … दाम बनाए काम, 3:36 तो जैसे लोभी कैसा भी माल वैरायटी खरीदेगा, किसी भी ढंग से बेचेगा, लेकिन उसका 3:42 लक्ष्य है मुनाफा रुपया, ऐसे ही साधक का लक्ष्य होना चाहिए की अचलाता, परिस्थितियों 3:51 के वाव जोड़े हमारे चित को चलित एन कर दे, इसलिए वो दक्ष रहे, सुख भी आ जाए तो दक्ष 3:58 रहे, दुख भी आ जाए तो दक्ष रहे।
एक logical सिद्धांत है,वैदिक सिद्धांत है की– आप 4:07 जितने अंश में अपने अंतर्यामी के करीब होते हो, जाने अनजाने उतना जगत की चीज 4:15 तुम्हारे तरफ खींचकर आती है, और जो आपने जगत की चीजों का जगत के संबंधों का अवलंबन 4:22 लिया और अपने आप से दूर चले गए, उतनी जगत की चीज आपका त्याग करते थे, 4:28 जैसे लोहा का टुकड़ा लोहे चुंबक से चिपका है तो छोटे-छोटे लोहे के कण उसको चिपक 4:36 जाएंगे, वे तब तक चुपके रहेंगे, जब तक वह लोहे का टुकड़ा लोहे चुंबक से लगा है, लौह 4:44 चुंबक का त्याग करते ही लोहे के कण उसका त्याग कर देते हैं, ऐसे ही हम लोग उन चीजों 4:51 के अधीन होते हैं तो, वे चीज दूर भागते हैं और हम उनके गुलाम हो जाते हैं, और हम अपने करीब 4:57 आने लगते हैं, निस्वार्थ भाव से कर्म करते हैं तो जगत की चीज अपने आप मान आदि 5:03 आकर्षित होकर आते हैं। तो संसारी आदमी सत्कर्म करें मान की इच्छा 5:10 न रखें तभी भी उसका मान रह जाता है, यश राहता है, यश की इच्छा से जो लोग काम करते 5:16 हैं, उनका यश नहीं टिकता, मान की इच्छा से जो लोग काम करते हैं उनको इतना मान नहीं 5:21 मिलता। लेकिन मान और यश की इच्छा बिना करने योग्य सत्कर्म करते और मान यस ईश्वर के 5:29 चरणों में अर्पित कर देते हैं तो, ईश्वर उनका मान और यश बढ़ाने में जरा कमी नहीं रखते। कोर कसर नहीं रख। सुन लो शबरी 5:37 के पैगाम को, सुन लो मीरा के जीवन को, रोहिदास चमार के जीवन को, और जो अपने कार्य 5:42 में अपना कार्य क्या है, की प्रकृति के गुण दोष से बचकर अपने आत्मा में जगना यह अपना 5:49 काम है। आत्मा किसी गुण से किसी कर्म से किसी अवस्था से दूषित नहीं होता है, 5:57 लेकिन प्रकृति के कार्यों में अहंता रखने से 6:04 जीव का विवेक क्षीण हो जाता है, इसलिए वो अपने आत्मा स्वभाव का अनुभव नहीं कर सकता, 6:11 और आत्मा स्वभाव का अनुभव न करने के करण, यह जीव संसार के क्षणिक सुखों से आकर्षित 6:20 होकर जन्म मरण के चक्र में पीसा जा रहा है, उसको निज का सुख विचारे को नहीं मिला उस 6:28 लिए, इच्छा वासना के सुख के पीछे इसने करोड़ जन्म बीता दीये, 6:34 है तो इतना सुख स्वरूप, इतना शांत स्वरूप, इतना आनंद स्वरूप है की उसका वर्णन नहीं 6:41 किया जा सकता, लेकिन उसको अपना स्वभाव का पता नहीं चला, तो प्रकृति के 6:48 गुणों में अहंता ममता करने से यह जीव दुख का भागी हो गया, तो अपने कार्य में दक्ष जो 6:56 सत्संग आदि सुनकर गुरुओं के वचन सुनकर अगर दक्ष राहत है, तो दुख आया उसको देखा, सुख आया 7:04 उसको देखा, मान आया उसको देखा, अपमान आया उसको देखा, तो अब आने जाने वाले चीजों को 7:10 देखा, अथवा मन में जो विचार आया उसको देखा, तो मन के विचारों को देखने से, प्राणों की 7:17 रिदम को देखने से, शरीर की तंदुरुस्तियां बीमारी को देखने से, तो जो अपने तन को मन 7:23 को, प्राणों को देखने की कला सिख गया उस कला में जो दक्ष हो गया, वो दूसरे के शरीर को 7:30 समझ जाएगा, दूसरे के प्राणों को समझ जाएगा, दूसरे के मान को समझ जाएगा, अंतर्यामी हो 7:35 जाएगा। तो अपने कार्य में दक्ष। वर्क वैल्यू वर्क, प्ले वैल्यू प्ले दैट इस दी वे ऑफ हैप्पी एंड गे। 7:42 लेकिन वर्क वैल्यू वर्क प्ले वैल्यू प्ले तो जिसको जिसकी जो नौकरी है, जिसका जो धंधा है, जो जिसका काम है, 7:48 उसमें दक्षता ये व्यावहारिक लोगों का है, आध्यात्मिक जगत का दक्षता यह है की कुछ भी 7:54 करो लेकिन अपने आत्मज्ञान के तरफ आगे बढ़ रहे, या पीछे जा रहे हैं, 8:01 कर्मों को इतना ना बड़ाओ की आत्म चिंतन का समय ही ना मिले, संबंधों को इतना न 8:09 बड़ाओ की जिससे संबंध जोड़े जाते हैं उसका ही पता ना चले, हम लोगों ने संबंध 8:15 इतने बड़ा दी है की– जिससे संबंध जोड़े जाते हैं उससे तो हमने अन्याय कर दिया, तो 8:21 बाहर के संबंध फिर, फिर महाराज मुंह में सीटी बजाते, 8:26 बाहर के सम्बन्ध अगर जिससे संबंध जोड़े जाते उसके लिए समय नहीं निकाला, तो बाहर के 8:32 संबंध ठोकर मारे बिना नहीं रहेंगे।
8:39 एकनाथ जी महाराज कहते हैं की रात्रि के पहले प्रहर और आखिरी प्रहर आत्म 8:47 चिंतन के लिए समय निकालना चाहिए। कार्य के प्रारंभ में और कार्य के अंत में 8:54 आत्मा विचार करना चाहिए। वो आदमी दक्ष है, 9:14 तो इच्छा उठे उसके पहले एक प्रश्न वाचक रखे, और इच्छा पूरी हो जाए उसके बाद एक प्रश्न वाचक रखे, वो आदमी दक्ष है, तो इच्छा जो हुई, इस इच्छा से आखिर क्या, तो इच्छा के गुलामी नहीं होगी, इच्छा में पकड़ नहीं होगी, इच्छित पदार्थ अपने आप 9:20 हाजिर हो जाएगा, एकदम टेक्निक बता रहा हूं, सिद्धियों की चमत्कार की अनायास सफल होने की 9:27 जब तक आप इच्छा के गुलाम हैं तबतक इच्छित पदार्थ नहीं आता, आप यश की इच्छा रखोगे तो 9:34 यश नहीं होगा, मान की इच्छा रखोगे तो मान नहीं मिलेगा, मान की इच्छा को अंदर से सचमुच में निकालने से सचमुच मान होने लगेगा, यश 9:41 की इच्छा हटने से यश होने लगेगा, धन की इच्छा हटने से ही धन अपने आप आपका पीछा करेगा, ऐसे सैकड़ो लोगों को मैं जानता हूं, 9:48 जीस समय उनको धन की तीव्र इच्छा थी उसे समय उनको रोजी रोटी कामना परिश्रम लगता था, जब 9:55 आध्यात्मिक रास्ते गए और धन की इच्छा ने करवट ले ली, भागवत इच्छा में तो धन उनके 10:01 पीछे हात धो कर पड़ा है, ऐसे कई लोगों को मैं जानता हूं, तो वो लोग हाथ ऊपर करे जाहीर में लेकिन 10:09 इनकम टैक्स का जमाना है रुके रहो, ॐ ॐ ॐ ॐ 10:17 जय श्री राम,
मान की इच्छा छोड़ते ही उसका मतलब इसका ये नहीं चलो हम मान की इच्छा नहीं करते तो देखते हैं कोई हम को मान देता है कि नहीं, तो मान की इच्छा है। भीतर से सचमुच मान की इच्छा हटने से मान मिलेगा। सुख की इच्छा हटने से परम सुख की द्वार खोल जायेंगे। 10:40 तो अपने कार्य में दक्ष होना चाहिए, तीसरा सदगुण है साधक का, चौथा है ममता रहित होना, 10:50 ममता जो है देह में अहंता होती है, और देह के संबंधों में 10:56 ममता होती है, हकीकत में देह सदा नहीं रहेगा, तो देख के संबंध सदा कैसे रहेंगे? लेकिन जो देह 11:03 को सदा रखना चाहता या देखें संबंधों को संभालना चाहता है उसको संबंधों के तरफ से दुख उठाना पड़ता है, संबंधों के तरफ से 11:11 अपमान होता है, और जो जितना संबंधों के पीछे ममता रखना है उतने उसके कुटुंब भी 11:18 उसके पुत्र उसके परिवार वाले उसको दुख के दिन लाके दिखा देते हैं, और ममता नहीं होगी 11:24 तो महाराज संबंधों से उतना दुख नहीं होगा, जितना ममता वाले को होता है, तो ममता बड़े 11:31 नहीं, इस बात में भी उसकी कुशलता होनी चाहिए, दक्षता होनी चाहिए, 11:40
तो जैसे हम अपने प्राणों को प्यार करते हैं, अपने देह को प्यार करते हैं, अपनी मैं 11:47 को प्यार करते हैं। ऐसे ही गुरु की मैं को अगर प्यार ने लगे तो अपनी मैं गुरु के रूप 11:52 में बदल जाति है। गुरु में दृढ़ प्रीति वाला। भगवान शंकर ने 11:59 पार्वती जी को सुना ते कहा, करोड़ जन्म के यज्ञ तप व्रत ये सब गुरु 12:07 के संतोष मंत्र से फलित हो जाते हैं, जो ब्रह्मवेत्ता गुरु हैं, जो आत्मारामि 12:13 महापुरुष है, उनको कैसे संतुष्ट किया जाए, उनको कैसे प्रसन्न किया जाए, और उनमें दृढ़ 12:19 प्रीति वाला हो, उन महापुरुषों में अगर दृढ़ प्रीति होती, तो संसार के विकारों की 12:24 प्रीति घट जाति है, ब्रह्मवेत्ताओं में प्रेम हो जाए, या भगवान में प्रेम हो जाए तो 12:30 संसार के तमाम तमाम परिश्रम वायात विकारों में जाने वाली जो शक्ति समय है, वो बच जाती है। दूसरी एक बात हम समझ लें, की जो प्रेम समझे बिना 12:47 संसार से प्रेम करते हैं, वे दुखी होते हैं। और जो प्रेम को समझे बिना संसार का त्याग करते हैं वे भी दुखी होते हैं। 13:00 फिर से कह दूँ जो प्रेम रस को समझे बिना संसार में प्रेम 13:06 खोजने हैं वे दुखी हो जाते हैं। जो प्रेम रस को समझे बिना संसार में सुखी 13:14 होना चाहते हैं, या प्रेमी होना या संसार के प्रेमी हो जाते हैं, वे अंत में हताश निराश 13:20 पश्चाताप की खाई में गिरते हैं। और जो ठीक प्रेम को समझे बिना संसार संसार का 13:28 त्याग कर लेते हैं, उनको भी अंत में धोखा मिलता है, 13:34 कबीर जी ने कहा
प्रेम न खेतों उपजे प्रेम न हाट बिकाय
राजा चहो प्रजा चहो शीश दिए ले जाए
अपना अहंता 13:46 जितनी जितनी मिटती जाएगी, उतना उतना स्वभाव में प्रेम बढ़ता जाएगा। जितनी जितनी अहंता 13:52 होती है, उतना प्रेम का हिस्सा दूर चला जाता है। बच्चा निर्दोष है अहंता नहीं है तो 13:57 प्यारा लगता है। उसकी जरा सी मुस्कान तोतडी भाषा अशुद्ध भाषा ग्रामर का कोई ठिकाना 14:04 नहीं, पानीको आईं बोलना है, रोटी को मम बोलना है, पिता जी को बबा बोलता है, 14:11 मम्मी बोलता है 14:26 डैडी भी ठीक से नहीं बोलता है।
महाराज एक लड़के से पूछा पापा मम्मी डैडी मैं क्या पसंद करते हो? बच्चे ने कहा 14:32 डैडी पसंद करते हैं। पिताजी क्यों नहीं बोलते हो, माताजी क्यों नहीं बोलते हो? माताजी 14:39 पिताजी बोलने से हमारा जो पॉप पाउडर लिपस्टिक है न वो ख़राब हो जाती है, डैडी बोलने से नहीं ख़राब होती ,
बिरला और टाटा वाले कोई महफ़िल थी बैठे, बिरला वाले , मैंने सुनी है ये घटना, बिनोदि होगा टुचका जो भी हो, बिरला वाले ने कहा देखो मैंने लाखो रुपया धर्मदाका, दसवां अंश 15:11 धरमादा करता हूं, लेकिन वो धर्मदा तो करता हूं लेकिन अपनी फर्मों का अपना अपना कुल का 15:17 नाम आबात करने में लगता हूं, मंदिर तो लक्ष्मी नारायण का है लेकिन 15:22 लोगों को मैंने उल्लू बना दिया, कहाँ जाते हो की बोले बिरला के मंदिर में, नाम रख दिया बिरला का मंदिर , मंदिर में होते तो 15:49 लक्ष्मी नारायण । लेकिन नाम रखदिया बिरला मंदिर बिरला बिरला बिरला तो सब धार्मिक आदमी बिरला बिरला तो कहाँ जाते हो की, बिरला के मंदिर बिरला के मंदिर, बिरला के मंदिर हजारो लाखो के लोगो को उल्लू बनाया , जय जय , सत्यनारायण भगवान” gj -----------
तब टाटा कंपनी के मालिक ने कहा की - अरे 16:02 तुमने क्या लोगो को उल्लू बनाया तुमने तो लाखों रुपए खर्च किया और ट्रस्ट ने बनाई, मैनेजमेंट किया, मैनेजर 16:09 रखें, और फिर बिरला बिरला चला, मैंने तो कंपनी का नाम ही ऐसा रखा की बच्चा पैदा हो 16:15 तो हमारी कंपनी का नाम लेट हुआ है टाटा टाटा टाटा टाटा टाटा
लेकिन साधक 16:25 यह बातें सुन ले, थोड़ा हंस भी ले, लेकिन दक्ष रहे की आखरी ये मनोरंजन है, यह दक्षता है, जय राम जी की। मन की विश्रांति कुछ और चीज है, 16:38 महाराज चौथा सदगुण है ममता रहित होना, और पांचवा सदगुण है गुरु में दृढ़ प्रीति 16:45 वाला होना। ईश्वर में जितनी प्रीति है, ईश्वर में 16:51 प्रीति करने से आदमी के मन के मैल दूर होते हैं, अंतःकरण शुद्ध होता है, 17:00 और गुरु में प्रीति करने से, विचार सागर का सिद्धांत बताता हूं। गुरु में प्रीति करने 17:05 से मन का मैल तो दूर होता है, लेकिन गुरु तो सामने होते हैं, तो उनका उपदेश भी जल्दी 17:11 असर करता, तो आज्ञान भी दूर होता है। यही बात भागवतकार ने 11वें स्कन्ध के 84 अध्याय के 17:18 बारहवें और तेरहवें श्लोक में कहीं। वसुदेव जी ने जब यज्ञ किया तो साधु 17:25 ब्राह्मण यज्ञ में प्रविष्टि हो रहे थे भगवान कृष्ण ने उनके चरण पखालन का काम किया था, 17:31 चरण प्रक्षालन करते-करते एक ऐसे त्रिकाल ज्ञानी संत आए 17:37 जिन्होंने कहा की कन्हैया यह सब अंगड़ाइयां तू छोड़ नहीं तो मैं तुम्हारा रहस्य खोल दूंगा। 17:43 श्री कृष्णा 17:50 कहते हैं कि - पग मने धुवा देओ। तुम पैर धो के क्या लोगे? श्री कृष्ण कहते हैं की पचास वर्ष की निष्कपट भक्ति से अंतःकरण की अज्ञान दूर नहीं होता है, पाप तो दूर होते हैं लेकिन ईश्वर और अपने बीच की दूरी दूर नहीं होती, 18:06 निष्कपट भक्ति, पचास वर्ष की निष्कपट भक्ति से हृदय का आज्ञान दूर नहीं होता लेकिन तुम्हारे जैसे 18:14 ब्रह्मवेत्ताओं के एक मुहूर्त की सेवा से, ह्रदय का अज्ञान दूर हो सकता है इसलिए मुझे चरण धोने दो। 18:22 हार्ड मास के देह जो मैं मानता है, और देह से पसार होने वाले पुत्रों को पत्नी को 18:29 परिवार को मेरा मानना है, जलाशाओं में तीर्थ बुद्धि करता है, धातुओं की बनी हुई 18:35 मूर्ति में भागवत बुद्धि करता है, लेकिन जिनके दिल में भगवान प्रकट हुए ऐसे महापुरुषों का जो संघ नहीं करता वह 18:42 साक्षात गधा है, 18:47
मैंने कल ये बात सुनाई थी की – एक बार पांडव जंगल में ऐसी जगह में उलझा गए की बड़े 18:55 प्यास ने उनको घेर लिया। भूख प्यास से थके थे। चलना बड़ी मुश्किल सा हो रहा था। 19:02 सबसे छोटा भाई को भेजा की तू जा, जरा देख कहीं पानी हो तो पि और जा खबर ले आ। सहदेव गया एक तालाब दिखाई पड़ा और ज्यूँ पानी लेने को खुवा भर के पिने को गया, त्यों वहां से 19:15 दैवी आवाज आया, के हे सहदेव 19:21 सावधान! 19:26 मैं इस तालाब का अधिष्ठाता हूं। यक्ष ने कहा, 19:33 इस तालाब का पानी पीने के पहले मेरे प्रश्न का उत्तर दे। अगर उत्तर देगा तो पानी पी 19:40 सकेगा, और यहां धन है वह भी तुझे दे दूंगा। अगर उत्तर दिए बिना पानी पिया तो तु मर 19:48 जाओगे। प्यास ने इतना जोर पकड़ा था के यक्ष के सुनी अनसुनी कर दी। और ज्यों पानी होठों पर रखा, 19:56 महाराज सहदेव चल बसे वहीँ लेट गए । नकुल आये उनका भी वही हाल हुआ। भीम आया भीम, और भीम भी महाराज लेट गए शवासन में , पानी पीते ही, भीम ने भी सुना यही बस प्रक्रिया चारो भाई का। आखिर युधिष्ठिर महाराज 20:16 ने देखा की जो जाता है, वापस नहीं लोटता क्या बात है, उसी दिशा में गए , देखा के एक तालाव है , प्यास लगी तलाव के तरफ जाते जाते देखा की भाई पड़े हैं, भाईओं को बाद में आकर जगाता हूँ, प्यास में, प्राण प्यारे होते हैं, भाई से भी अपना प्राण ज़्यदा प्यारे होते हैं। भाईओं को आकर बाद में देखता हूँ जरा पानी का चला तो पि लूँ। यक्ष की आवाज़ आया की युधिष्ठिर सावधान तुम्हारी चार भाईकी जो मैं हालत की वही हाल तुम्हारा करूँगा, अगर मेरे प्रश् की उत्तर नहीं दिया, मेरे सर्त है की इस तलाव की पानी तभी पि सकते हो जब मेरे प्रश्न की उत्तर दोगे। 20:55 अन्यथा आपने अवहेलना कर ली तो जैसे आपके चार भाइयों ने अवहेलना की और उनको मैंने कर 21:01 दिया, जमीन दोस्त ऐसे आपकी स्थिति होगी। इसलिए कृपा करके आप मेरे प्रश्न का उत्तर 21:06 दीजिए, ताकि मेरी सद्गति हो, और आपको भी तालाब का पानी धन में अर्पण कर दूंगा।
युधिष्ठिर ने कहा क्या तेरा प्रश्न है? यक्ष ने कहा 21:15 सदा प्रसन्न कौन रहता है? जानने योग्य 21:23 पाने योग्य तत्व क्या है? जिसको जानने से कुछ जानना बाकी नहीं बचता, जिसको पाने के बाद और 21:31 कुछ पाना बाकी नहीं रहता, जिसमें स्थिर होने के बाद बड़े भारी दुख से भी आदमी चलीत 21:36 नहीं होता, और जिसको पाए बिना जीव अनाथ हो जाता है, और जिसको पाने के बाद जीव का कभी 21:43 कुछ बिगड़ता नहीं, और जिसको न पाने के बाद कभी कुछ सुधरता नहीं, उस तत्व को जीस तत्व 21:49 को न पाने से उसका कुछ भला नहीं हुआ, और उस तत्व को पाने के बाद उसका कभी कुछ बिगड़ता नहीं, 21:54 ऐसा कौन सा तत्व है, जय राम जी बोलना पड़ेगा न , ये बात। .. , ॐ ॐ ॐ कृष्ण कन्हया लाल की,रणछोड़ राय की , 22:10 और तीसरा प्रश्न है की इस जगत में आश्चर्य क्या है? सबसे बड़ा आश्चर्य 22:18
युधिष्ठिर ने कहा जो दो दिन में 4 दिन में सब्जी रोटी खा सकता 22:26 लेकिन देना नहीं करता हो, कर्ज अपने ऊपर नहीं चढाता हो, जो 22:33 किसी भी कर्ज से नहीं दबा है, वह सदा प्रसन्न रहता है, कर्ज दो प्रकार का होता है, एक व्यावहारिक कर्ज होता है, 22:41 दूसरा धार्मिक कर्ज व्यावहारिक कर्ज रुपयों पैसों का है, जिसके ऊपर कर्ज का व्याज का घोडा दौड़ रहा है वो सुखी कैसा ? -------gj व्यवहार में दक्ष नहीं है , 23:27 भोग की सामग्री उधार लेकर उधार की सामग्री लाना घरमे , यहाँ कितना उपले अपमान है, हप्तों से विलास की वस्तुएं भोग की वस्तुएं घर में ले आना यह कितनी बेवकूफी, 23:33 खैर आप लोग तो ऐसे नहीं होंगे, श्री राम। 23:41 ----------gj 23:52 तो जिसके माथे कोई देवा नहीं है, वो प्रसन्न रहता है, 23:57 --------------- gj सेल्फ हिप्नोटाइज हो गया, और लोगों के 24:11 द्वारा हिप्नॉटिज़्म गया, अरे लड़के की सादी अरे भाई बच्चा हुआ क्या? बच्चा हुआ क्या तो क्या करें, महंगाई का 24:18 जमाना है दाम दूम नहीं करते, लड़के की शादी के बस ऐसे ही कर लिया, लड़की की शादी है - -----------gj 24:24 ऐसा करके काम कर लेना चाहिए ज्यादा कर्जा करके अपने मुसीबत में नहीं डालना चाहिए, 24:37
रूखी भली सुखी भली सारी सोग संताप।
जो चाहेगा चुपड़ी , बहुत करेगा पाप।।
(कबीर जी के वास्तविक दोहा -
आधी औ रूखी भली, सारी सोग संताप।
जो चाहेगा चुपड़ी , बहुत करेगा पाप।।)
कई ऐसे लोगो को जनता हूँ जो गांठे व्याज पर रख देते है, दो टके, अढ़ाई टके तीन टके और महाराज सादी विवाह जरा धवके से करते ये मान बढ़ाई की इच्छा से इसलिए तो, 24:53 अब फिर क्या मिलता 24:59 है, ब्याज की नोटिस आते अपमान होता है, और रात को नींद नहीं आती ---- gj क्या हाल है , मरजाऊं तो अच्छा अरे सार नहीं जीने की अकल उपयोग कर लेता जरा दक्ष हो जाता जरा 25:11 संतो के पास जाता जीने की कला सीखता मरने के लिए थोड़े जन्म हुआ है, जन्म हुआ है 25:18 साक्षात्कार के लिए, जन्म हुआ है अपने घर में आने के लिए, हजारों लाखों जनों के अंत 25:23 को करने के लिए मनुष्य जन्म हुआ है, चिंता के कोलू में पीसने के लिए थोड़े मनुष्य जन्म हुआ है , 25:31 लेकिन हम लोगों को जीने का ढंग नहीं है,तो ये महाराज दो रोटिओं के लिए जाने क्या क्या क्या 25:36 दो रोटिओं के लिए नहीं करते, मान के लिए करते हैं, दिखावे के लिए करते हैं , और ऐसा ऐसा करते हैं, की महाराज छूटना 25:44 मुश्किल हो जाता है, ईश्वर का चिंतन तो दूर हो गया, बस रुपयों का ही चिंतन, वही मई बाप वही खुदा हो जाता 25:49 है, सुबह शाम वही खुदा हो गए 25:58 , वही सुबह साम वही खुदा होगया , ॐ ॐ ॐ ॐ जिनका ढंग नहीं , दक्षता नहीं व्यवहार में, कुशलता नही, तो पहला प्रश्न था यक्ष का - 26:06 सदा प्रसन्न कौन रहता है, की जीस पर कोई कर्ज नहीं है, कोई देवा नहीं, 26:13 आप लोग तो कोई देवा करके कोई फर्नीचर नहीं वसाते होंगे, लेकिन कोई बसाता हो ना तो उसको यह 26:18 यक्ष की कथा सुना देना आप लोग, जय जय। 26:24 दो प्रकार के देवा होता है, एक तो यह रुपए पैसों का देवा होता है, हप्तो आदि का।
दूसरा देवा होता है, देवऋण पितृऋण ऋषिऋण 26:35 और शास्त्र ऋण, माता पिता ने हमें पाल पूछा बड़ा किया तो 26:41 हमारा कर्तव्य है की बुढ़ापे में उनकी हम सेवा करें, न की शादी करके हम चले जाएं। 26:48 नहीं तो उनका कर्ज रहेगा, माता पिता ने हमें उछेरा है, बड़ा किया है तो हम भी उनकी सेवा करके बदला चुकाने की कोशिश करें। 26:56 ये पितृऋण हो गया। देव ऋण वो देव बरसात आदि होता है ,तो उस देव को भी प्रणाम आदि किया , होम हवन आदि करके जजन पूजन करके उनके ऋण पूरा किया। ऋषि ऋण , ऋषि महापुरुषोंने अपने खून का पानी बनाकर भी हमारे लिए नए नए अनुभव खोजे अविष्कार किये और हम को अपने जिव में से जगा कर अपने शिव पद में ले जाने की जिन्होंने कोसिस की ऐसे ऋषिओं की स्मृति करके अपने ह्रदय में ऋषिओं के लिए मान और प्रेम भर के अपने ह्रदय को पवित्र करे और ऋषिओं के आदेश अनुसार अपने जीवन को ढालें तो समझो उनके ऋण को हम ने चूका दिया और प्रशन्नता आ जाएगी। , 27:41 और चौथ होता है शास्त्रऋण, अगर शास्त्र न होता तो मानवी खाया पिया कमाया और सो गया, 27:48 फर्नीचर बनाया वो बढ़ाया, आखिर में पशु जैसा जीवन जी के चला गया, लेकिन शास्त्र 27:53 त्याग तपस्या सेवा उदारता नम्रता ये सदगुण देते हैं, तो जिन शास्त्रों से हमें सदगुण 28:00 मिले हैं, जिन शास्त्रों से मैं आत्मा विद्या मिली है, वे शास्त्र और उन शास्त्रों का ज्ञान हम हमको जिनके द्वारा 28:07 मिला है, जिन ऋषियों के द्वारा मिला है, जिन शास्त्रों के द्वारा ज्ञान मिला है, वो 28:13 उनका हम पर कर्ज है, वो कर्ज जब हम दूसरों तक पहुंचाएं, तो उसका जैसे मुक्त हो जाते 28:19 हैं, इसलिए हमारी प्रसन्नता होती है, और ये हम लोगों का अनुभव होता है, जब हम ऋषियों 28:24 का और शास्त्रों का प्रचार प्रसार करने का शुभ अवसर पाते हैं, तब हमारे चित में विशेष 28:30 प्रसन्नता होती है, आनंद होता है,
तो युधिष्ठिर महाराज का वचन सतांश सत्य है, 28:36 की जिस पर कोई ऋण नहीं है जिस पर कोई कर्ज नहीं है वो सदा प्रसन्न रहता है, जब देखो 28:44 प्रसन्नता नहीं है, तो याद करना चाहिए, की कोई न कोई कर्ज है 28:50 कोई न कोई कर्ज है इसलिए प्रसन्नता नहीं, नहीं तो प्रसन्नता तुम्हारा स्वभाव है, 28:57 श्वेत पना यह कपड़े का स्वभाव है , और कपड़ा मेला लगाने तो कुछ ना कुछ गंदगी उसको छोड़ 29:02 गई है, गंदगी छोड गई, तो छम छम तो धो लो , जब प्रसन्नता से आप अपने को खाली पाएं, तो देख 29:09 लेना की कोई एन कोई कर्ज है, शास्त्र का कर्ज तो थोड़ा शास्त्र पढ़ लो, ऋषियों का 29:15 कर्ज तो थोड़ा ऋषियों के अनुभव को अपने हृदय में ले आओ, ऋषियों का कुछ आयोजन कर लो। माता-पिता का कर्ज है 29:22 तो मंत्र पितृ सेवा करके अपने से अपने को पवित्र कर लो, तो आदमी प्रश्न राहत है, और 29:29 प्रश्न आदमी की बुद्धि ठीक निर्णय करती है, सदैव प्रसन्न रहना ईश्वर की सर्वोपरि भक्ति 29:36 है, जो प्रश्न नहीं रह सकता है वह ईश्वर की क्या भक्ति करता है, वह अपने को जो खुश 29:42 नहीं कर सकता, वो ईश्वर को क्या खुश करेगा, कोनसा तत्व है , सदैव प्रसन्न रहना यह ईश्वर की सर्वोपरि भक्ति है, और सदैव निर्भय रहना यह अपने भक्ति है, जय राम जी की ,
महाराज दूसरा प्रश्न है यक्ष का , की पाने योग्य पद क्या है ? जिस को पाने के बाद कुछ पाना बचता नहीं, जिसको जानने के बाद कुछ जानना बचता नहीं, और जिसमे स्थिर होने के बाद बड़े भरी दुःखसे भी आदमी चलायमान नहीं होता है, ऐसा कोनसा तत्व है 30:17 युधिष्ठिर महाराज ने कहा जो सदा प्राप्त है, 30:24 अप्राप्त की भ्रांति मिटने से जो पाया जाता है, वह अपना आपा , अपना मैं शुद्ध रूप से जिसने 30:32 जान लिया जिसने आत्मज्ञान पा लिया उसने सब कुछ का लिया, 30:43 और जो आत्मदेव में स्थित हो गया वो बड़े भारी दुख से भी चलाएं नहीं होता है, तो 30:49 पाने योग्य पद है, आत्मा पद , यक्ष के पाप दूर हुए, क्योंकि आत्मज्ञान की चर्चा सुनी 30:56 पवित्र युधिष्ठिर के मुखारविंद से,
तीसरा प्रश्न था की आश्चर्य क्या है, युधिष्ठिर ने कहा -
अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यमालयम्।
शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ॥
अहर्निश बहुत प्राणी मनुष्य यम मंदिर जा रहे सब , सब भागे जा रहे मौत तरफ , लेकिन दूसरे यहीं अपने किला गाड़ना चाहते हैं, ----- gj 31:31 अहर्निश मनुष्य मृत्यु के द्वारा पर जा रहे हैं, इस समय 31:37 दोबजकर पचीस मिनिट हुए दोपहरी की 31:45 ------ gj क्यों की आसोज सूद दो दिवस संवत बिस इक्कीस मध्यान्ह ढाई बजे, अपने प्रारब्ध में मध्यान्ह ढाई बजे हर उत्सब हर सत्संग ऐसे ही जमता है, 31:53 जय श्री कृष्णा। 32:00 तो अभी 2:25 हुए हैं इस समय अहमदाबाद के 32:05 तमाम शमशानों में मुर्दे जलते होंगे, नहीं होंगे, खाली 32:11 होंगे कोई , खली होंगे कोई समसान ? कहीं कहीं कोई जलता होगा , तो कोई जलकर पूरा हुआ होगा, तो कोई नया आया 32:17 होगा, प्रोसेस चालू ही होगा, 32:22 चाहे केलिको का समसान चाहे बदिललका हो चाहे कोई कुछ न कुछ होता ही होगा, तो अभी जो शव जल रहे हैं, अथवा जलकर समाप्त हो रहे, अथवा जलने को पड़े हैं, लाइन में उन को कल दो बजकर पच्चीस पर 32:37 यह पता नहीं होगा की आज की हमारी हालात होगी, 32:44 ------ gj , अभी जो मुर्दे जलने की लाइन में पड़े हैं, अथवा जल रहे हैं, या जल के समाप्त हो रहे हैं, क्या कल ड़ाई बजे उनको पता था? 33:03 एकदम साफ भी था, अच्छा तो आज जो घूम रहे हैं कोई गाड़ी में 33:09 कोई मोटर में कोई बेंच में कोई प्लानिंग में कोई कुछ, और कल उनका भी होगा की नहीं होगा? जो कल इस समय वहां आने वाले हैं, उनको 33:16 आज पता है क्या? जय राम जी की , और फिर भी कैसा 33:22
देखते हैं की शरीर का कोई भरोसा नहीं, गाड़ी उठने का तो टाइम होता है, हवाई जहाज 33:28 चलने का तो टाइम होता है, बस चलने का टाइम होता है, प्लेटफॉर्म होता है, स्टैंडहोता है , ीेकिन इस देह का कोई स्टैंड नहीं कोई प्लेटफार्म 33:34 नहीं, कोई टाइम नहीं, कब कहां से चल दे कोई पता नहीं, 33:41
सूरत में एक सज्जन अपने साधक के पास आए की, बोले मेरे को पहचानते हो अरे हां तो तो 33:48 फालना मल है की, हां अरे यार लो यह कनकोत्री मेरी बेटी की शादी है, कनकोत्री 33:53 देवी दूसरों को कनकोत्री दे रहा, की मेरी बेटी की शादी पे आना आना बाकी के, कनकोत्री 33:59 लिख रहा था क्यों को बुलाया की, आना आना मेरे घर आना मेरे घर आना वे बुलावे की, 34:05 गंगोत्री देते देते गंगोत्री पर नाम लिखने लिखने ऐसा चला गया की, फिर वहीं रहा है, 34:12 गंगोत्री लिखता लिखता , दूसरों को तो दावत दे रहा है, की आना आना, 34:17 और खुद लिखने लिखने राम बोलो भाई राम हो गए, 34:23 कंकोत्रि पर नाम लिखते लिखते चल दिया, ये आश्चर्य है , अरे भैया ऐसे भी कई हो गए होंगे, 34:32 फिर भी ऐसी घटना देखकर दूसरे लोग यही अपने पर पक्का करना चाहते हैं, यहीं जमाना चाहते हैं, इससे बड़ा आश्चर्य क्या है ? श्री राम 34:47
यक्ष ने जब यह ब्रह्म विद्या संबंधी विचार सुन यक्ष के कलमस दूर हो गए, उसके पाप दूर 34:54 हो गए, आत्मज्ञान सुनने से उसके अविद्या दूर हुई, कुछ उसके जो श्राप थी वो निवृत्ति हुए, और आकाश 35:03 से विमान आए, महाभारत की कथा है ये , यक्ष की सद्गति हुई, युधिष्ठिर महाराज को कहा की कई जन्म में धन में लोभ था, धन कमा कमा कर 35:14 संग्रह करने की आदत थी , तो जो गड़ा हुआ धन है वही मेरी आत्मा आयी, लेकिन गड़े हुए धन से 35:20 भी मुझे लाभ नहीं हुआ, तुम्हारे हृदय में छुपा हुआ ज्ञान जब मेरे कानों तक हुआ आया 35:25 तब मेरे को लाभ हुआ, और इसलिए मैं यह धन आपके चरणों में अर्पित कर रहे, 35:32 हम सोचते की रुपए बढ़ाने से धन बढ़ाने से सत्ता बढ़ाने से मकान बनाने से लाभ होता 35:39 है, यह बिल्कुल हमारी अदक्षता है, अपने आत्मकार वृत्ति बढ़ाने से ही लाभ होता है 35:46 दूसरा लाभ का कोई साच्चोट रास्ता नहीं।
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